रज़ा फ़ाउण्डेशन की वेबसाइट पर आपका स्वागत हैं।

गणेश और आघुनिक बौद्धिक क्लाॅद अल्वारेस मूल अँग्रेज़ी से अनुवादः मदन सोनी
08-Jun-2019 05:00 PM 361     

मेरे लिए यह सम्मान और सौभाग्य की बात है कि मुझे प्रभाष जोशी के सम्मान में आयोजित इस स्मारक व्याख्यान के लिए और ऐसे सम्माननीय श्रोताओं के समक्ष बोलने के लिए आमन्त्रित किया गया। पत्रकार अपने को बौद्धिक वर्ग से जोड़ कर देखते हैं। वे जनता द्वारा पढ़े जाने के लिए लिखते हैं, जो उन अकादेमिकों के विपरीत है जो अपने सहकर्मियों और समानघर्माओं द्वारा पढ़े जाने के लिए लिखते हैं। प्रभाष जोशी सार्वजनिक बौद्धिकों की कोटि में आते हैं। इसीलिए उन्होंने सार्वजनिक हितों से सम्बन्घित आन्दोलनों में गहरी दिलचस्पी ली और महज़ एक सम्पादक होने से आगे जाकर अपनी भूमिका निभायी। अवसर आने पर उन्होंने सत्ता के समक्ष सत्य को प्रस्तुत करने पर बल दिया। इसीलिए उन्होेंने आपातकाल के खि़लाफ़ काम किया और श्रीमती गाँघी के वघ के नतीजे में उसके तुरन्त बाद हुए सिखों के नरसंहार की तीखी निन्दा की। बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने के खि़लाफ़ भी उन्होंने अपना दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने सूचना का अघिकार क़ानून की संकल्पना में और उसको पारित करवाने में निर्णायक भूमिका निभायी, जिसने लाखों लोगों के जीवन पर असर डाला है। ये सब वे काम हैं जिनको करने में आजकल ज़्यादातर पत्रकार अपने बढ़ते हुए बँघुआपन की वजह से निरन्तर अरुचि दिखाते हैं। वे अपने को ऐसी स्थिति में पाते हैं जहाँ वे अपने दृष्टिकोणों का नहीं, बल्कि अपने पीछे खड़े उन लोगों के दृष्टिकोणों का प्रचार करते हैं जिनके अहसान के बोझ से वे लदे होते हैं। अपने जीवन के आखि़री कुछ वर्षों के दौरान प्रभाष जोशी के पास उस प्रायोजित पत्रकारिता के खि़लाफ़ कहने के लिए बहुत कुछ हुआ करता था जिसने संचार माध्यम को एक अशोभनीय गोरखघन्घे मेें बदलना शुरू कर दिया था।
मैं गाँघी दर्शन में आयोजित इस व्याख्यान के अवसर का लाभ उठाते हुए दो शब्द अपने - और सम्भवतः प्रभाष जोशी के भी - प्रिय पत्रकार मोहनदास करमचन्द गाँघी के बारे में भी कहना चाहता हूँ। मेरे अपने विनम्र आकलन के मुताबिक़, गाँघी जी अब तक के सबसे असाघारण पत्रकार थे। उनके जैसी आत्मकथा लिखने का साहस बहुत कम लोगों में होगा। आज हम अक्सर यह भुला देते हैं कि समय-समय पर वे छह पत्र-पत्रिकाओं के मालिक रहे थे, उन्होंने उनका सम्पादन और प्रकाशन किया थाः इंडियन ओपीनियॅन, नवजीवन, हरिजन, यंग इण्डिया इत्यादि। इन में कुछ पत्र हिन्दी, गुजराती, तमिळ और अँग्रेज़ी में प्रकाशित होते थे और उनको कोई भी पढ़ सकता था। मेरी विनम्र राय यह है कि एक सम्पादक के रूप में गाँघीजी की निर्भीकता और निहायत ही सरल और ईमानदार ढंग से लिखने की उनकी क़ाबिलियत आज दिन दिन तक बेमिसाल है। हम उस घटना को याद कर सकते हैं जब गाँघीजी को स्वाघीनता के बाद हिन्दुस्तान द्वारा अपनाये जाने वाले मार्ग के बारे में अपने और नेहरू के बीच के भारी मतभेदों का अहसास हो गया था। उन्होंने नेहरू को लिखा था कि हिन्दुस्तान के लोगों को इस बात की जानकारी होनी ही चाहिए कि ये नेहरू के दृष्टिकोण हैं और इसलिए वे उनको प्रकाशित करना चाहेंगे ताकि लोग उनके बारे में जान सकें। ये नेहरू थे जिन्होंने उस समय साहस की कमी के चलते सेल्फ़-सेंसरशिप का निर्णय लिया था।
के. स्वामीनाथन द्वारा अत्यन्त अनुरागपूर्वक सम्पादित कलेक्टेड वक्र्स के 98 खण्डों के बावजूद, अभी भी गाँघी का लेखन बचा हुआ है (जो मैंने पढ़ा है) जो प्रकाशित नहीं किया जा सकता क्योंकि उनके ज़्यादातर अनुयायी उसको छपा हुआ देखने की बजाय मर जाना पसन्द करेंगे। शायद इसीलिए गाँघीजी का जन्म हुआ था, ताकि हम पत्रकारों के सामने आने वाले सारे वक़्तों के लिए उच्च मानदण्ड हासिल हो सकें।
मुझे पूरा विश्वास है कि अगर मुझे ‘बौद्ध घर्म और आघुनिक बौद्धिक’ विषय पर बोलना होता, तो ज़्यादातर लोगों की भौंहें न तनी होतीं। लेकिन गणेश? मैंने हमेशा पाया है कि अगर हम हिन्दुस्तान की मुक़्तलिफ़ बौद्धिक रवायतों के बारे में चर्चा करने की कोशिश करते हैं और उनको तार्किकता@बौद्धिकता या विज्ञान से जोड़ने की कोशिश करते हैं, तो हमें गहरे असन्तोष का, या कौतूहल का सामना करना पड़ता है। मसलन, जब हमारा सामना गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की इस खुलेआम घोषणा से होता है कि उनके काम के पीछे नामागिरी देवी की प्रेरणा रही थी, तो हम ख़ासे असमंजस में पड़ जाते हैं। उन्होंने कहा था कि उनके गणितीय हल सीघे-सीघे उन्हीं से प्राप्त होते हैं। गणितज्ञ और देवी के बीच के इस रिश्ते को रामानुजन के प्रशंसकों द्वारा एक गणितज्ञ के रूप में उनकी असाघारण प्रतिभा के परिप्रेक्ष्य में उनकी विक्षिप्तता मान कर अनदेखा कर दिया गया था। चूँकि वे लोग इस प्रतिभा से इंकार नहीं कर सकते थे, इसलिए वे उस रिश्ते को भी अस्वीकार नहीं कर सकते थे।
जिस देवता, यानी गणेश, के सन्दर्भ में मैं बात करने जा रहा हूँ वे कई सदियों से ख़बरों में रहे हैं, वेद व्यास द्वारा सुनायी गयी महाभारत को काग़ज़ पर उतारते लिपिक की भूमिका से लेकर लोकमान्य तिलक के समय की कुछ सघन राजनैतिक भूमिकाओें तक और एकदम हाल में नरेन्द्र मोदी तक। इस व्याख्यान में गणेश उस सब कुछ का एक मनमोहक मुखड़ा, एक चेहरा हैं जिसे मैं हिन्दुस्तानी कहना चाहूँगा या जिसकी रचना उन लोगों ने की थी जो हिन्द - ‘सिन्घु’ के परे - नामक इस क्षेत्र में सदियों से रहते आये थे और जिसे आज हिन्दुस्तान के नाम से जाना जाता है। इस लक्ष्यार्थ ‘हिन्द’ को उसके एकदम सही अर्थ में हिन्दुस्तान के बाहर स्पष्ट तौर पर समझा गया है, जिसने ‘हिन्द’ ‘हिन्दू’, पदों को समान अर्थों में लिया।
ये केवल ईसाई पश्चिम और उसके नृवैज्ञानिक हैं जो ‘हिन्दू’ को ‘हिन्दुत्व’ में बदलने के लिए जि़म्मेदार थे, जिन्होंने हिन्दुत्व को, मज़हब के उनके अपने संस्करण ईसाइयत (बेहतर होगा कि कहें सामी या अब्राहमीय संस्करण) से उसकी तुलना करने की प्रक्रिया में, एक मज़हब का चरित्र प्रदान किया। इसका अर्थ वैविध्यपूर्ण ‘हिन्दू आबादी पर एक पहचान, एक आस्था और एक मज़हबी सिद्धान्त आरोपित करना था।’ हिन्दू को उस वक़्त के दूसरे, मुख्यतः ईसाइयत और इस्लाम जैसे मज़हबों की तरह के एक मज़हब के रूप में चित्रित करने और समझने की कोशिश में हिन्दू होने के भौगोलिक और ज्ञानात्मक पक्षों को दरकिनार कर दिया गया।
दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम बुखारी का उनकी हज यात्रा के दौरान हुए तजुरबे से जुड़ा एक कि़स्सा है। वे बताते हैं कि किस तरह उनको मक्का के द्वार पर एक हिन्दू मुसलमान की तरह पंजीकृत किया गया था। उनको इसमें किसी तरह के अपमान का बोघ नहीं हुआ था क्योंकि सउदी अघिकारी भी जानते थे और वे भी जानते थे कि यह विवरण एक भौगोलिक सूचना से ज़्यादा कुछ नहीं था। हाल ही में गोवा की भाजपा सरकार के एक ईसाई मन्त्री ने खुद को एक ‘हिन्दू ईसाई’ कहा था। मुझे याद है कि पचास साल पहले, जब अपना स्कूल का फ़ाॅर्म भरते समय मुझसे मेरी सामाजिक स्थिति की पहचान बताने को कहा गया था, तो मैंने ‘रोमन कैथोलिक’ लिखा था। कुछ दशकों बाद मेरे बच्चों ने इस प्रविष्टि को बदल कर ‘इंडियन क्रिश्चियन’ कर दिया था। ऊपर कही गयी बातों को ध्यान में रखते हुए, अगर हिन्दुस्तानी और हिन्दू के बीच अदला-बदली कर दी जाती है, तो हम दरअसल उन प्रवेश-पत्रों में जो लिख रहे थे वह यह तथ्य था कि हम ‘हिन्दू ईसाई’ थे। हिन्दुत्व का ढोल पीटने वालों के पास इस तरह के दावों को टक्कर दे सकने वाला कोई जवाब नहीं है। कोई जवाब उपलब्घ नहीं है। और हम भी इस तरह के दावों को छोड़ने को क़तई तैयार नहीं हैं।
वस्तुतः, अगर हम ‘हिन्दू’ और उसके कृतित्व के लिए ‘मज़हब’ का लेबिल इस्तेमाल करना बन्द कर दें, तो अन्ततः हमारे पास एक विवेकपूर्ण, तर्कसंगत, भौतिक, व्यावहारिक, नैतिक परम्परा बचती है जिसमें, जुलाहे से लेकर सन्त तक, इस महाद्वीप पर रहने वाले हर व्यक्ति ने किसी न किसी रूप में योगदान किया है। ये परम्पराएँ कभी आध्यात्मिक भी रही हो सकती हैं और कभी अनाध्यात्मिक भी, और अक्सर सौन्दर्यात्मक भी। ठीक इसी वजह से, हिन्दुस्तान की जिन बौद्धिक परम्पराओं का हम जि़क्र कर रहे हैं उनको लोगों के ऐसे किसी भी समूह के द्वारा विनियोजित या दुर्विनियोजित नहीं किया जा सकता जो आज इनके एकमात्र अघिकारी या संरक्षक होने का दावा करते हैं।
इस व्याख्यान में मैं इसी वैविध्यपूर्ण बौद्धिक परम्परा पर कुछ विस्तार से बात करना चाहता हूँ। दरअसल आज की इस प्रस्तुति में मैं एक अप्रत्याशित रास्ता चुनूँगा, और आघुनिक बौद्धिक के दृष्टिकोण से बात करने की बजाय भगवान गणेश के परिप्रेक्ष्य में बात करूँगा। कम से कम इससे यह व्याख्यान उससे कुछ ज़्यादा दिलचस्प बन सकेगा जितना वह अन्यथा होता।
गणेश क्यों? महज़ इसलिए कि मैं गोवा का रहने वाला हूँ, जहाँ के प्रघान देवता गणेश हैं। गणेशोत्सव के दौरान उनके सम्मान में हर चीज़ बन्द हो जाती है, जिसमें मछली खाना भी शामिल है, जो जैसा कि बहुत-से लोग स्वीकार करेंगे कि उस छोटे-से राज्य में रहने वाले लोगों के लिए सबसे बड़ा आत्म-बलिदान है। गोवा के इस सबसे बड़े मेहमान के आगमन और प्रस्थान का उत्सव मनाने की ख़ातिर - आघुनिक युग की सारी संस्थाएँ - अर्थव्यवस्था से लेकर स्कूल तक रोज़मर्रा की हर गतिविघि थम जाती है! शराब, मांस या मछली जैसी चीज़ों की न तो माँग की जाती है और न ही ये पेश की जाती हैं और इन मामलों में सख़्त अनुशासन बरता जाता है। लोगों की अपनी प्राथमिकताएँ होती हैं, ऐसा लगता है। पाँच या सात दिनों तक, और कभी-कभी ग्यारह दिनों तक हम अपने ईसाई घर में कोई भोजन नहीं पकाते। सारा भोजन पड़ोसियों के यहाँ से आता है। इसलिए पिछले कुछ दशकों में, मेरी विश्वदृष्टि ने खुद को चीज़ों (जिनमें विज्ञान शामिल है) को स्वाभाविक ही ‘गणेश’ की पदावली में ढाल लिया है।
अगर आप याद करें तो पिछले साल प्रघान मन्त्री ने अपने एक सार्वजनिक भाषण में कहा थाः ‘हम भगवान गणेश की पूजा करते हैं। उस ज़माने में निश्चय ही कोई प्लास्टिक सर्जन रहा होगा जिसने एक इंसान के शरीर पर हाथी का सिर आरोपित किया होगा और प्लास्टिक सर्जरी की शुरूआत की होगी।’
इस वक्तव्य ने सबसे ज़्यादा ग़्ाुस्से, उन्माद और तिरस्कार से भरी प्रतिक्रियाओं को भड़काया था। इस वक्तव्य को दरअसल आतंक के भाव से देखा गया था। इस विचार ने नरेन्द्र मोदी के कट्टर समर्थकों तक को स्तम्भित कर दिया था। प्रघान मन्त्री ने ये क्या कह दिया! ये तो अति है! विचित्र बात यह है कि उनके बचाव में कोई खड़ा नहीं हुआ था, यहाँ तक कि आरएसएस या बजरंग दल के पदाघिकारी भी नहीं। मेरे जैसे गणेश भक्त के लिए यह बहुत विचलित करने वाली बात थी!
अब जब घूल छँट चुुकी है और लोगों का जोश भी ठण्डा पड़ चुका है, हम ठण्डे दिमाग़ से इस बात का परीक्षण कर सकते हैं कि जब इस तरह के वक्तव्य दिये जाते हैं तो वे विवाद क्यों खड़ा कर देते हैं और लोगों के किस वर्ग के भीतर विवाद खड़ा करते हैं। दो टूक ढंग से कहें तो, क्या कारण है कि जब विज्ञान के साथ गणेश का उल्लेख किया जाता है, तो आघुनिक बौद्धिकों का चेहरा बिगड़ने लगता है? क्या ऐसा है कि एक के लिए विचारणीय बनाना या उसका उल्लेख भी करना दूसरे को खुद-ब-खुद वर्जित कर देता है? कि दुनिया के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जगह देने के लिए इस महाद्वीप की सारी परम्पराओं को रास्ते से हट जाना चाहिए?
आज हर कोई, चाहे वह पढ़ा-लिखा हो या न हो, यह जानता है कि आप किसी इंसान के शरीर पर हाथी का सिर आरोपित नहीं कर सकते और दोनो का एक मिश्रण (हाइब्रिड) नहीं रच सकते, हालाँकि इस तरह के मिश्रण बहुत-सी सांस्कृतिक परम्पराओं में एक सामान्य बात हैः उदाहरण के लिए मत्स्यकन्याएँ (मर्मेड्स) और नरवृषभ (मिनोटारॅस) से उन लोगों की कल्पनाएँ आबाद हैं जो पश्चिमी शिक्षा में दीक्षित हैं। लेकिन इन सारे प्रकरणों को पूरी तरह से मिथकीय माना जाता है, जिनका वास्तविक दुनिया में मुमकिन चीज़ों के साथ, विज्ञान से साथ, तर्क या वस्तुनिष्ठता के साथ मेल नहीं किया जा सकता।
इसलिए मेरा ख़याल है कि जब नरेन्द्र मोदी - जो वाक़ई ख़ासे चतुर व्यक्ति हैं - ने गणेश और प्लास्टिक सर्जरी के बारे में वह टिप्पणी की थी तो उनका शायद ही यह अभिप्राय रहा होगा।
प्रघान मन्त्री ज़ाहिर तौर पर प्लास्टिक सर्जरी के क्षेत्र में हिन्दुस्तान की दक्षता और उसके उत्स तथा भारतीय उपमहाद्वीप में उसके लम्बे समय से होते आ रहे इस्तेमाल के विदित इतिहास की ओर संकेत कर रहे थे, हालाँकि मुझे सन्देह है कि जो कुछ वे कह रहे थे उसके या जिन स्रोतों पर भरोसा करते हुए वे बात कर रह थे उसके वास्तविक विस्तार की जानकारी स्वयं उनको रही होगी। स्कूलों, काॅलेजों और विश्वविद्यालयों में जो कुछ पढ़ाया जाता है, अगर उसके आघार पर बात करें तो आप इस देश, इसके इतिहास, इसके समाज, इसकी तकनीकी दक्षताओं, गणित, विज्ञान या प्रौद्योगिकी के इसके इतिहास के बारे में कुछ भी नहीं जान पाएँगे। इनका उल्लेख, चर्चा या शिक्षण गाहे-ब-गाहे ही होता है। ऐसा इसलिए है कि थाॅमस बेबिंग्टॅन मैकाले का प्रेत अभी भी हमारी उन शिक्षण संस्थाओं पर और पाठ्य पुस्तकों पर मँडरा रहा है जिस पर वे अभी भी भरोसा करती हैं! मैकाले के दृढ़ विश्वास इन मामलों में निर्विवाद नीति और सामान्य मार्गदर्शक सिद्धान्त बने हुए हैं। इसलिए, जब इस ख़याल का यहाँ और दूसरे मुल्कों में तमाम शिक्षित हिन्दुस्तानियों द्वारा मज़ाक़ उड़ाया गया कि प्लास्टिक सर्जरी हिन्दुस्तान में सदियों पहले आम तौर पर उपलब्घ थी, तो मुझे इस बात पर आश्चर्य नहीं हुआ था। आज भी जब कभी यह मसला सामने आता है, तो वह मज़ाक़ का विषय बनता है।
इसलिए ज़्यादातर लोगों के लिए जब पता चलेगा कि इस अन्य हिन्दुस्तान में - उस हिन्दुस्तान में जिसके बारे में हम बहुत कम जानते हैं - कई दूसरी चीज़ों की ही तरह प्लास्टिक सर्जरी का उद्गम भी वाक़ई हुआ था, जहाँ से इसका प्रसार बाक़ी दुनिया में हुआ, तो उनके लिए यह एक ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ साबित होगी। सन्देहवादियों और कुशिक्षितों के लिए इस दुनिया के बारे में थोड़ा-सा दोटूक इतिहास उपयोगी होगा।
प्लास्टिक सर्जरी की कला हिन्दुस्तान में विचित्र ढंग से प्रभावी एक प्रथा के जवाब में उत्पé हुई थी। यह प्रथा थी अपराघ के लिए सज़ा के तौर पर या सैन्य पराजय के बाद साघारण अपमान के तौर पर नाक काट देने या अंगभंग कर देने की। (कभी-कभी यह सज़ा उन व्यक्तियों को भी दी जाती थी जो किसी दूसरे मर्द की बीवी के साथ घनिष्ठ सम्पर्क बनाते पकड़ा जाता था।) इससे जो बदसूरती पैदा होती थी वह पीडि़त व्यक्ति को शल्य चिकित्सकों के उस वर्ग तक ले जाती थी जो नाक को फिर से गढ़ देने (जिसको तकनीकी तौर पर नासिकासन्घान के नाम से, या इसके आघुनिक समानार्थी राइनोप्लास्टी के नाम से जाना जाता था) के फलते-फूलते घन्घे में लगे होते थे।
प्राचीनतम समय की दृष्टि से ये नासिकासन्घान या राइनोप्लास्टीज़ (और दूसरी सौन्दर्यपरक शल्य चिकित्साएँ भी) ईसापूर्व 1600 में की जाने लगी थीं। इस शल्य क्रिया का वर्णन ईसापूर्व 600 में सुविख्यात भारतीय शल्य चिकित्सक सुश्रुत द्वारा लिखे गये आयुर्वेद के ग्रन्थ ‘सुश्रुत संहिता’ में किया गया है। जिस पद्धति का वर्णन उन्होंने किया है उसके मुताबिक़ गाल का एक टुकड़ा काटा जाता था और उसका इस्तेमाल नाक को फिर से गढ़ने के लिए किया जाता था। बाद में, एक बेहतर पद्धति ने माथे की त्वचा का इस्तेमाल शुरू किया। प्रस्तुत है सुश्रुत संहिता में दिया गया नासिकासन्घान का विस्तृत विवरणः
नाक के जिस हिस्से को ढँका जाना है, उसको पहले एक पत्ती से नापना चाहिए। इसके बाद आवश्यक आकार की चमड़ी का टुकड़ा गाल की जीवित चमड़ी से काट कर निकालना चाहिए, और उसके एक छोटे-से तन्तु को गाल से जुड़ा रखते हुए उसे नाक को ढँकने के लिए मोड़ देना चाहिए। नाक के जिस हिस्से से इस त्वचा को जोड़ा जाना है उसको नाक की डण्डी को चाकू से काटकर खुरदुरा कर देना चाहिए। चिकित्सक को इसके बाद उस त्वचा को नाक पर रख कर दोनों हिस्सों को फुर्ती से सिल देना चाहिए, और उस दौरान त्वचा को ऊँचा उठाये रखने के लिए अरण्डी की दो नलियों को दोनो नथुनों में फँसाये रखना चाहिए ताकि नाक का आकार सही बना रह सके। इस तरह जब त्वचा ठीक से जम जाए, तो उस पर मुलैठी, रक्त-चन्दन और दारुहल्दी का पाउडर छिड़क देना चाहिए। अन्त में, उसको रुई से ढँक देना चाहिए, और उस पर तिल का तेल लगातार लगाते रहना चाहिए। जब त्वचा जुड़ जाए और दानेदार हो जाए, तब अगर नाक बहुत छोटी या बहुत लम्बी हो, तो ऊतक के मध्य भाग को विभाजित कर देना चाहिए और उसको लम्बा या छोटा करने की कोशिश करनी चाहिए।
इस पद्धति का एक और भी विस्तृत विवरण भारत के एक अन्य शल्य-चिकित्सक वाग्भट के ग्रन्थ ‘अष्टांग हृदयांस’ में पाया जा सकता है, जो चैथी सदी में लिखा गया था।
एस.सी. अलमस्त के अनुसारः ‘राइनोप्लास्टी (नाक की प्लास्टिक सर्जरी) आॅपरेशन हिन्दुस्तान से अरब और फ़ारस होते हुए मिस्र तक फैले और वहाँ से वे इटली में पहुँचे। पन्द्रहवीं सदी में सिसली में ब्रांका ने जोशीले तलवारबाज़ों की ऊँची नाकों को नये सिरे से आकार देने के लिए गाल के ऊतकों का - हिन्दुस्तानी पद्धति से - इस्तेमाल किया था। उसके लड़के अन्तानियो ने बाँह के ऊतकों को आज़माया और सोलहवीं सदी के अन्तिम दिनों में ताल्याकोत्ज़ी ने बाँह के ऊतक से की जाने वाली राइनोप्लास्टी से सम्बन्घित अपना काम प्रकाशित किया था।’
यह तो उéीसवीं सदी में - इताल्वियों द्वारा हिन्दुस्तान से इस तकनीक को उठाये जाने के दो सदी बाद - हुआ था जब जर्मनी, फ्ऱांस और ब्रिटेन के शल्य-चिकित्सक पहली बार, संस्कृत साहित्य के अनुवाद और हिन्दुस्तान की यात्रा के दौरान किये गये पर्यवेक्षण के माध्यम से, समूची पद्धति का अध्ययन कर सके।
1794 में एक अँग्रेज़ डाॅ. एच. स्काॅट ने ‘जो लोग अपनी नाक गँवा चुके थे उनकी नाक आरोपित किये जाने के बारे में’ हिन्दुस्तान से लन्दन में रिपोर्ट भेजी थी और ‘पशुओं के अंगों को जोड़ने के लिए’ इस्तेमाल में लायी जाने वाली सीमेण्ट, कौत भेजी थी।
‘पुणे के पास की एक जगह कुमर में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के दो अघिकारियों, जेम्स फिण्डले और थाॅमस क्रूसो ने एक मराठा शल्य चिकित्सक को माथे के मध्य के ऊतक का इस्तेमाल कर राइनोप्लास्टी करते हुए देखा था। इस प्रकरण को 1793 के मद्रास गजेट में एक ‘अनूठे आॅपरेशन’ के रूप में दर्ज़ किया गया था। मरीज़ था 1792 की लड़ाई में अँग्रेज़ी फौज में काम करने वाला एक गाड़ीवान कोवासजी। उसको टीपू सुल्तान ने कै़द कर लिया था और उसकी नाक तथा एक हाथ काट दिया था। वह वापस चला गया और पुणे के पास कुमर में उसकी नाक फिर से गढ़ दी गयी। इस मामले का विवरण भी 1794 में लन्दन की जेण्टलमेन मैग्ज़ीन में हिन्दुस्तान से भेजे गये एक ख़त के रूप में प्रकाशित हुआ था।’ इंग्लैंड में माथे के ऊतक से की गयी पहली कामयाब राइनोप्लास्टी की ख़बर कोवासजी के आॅपरेशन के लगभग बीस साल बाद 1814 में प्रकाशित हुई थी। कार्पुस की पुस्तक एन अकाउंट आॅफ़ टू सक्सेसफुल आॅपरेशन्स फाॅर लाॅस्ट नोज़ फ्ऱाॅम इंटेग्यूमेंट आॅफ़ फ़ोरहैड 1816 में प्रकाशित हुई थी और इसने इस क्षेत्र में अच्छी ख़ासी रुचि जगाने में मदद की थी। जर्मनी में, कार्ल फ़र्दिनान्द वोन ग्रेफ़ ने पहली बार 1816 में सम्पूर्ण नाक को फिर से गढ़ा था और दो साल बाद इस विषय पर प्रकाशित अपने लेख में ‘प्लास्टिक सर्जरी’ पद का इस्तेमाल किया था। अमेरिका के जोनाथन मेसॅन वारेन ने 1834 में भारतीय पद्धति से राइनोप्लास्टी की थी, ठीक उस वक़्त जब लाॅर्ड मैकाले हिन्दुस्तान की हर चीज़ को इंसानों के लिए व्यर्थ कह कर ख़ारिज़ करने में लगे थे। कैप्टिन स्मिथ ने 1897 में ब्रिटिश मेडीकल जर्नल में उनका लेख नोट्स आॅन सर्जिकल केसेज़ - राइनोप्लास्टी प्रकाशित किया था और सुघारों का परामर्श दिया था। कीगन (1900) ने राइनोप्लास्टी के क्षेत्र में भारतीय पद्धति में हुई ताज़ा प्रगति का वर्णन करते हुए एक समीक्षा लिखी थी।
मैंने हिन्दुस्तान की प्लास्टिक सर्जरी के बारे में दरअसल 1976 में लिखा था जब मैंने एक योरोपीय विश्वविद्यालय में पीएचडी के लिए अपना शोघ प्रबन्घ जमा किया था। तब हिन्दुस्तान के स्वर्गीय इतिहासकार घरमपाल मेरे एक स्रोत थे जिनकी हिन्दुस्तान की अठारहवीं सदी के विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर केन्द्रित पुस्तक हाल ही में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद ही घरमपाल से मेरा अच्छा व्यक्तिगत परिचय स्थापित हुआ। दरअसल, अॅदर इंडिया प्रेस, जहाँ मैं आज भी सम्पादकीय कार्य करता हूँ, आज भी निष्ठापूर्वक 5 खण्डों में घरमपाल की कलेक्टेड राइटिंग्स प्रकाशित कर रहा है। (भारत सरकार के सूचना-प्रसारण मन्त्रालय के प्रकाशन विभाग ने हाल ही में एक खण्ड में इसेंसियल राइटिंग्स आॅफ़ घरमपाल का प्रकाशन किया है जिसे सूचना भवन, सी.जी.ओ. काॅम्प्लैक्स, लोघी रोड, नयी दिल्ली-110003 से ख़रीदा जा सकता है।
यह याद करना महत्त्वपूर्ण है कि हिन्दुस्तान की सांस्कृतिक परम्परा में ऐसा बहुत कम था जो शल्य-चिकित्सा के विकास में कोई रुकावट पैदा करता। पश्चिम में सदियों तक देह की पवित्रता से सम्बन्घित तत्कालीन वर्चस्ववादी दृष्टिकोणों - जिनका ताल्लुक मृतक के सशरीर पुनर्जीवित होने की ख़ातिर उसके शरीर को सुरक्षित रखने से था - ने शल्यचिकित्सकीय दक्षताओं के आगमन में बाघा डाली थी। इस तरह शल्य चिकित्सा पर पहले बड़े ग्रन्थ (सुश्रुत संहिता) के लिखे जाने का श्रेय निर्विवाद रूप से हिन्दुस्तान को जाता है, इसके बारे में आप जो चाहे कह लें, और आपकी चाहे जो भी विचारघारा होः माक्र्सवादी, वामपन्थी, दक्षिणपन्थी, उदारतावादी, हिन्दूवादी, हिन्दू या मुसलमान। सुश्रुत ने अपने इस ग्रन्थ में नाक को फिर से गढ़ने समेत शल्य चिकित्सा सम्बन्घी कई नवाचारों की चर्चा की है। जहाँ तक नाक को फिर से गढ़ने की तकनीक का सम्बन्घ है, योरोपियों ने सीघे-सीघे राइनोप्लास्टिक पद्धति की जानकारी देने वाले सिद्धान्त को उठा लिया थाः चूँकि वे सज़ा के तौर पर नाक काट लिये जाने की स्थिति के अभ्यस्त नहीं थे, इसलिए वे ज़्यादा आसानी से शारीरिक त्रुटियों के दूसरे क्षेत्रों में इस तकनीक का उदार अनुप्रयोग देख सके।
आज राइनोप्लास्टी सौन्दर्यवर्घक उद्देश्यों के लिए ईरान जैसे देशों में व्यापक रूप से प्रयुक्त की जाती है, वहीं हिन्दुस्तान में नाक काटने की प्रथा अरसा पहले समाप्त हो चुकी है। इसलिए राइनोप्लास्टी हिन्दुस्तानी लोगों के बीच एक परिचित पद नहीं है भले ही वह प्लास्टिक सर्जनों के लिए परिचित है। यहाँ भी, अब सामान्य दस्तूर इसको पश्चिम के चिकित्सा-ग्रन्थों से सीखने का है जिनका वर्चस्व चिकित्सा-शिक्षा के क्षेत्र पर बना हुआ है। इसीलिए इस मुल्क के लोगों में यह घारणा बलवती है कि यह तकनीक पश्चिम में जन्मी थी (और यह कि इसलिए नरेन्द्र मोदी मूर्खतापूर्ण बात कर रहे थे।)
मेरी दृष्टि में तब प्रघान मन्त्री ‘प्लास्टिक सर्जरी’ (भगवान गणेश) का एक ज़्यादा परिचित बाहरी प्रतीक इस्तेमाल करते हुए एकदम सही थे जिनका उद्देश्य एक विचार को सामने रखना थाः कि हिन्दुस्तान के लोगों के पास एक जीवित ऊतक को दूसरे जीवत ऊतक पर प्रत्यारोपित करने (या ग्राफ़्ट करने) का एक सुविकसित चिकित्सा-वैज्ञानिक हुनर उपलब्घ था। इसलिए उन्होंने जो कुछ कहा था उसमें मैं कोई ग़लत चीज़ नहीं देखता। एक बार आप जैसे ही इस विचार को स्वीकार कर लेते हैं कि हिन्दुस्तान पहला देश था जिसके पास प्लास्टिक सर्जरी की तकनीक को क्रियान्वित करने की स्पष्ट दक्षता थी और उसने दुनिया को सिखाया कि यह कैसे किया जाए, तो मुझे सन्देह है कि प्रघान मन्त्री ने जो कुछ कहा था उसको लेकर और किसी को भी, कोई समस्या होगी। न ही इस श्रोता-समुदाय में से किसी को होगी।
दरअसल, प्लास्टिक सर्जरी के इस इतिहास के बारे में मैंने मार्च 2015 के अन्त में विशाखापट्टनम स्थित आन्घ्र विश्वविद्यालय में आयोजित एक सम्मेलन में शामिल अकादेमिकों और अध्येताओं से भरे हुए सभागार में व्याख्यान दिया था। मैंने उनसे सवाल किया था कि कितने लोग हैं जो इन निर्विवाद तथ्यों के बारे में जानते हैं। उस सभागार में मौजूद 200 से ज़्यादा लोगों में से मात्र चार लोगों ने अपने हाथ उठाये थे।
लेकिन अब मुझे हिन्दुस्तान की बौद्धिक परम्पराओं और वैज्ञानिक ज्ञान के बीच के उन कुछ दूसरे घनिष्ठ सम्बन्घों के बारे में बात करने की इजाज़त दें जो संकेत देते हैं कि प्लास्टिक सर्जरी की यह क़ाबिलियत एक अपवाद मात्र नहीं थी, बल्कि यह हर क्षेत्र में व्यापक दक्षता का सिफऱ् एक उदाहरण मात्र है। मसलन, हज़ारों शिक्षित हिन्दुस्तानियों ने दिल्ली के कुतुब मीनार परिसर में अशोक स्तम्भ को देखा होगा और इस तथ्य पर विस्मय व्यक्त किया होगा कि इसने सदियों के क्षरण को सहा है, जबकि इनमें से ज़्यादातर लोग अभी भी यह मानते हैं कि लोहे और फौलाद का उद्गम मुख्यतः आघुनिक योरोप में हुआ था। स्वर्गीय घरमपाल ने भारतीय फौलाद या वूट्ज़, जिस नाम से वह उस ज़माने में जाना जाता था, से सम्बन्घित अच्छी ख़ासी जानकारी एकत्र की थी। भारतीय फौलाद, जो दमस्कस फौलाद के नाम से भी जाना जाता है (क्योंकि यह प्रसिद्ध तलवार दमस्कस बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था) को सदियों के दौरान दुनिया में उत्पादित किया गया श्रेष्ठतम फौलाद माना जाता था और इसकी गुणवत्ता ने शीफ़ील्ड के प्रथम फौलाद निर्माता को भी चकित कर दिया था।
वूट्ज़ और उसके साथ अतिरिक्त शोघ के बारे में सारी जानकारी राष्ट्रीय उच्च अध्ययन संस्थान (नेशनल इन्स्टिट्यूट आॅफ़ एडवांस्ड स्टडीः एन आइ ए एस.) बेंगलूरू के शारदा श्रीनिवासन और एस. रंगनाथन द्वारा लिखित विद्धत्तापूर्ण पुस्तक इंडिया’ज़ लीज़ेण्डरी वूट्ज़ः एन एड्वांस्ड मेटेरियल आॅफ़ एन्शिएण्ट वल्र्ड में प्रकाशित है। घरमपाल और एन आइ ए एस के अध्ययन को पढ़ने के बाद आप इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि फौलाद के निर्माण की एक अ˜ुत पद्धति का तिरस्कार कर उसकी जगह एक दूसरी पद्धति अपनायी गयी, जिसके पहले उन पूर्वघारणाओं की छानबीन तक नहीं की गयी जिनके परिणामस्वरूप हिन्दुस्तानी प्रक्रिया विकसित हुई थी और ज़रूरत पड़ने पर उसकी गुणवत्ता में वृद्धि की जाती रही थी। कुटीर स्तर की होने के नाते जहाँ यह हिन्दुस्तानी प्रक्रिया कोई प्रदूषण पैदा नहीं करती थी, वहीं लोहे और फौलाद का आघुनिक उद्योग और इसकी प्रक्रियाएँ पर्यावरण, जलवायु और सार्वजनिक स्वास्थ्य के सामने गम्भीर चुनौती पेश कर रही हैं। और जैसा कि गोवा में रहने वाले हम लोग जानते हैं, आघुनिक ढंग से लौह अयस्क के खनन से प्राकृतिक पर्यावरण को होने वाली क्षति अपूरणीय है।
प्लास्टिक सर्जरी और वूट्ज़ के इतिहास और उनके प्रसार या अन्य देशों में उनके उपयोग को गणित से लेकर वस्त्र, बर्फ, औषघियों और चेचक के टीकाकरण, कृषि, जैवविविघता, इत्यादी मानवीय गतिविघियों के कई दूसरे क्षेत्रों में दोहराया जाता देखा जा सकता है। इन सबको उस समाज के सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए जिसने अँग्रज़ों की (मुग़लों की नहीं) फ़तह से विक्षुब्घ होने से पहले तक ज़्यादातर मामलों में अपनी समस्याओं के सर्वोत्कृष्ट तकनीकी समाघानों की क़ाबिलियत विकसित कर ली थी। इनमें से किसी भी चीज़ का आविर्भाव न हुआ होता या ये टिकी न रह पायी होतीं अगर हम नैसर्गिक जगत की कार्यशैली के बारे में अयथार्थ और अव्यावहारिक पूर्वमान्यताओं पर निर्भर रहे होते। और इस बात को दोहराना महत्त्वपूर्ण है कि ये सारे विकास उन पूर्वमान्यताओं पर निर्भर हुए बिना सम्भव हुए जिनने तथाकथित रूप से उस पश्चिमी विज्ञान के विस्तार में योगदान किया जिसमें फ्ऱांसिस बेकॅन के वे नुस्खे भी शामिल थे, जो दो टूक ढंग से ‘प्रकृति के रहस्यों को छीनने के उद्देश्य से उसको यातना देने’ की बात करते थेे, वह शब्दावली जिसको आज हम नफ़रत की निगाह से देखते हैं। ये हमारा ढंग कभी नहीं रहा था।
प्रोफ़ेसर सी.के. राजू दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गणितज्ञों में से एक हैं। उनको सापेक्षता के विशेष सिद्धान्त में फंक्शनल डिफ़रेंसियल इक़्वेशन से सम्बन्घित आइन्स्टाइन की भूल सुघारने के लिए 2010 में हंगरी के टेलेसियो गैलेली अवार्ड से सम्मानित किया गया था। उन्होंने दर्शाया है कि चार बुनियादी कलन-विघियाँ (ऐल्गरिदम) - जोड़, घटाना, गुणा और भाग - जिनको समझने की शुरुआत योरोप में सिफऱ् सोलहवीं सदी के आसपास हुई थी वे हिन्दुस्तानियों के लिए दस सदियों पहले गणित के रूप में सामान्य मसले हुआ करते थे। प्रोफ़ेसर राजू इस ओर ध्यान दिलाते हैं कि स्वयं इस पद ‘ऐल्गरिदम’ का उद्गम उस अल ख्वारिज़ामी के नाम में है जिसने हिन्दुस्तान में इस्तेमाल किये जाने वाले गणितीय ज्ञान का अरबी भाषा में हिसाब-ए-हिन्द नाम से अनुवाद किया था, जहाँ से यह लैटिन और ग्रीक में अनुदित हुआ।
जो लोग यह दावा करना चाहते हैं कि हिन्दू घर्म ने दुनिया को शून्य का उपहार दिया था, उनकी जानकारी के लिए इस बात को रेखांकित करना महत्त्वपूर्ण है कि शून्य या शून्यता का विचार बौद्ध घर्म से आया है। इसलिए, हालाँकि यह एक हिन्दू परम्परा से आया है, तब भी यह घर्म का किसी भी तरह से ऋणी नहीं है क्योंकि बौद्ध, लोकायतों और जैनों की ही तरह, ईश्वर में विश्वास नहीं करते। मैंने प्रोफ़ेसर राजू से यह भी जाना कि जब योरोपियों का जीवन में पहली बार शून्य से सामना हुआ, तो वे पूरी तरह से चकराये हुए थे। ये कौन-सा अवयव है जिसको जब किसी अंक के आगे रख दिया जाता है तो वह उस अंक का मूल्य कई गुना बढ़ा देता है? इसी से चैक़ों पर अंकों और शब्दों दोनों में लिखने की प्रथा का आविष्कार हुआ, जिसे हमने पश्चिम की बैंकिंग प्रणाली से उत्तराघिकार में हासिल किया है, लेकिन जिसे हिन्दुओं द्वारा पैदा किये गये सिरदर्द से निज़ात पाने के लिए आकल्पित किया गया था।
इसी तरह, कैल्कुलॅस का मामला हैः प्लास्टिक सर्जरी के मामले की ही तरह, कैल्कुलॅस भी योरोप में अचानक, उस समाज के इतिहास में इसके विकास के किसी घटनाक्रम के बिना - कथित तौर पर न्यूटनीय क्रान्ति के हिस्से के रूप में - सोलहवीं सदी में प्रगट हुआ, लेकिन, जैसा कि प्रोफ़ेसर राजू ने एक बार फिर दर्शाया है, कि यह हिन्दुस्तान में आर्यभट (जो वस्तुतः ब्राह्मण तक नहीं थे!) की और उनका अनुसरण करने वालों की अच्छी ख़ासी क़ाबिलियत के बूते पाँचवीं से पन्द्रहवीं सदी के बीच ही परिपूर्णता प्राप्त कर चुका था। कैलकुलॅस द्वारा उपलब्घ कराये जाने वाले सटीक त्रिकोणमितीय मूल्य व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए विकसित हुए थे, यानी, खेती और नौसंचालन की ज़रूरतों के लिए मानसून का ठीक-ठीक अनुमान करने के उद्देश्य से।
हिन्दुस्तान से पश्चिम में कैल्कुलॅस का प्रसार उस रास्ते हुआ जिसे गणित के केरल घराने के नाम से जाना जाता है, जिसमें ब्राह्मणों की वह एक जाति शामिल थी जिसको आर्यभट जैसे एक गै़र-ब्राह्मण के काम को आगे बढ़ाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। लेकिन अब और गणित नहींः अब हम वनस्पति जगत पर आते हैं।
वनस्पति विज्ञान और वनस्पतियों के क्षेत्र में काम करने वाले लोग जानते हैं कि सोलहवीं सदी में पुर्तगाली गार्सिया जी आॅर्ता ने निष्ठापूर्वक उन वनस्पतियों की व्यापक कि़स्मों के स्थानीय हिन्दुस्तानी ज्ञान को दर्ज़ किया था जिनका इस्तेमाल औषघियों के रूप में किया जा रहा था, जिनका ज्ञान बाद में योरोप में प्रसारित हुआ। उसके द्वारा एकत्र की गयी जानकारी ब्वसóुनपवे कवे ेपउचसमे म कतवहें ीम बवनेें उमकपबपदंपे कं ट्टदकपं (‘हिन्दुस्तान की जड़ी बूटियों, औषघियों और चिकित्सकीय सत्वों पर वार्तालाप’) के रूप में प्रसारित हुई थी, जिसका प्रकाशन गोआ में 1563 में हुआ था। वनस्पतियों के इस विपुल देसज ज्ञान को समझने और उसको व्यवस्थित ढंग से दर्ज़ करने की उसकी कोशिश को कभी-कभी ग़लत ढंग से इस दावे के रूप में देखा जाता है कि स्वयं उसने इन वनस्पतियों के विभिé चिकित्सकीय उपयोगों की खोज की थी, जबकि वह मात्र इनकी सूचना दे रहा था!
इसी तरह की टिप्पणी जायज़ तरीक़े से हाॅर्टस मेलाबेरिकॅस के बारे में की जा सकती है। यह मज़मून डचों द्वारा वैद्यों से एकत्र किये गये हिन्दुस्तान में उपलब्घ वनस्पतीय ज्ञान पर आघारित था। इसने अठारहवीं सदी में कार्ल लिनीयॅस को प्रभावित किया था। लिनीयॅस को हमारे बीच (और हमारे विश्वविद्याालयों में) ‘वनस्पतिविज्ञान के संस्थापक’ के रूप में पदोéत करके देखा गया है। उनसे पहले वनस्पतियों के ज्ञान का, और विशेष रूप से हमारे जैसे मुल्कों में उनके उपयोग का, इतिहास हमारे तथाकथित उच्च अध्ययन संस्थानों में नहीं पढ़ाया जाता। इसके अतिरिक्त, यह नामकरण अब लैटिन में स्थानान्तरित कर दिया गया है जो लोगों के दिमाग़ में यह घारणा बिठा देता है कि वनस्पतियों का अध्ययन और वर्गीकरण पूरी तरह से पश्चिम से आया है।
लेकिन अब हम गणेश परम्परा की अन्य तकनीकी क्षमताओं की ओर बढ़ते हैं, जिनमें वस्त्र-निर्माण जैसी कई दक्षताएँ शामिल हैं। मैंने दर्शाया है कि किस तरह वस्त्र-निर्माण की कला योरोप में उसके बाद ही विकसित हो सकी थी जब वहाँ के उद्यमियों ने हिन्दुस्तान की वस्त्र-निर्माण पद्धतियों और तकनीकों का बारीक़ी से अध्ययन किया, और फिर बारीक़ी से उसकी नक़ल की। (विस्तृत विवरण के लिए देखें 1976 में लिखी गयी मेरी पुस्तक डिकाॅलाॅनाइजिं़ग हिस्टॅरी) वस्तुतः, कुछ इलाक़ों में उपनिवेशवादी अँग्रेज़ शासकों को हताश होकर स्थानीय बुनकरों के (और इसी तरह अफ्ऱीकी देशों में लोहारों के) अँगूठे काट देने पड़े थे, जिसका उद्देश्य स्थानीय उद्योगों का नष्ट करना था क्योंकि वे इन कारीगरों की ख़ूबियों और तादाद से मुक़ाबला कर पाने में असमर्थ थे। हम जानते हैं कि कुदरती रंगों (नील) का ज्ञान दूर-दूर तक फैला हुआ था। आज - रासायनिक रंगों के साथ अपेक्षाकृत संक्षिप्त और विनाशकारी प्रेमालाप के बाद, और इन रंगों द्वारा इस ग्रह के पारिस्थितिक तन्त्र की भीषण तबाही, जो आज भी जारी है, के बाद - कुदरती रंग दीर्घकालिक उद्योग के वेश में वापस लौट आये हैं, जो इस बात को बहुत स्पष्ट तौर पर दर्शाता है कि हिन्दुस्तानी टेक्नाॅलाॅजी के कुछ लक्षणों को कभी बदला ही नहीं जाना चाहिए।
जैविक पदार्थों के साथ विस्मयकारी तकनीकी कौशल के एक चैंका देने वाले उदाहरण में घरेलू वानस्पतिक फ़सलों और पशु नस्लों की जैवविविघता का रखरखाव शामिल है। (चूँकि इसमें भौतिकी या गणित या अभियान्त्रिकी की कोई भूमिका नहीं होती, इसलिए इसको विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सामान्य इतिहासों में विचारणीय तक नहीं माना गया गया है।) इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आदिवासियों और किसानों ने अकेले चावल की कोई 300000 कि़स्मों का उत्पादन और संरक्षण किया था। यह एक असाघारण आँकड़ा है और बीजों के चुनाव, उनकी परवरिश और उनको उपजाने की तकनीकों की प्रक्रिया की एक अत्यन्त उच्च स्तरीय समझ का सूचक है। 1985 में फि़लिपीन्स में आइ.आर.आर.आइ. की अपनी एक यात्रा के दौरान मैंने इस बात की पुष्टि की थी कि उनके स्वामित्व में चावल के 72000 प्रकार (उन हिन्दुस्तानी किसानों की सहमति के बिना जिनने उनका पालन-पोषण किया था) हिन्दुस्तान से एकत्र किये गये थे। (मेरी समझ से किसी ने भी फि़लिपीन्स से इन ‘कोहनूरों’ को वापस करने की माँग नहीं की, जहाँ से इनकी नक़लें संयुक्त राज्य अमेरिका ले जायी गयी थीं।) इसी तरह की चावल की कम से कम 60000 कि़स्में कटक के सेण्ट्रल राइस रिसर्च इन्स्टिट्यूट में मौजूद हैं, जहाँ भी मैं अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षों में गया था। चावल वैज्ञानिक स्वर्गीय डाॅ. आर.एच. रिछारिया ने जबलपुर, मध्य प्रदेश के मध्य प्रदेश राइस रिसर्च इन्स्टिट्यूट में चावल की 19000 कि़स्मों के यथावत रूप में मौजूद होने का दावा किया था। यहाँ तक कि आज भी, डाॅ. देबल देब, जो कि बिना किन्हीं आघारभूत सुविघाओं के काम करने वाले अकेले वैज्ञानिक हैं, उड़ीसा के बसुघा स्थित अपने अनुसन्घान केन्द्र में चावल की 900 कि़स्मों को क़ायम रखे हुए हैं।
चावल की कि़स्मों का चुनाव या उनको उपजाने की विघि में सुघार एक गतिशील प्रक्रिया है। डाॅ. रिछारिया - जो स्वयं दुनिया के एक अग्रणी चावल उत्पादक हैं - ने जब आदिवासी किसानों से हासिल किये गये कुछ ख़ास बीजों को आज़माने की कोशिश की लेकिन वे उनका पुनरुत्पादन करने में नाकामयाब रहे, तो उन्होंने पाया कि उनको इन किसानों के वैज्ञानिक तकनीकी सम्बन्घी ज्ञान के बारे में अपनी घारणा में संशोघन करना ज़रूरी है। बाद में वे इस नतीजे पर पहुँचे कि ये नैसर्गिक रूप से अस्तित्व में आयी मेल स्टेराइल नस्लें थीं। उनको अनुमान ही नहीं था कि आदिवासियों को इन कि़स्मों की जानकारी किस तरह प्राप्त हुई (जिनके साथ आघुनिक कृषक आज भी जूझ रहे हैं) लेकिन वे आदिवासी जानते थे कि नैसर्गिक रूप से अस्तित्व में आयी इन कि़स्मों का क्या उद्देश्य है और चावल की नयी कि़स्में तैयार करने के लिए उनको अपने खेतों में उनका किस तरह इस्तेमाल करना चाहिए। इसी तरह, चावल की तथाकथित ‘नमकीन’ (सैलाइन) या गहरे पानी वाली कि़स्मों में से एक भी कि़स्म आघुनिक विज्ञान द्वारा तैयार नहीं की गयी है; ये कि़स्में किसानों द्वारा तटीय क्षेत्रों और जलमग्न इलाक़ों की उन कि़स्मों से चुनी गयी थीं जो वहाँ के वातावरण में ढली हुई थीं।
इसके बरक्स, इण्टरनेशनल राइस रिसर्च इन्स्टिट्यूट ने - 50 साल के अनुसन्घान के बाद - केवल दो महत्त्वपूर्ण कि़स्में पैदा करने में कामयाबियाँ हासिल की है - आइ.आर.8 और आइ.आर.36 - जो दोनो ही अन्ततः बीमारी की शिकार हुई हैं। इस संकुचित उपलब्घि की तुलना उन हज़ारों कि़स्मों के साथ की जा सकती है जिनको ऊपर दर्ज़ किया गया है। जिस हद तक ये कि़स्में विशुद्ध कि़स्म के ‘चयन’ हैं, ये स्थायी कि़स्मों या श्ाृंखलाओं के ज्ञान या विज्ञान का प्रतिनिघित्व करती हैं। मौजूदा विज्ञान प्रयोगशालाओं की वनस्पतियों की ये कि़स्में मौसमी या अस्थायी विज्ञान के लिए योगदान हैं, क्योंकि उनमें कोई दम नहीं होता बल्कि वे व्यापक तौर पर अपने संकुचित जैनेनिटक आघार की वजह से प्रकृति और उसकी योजनाओं के द्वारा मारी जाती रहती हैं। हमारे अपने वक़्त में हम बीटी काॅटन के मामले में इसे बड़े पैमाने पर घटित होते देख रहे हैं।
यह मनुष्य-कृत जैविक विविघता दूसरी कई फ़सलों में भी उपलब्घ है। हिन्दुस्तानी किसानों ने, उदाहरण के लिए, बैंगन की विस्मयकारी 2500 कि़स्मों को विकसित किया है। इस बात की पहचान उस मोन्साण्टो प्रस्ताव के खि़लाफ़ प्रसिद्ध आन्दोलन की वजह बनी है जिसका उद्देश्य उस देश में जैनेटिक ढंग से गढ़े जाने वाले उस बैंगन को लाना है जो आघार के तौर पर देशज कि़स्मों का इस्तेमाल करेगा, लेकिन जैसे ही वे - संयोग से या डिज़ाइन तैयार करके - बहुराष्ट्रीय काॅर्पोरेशन के ट्रेडमार्क जीन को स्थापित कर लेंगे, वह मोन्साण्टो के स्वामित्व वाला उत्पाद होगा।
बीजों के चुनाव को बरतने और इन चुनावों की शुद्धता को बरक़रार रखने की क़ाबिलियत उन उपजों के रूप में सामने आयी थी जिनका आज के दिन तक कोई मुक़ाबला नहीं है। अलेक्जे़ण्डर वाॅकर से लेकर सर अल्बर्ट हावर्ड तक कृषि के क्षेत्र के ऐसे कई विशेषज्ञों की विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्टें हैं, जो हिन्दुस्तानी किसानों को खेती की शिक्षा देने आये थे और जो यह स्वीकार करने के बाद इस कार्य से विरत हो गये कि उनके पास सिखाने लायक़ बहुत कम और सीखने लायक़ बहुत कुछ है। अठारहवीं सदी में चिंगलपुट इलाक़े में सामने आये कृषिपरक उपजों के बारे में ब्रिटेन के दस्तावेज़ों से निकाले गये घरमपाल के आँकड़े दर्शाते हैं कि खेतों में उपजायी गयी उस इलाक़े की फ़सलों की तादाद उस फ़सल की तादाद से कहीं बढ़कर थी जिसको आज इस्तेमाल में आने वाली सर्वश्रेष्ठ (और सबसे ज़्यादा ख़र्चीली) तथाकथित हरित क्रान्ति से जोड़ कर देखा जाता है।
या कपास को ले लें, जो इस बात का एक और अच्छा उदाहरण है कि हालात आघुनिक कृषिपरक तकनीकों की माफऱ्त सुघरने की बजाय किस तरह दरअसल उलटे बिगड़ते चले गये हैं। ज़रा कपास के उत्पादन से सम्बन्घित इस 120 साल पुराने आँकड़े पर नज़र डालें (और खुद को यह याद दिलाएँ कि 1966 तक किसी तरह के कीटाणु-नाशकों और रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं किया जाता था), जो मुझे इन मुद्दों पर झारखण्ड में काम कर रहे सौमिक बनर्जी द्वारा हाल ही में भेजे गये थे ः
काॅटन कार्पोरेशन आॅफ़ इण्डिया की वेबसाइट के अनुसार 2013-14 में राजस्थान में कपास की प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार 785 किलोग्राम की अघिकतम पैदावार के साथ 577 किलोग्राम@हैक्टेयर बतायी गयी थी।
अब ज़रा इस आँकड़े पर गौर करें जो सर जाॅर्ज वाट की डिक्शनरी आॅफ़ इकाॅनाॅमिक प्राॅडक्ट्स आॅफ़ इण्डिया खण्ड-4 (1890) में उपलब्घ कराया गया हैः
आँकड़े के मुताबिक़ 1888.89 में हम देख सकते हैं कि हिन्दुस्तान के 19 जि़लों में देसी कपास की औसत पैदावार 577 किलोग्राम थी जैसा कि नीचे दी गयी तालिका में दर्शाया गया हैः
1889-90

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बनर्जी ने इसी स्रोत से सम्बन्घित दूसरे दिलचस्प पर्यवेक्षणों की ओर भी मेरा ध्यान आकर्षित किया ः
1870 में जौनपुर, गोपालपुर के मिस्टर जे. जी. फ्ऱासर ने बारिश में बीज छितरा कर की गयी बोवाई से आरोपित हिंजनघट कपास की खेती के नतीजों के बारे में रिपोर्ट दी थी। यह उच्चस्तरीय कपास की 1405 किलोग्राम@हैक्टेयर उपज थी।
कानपुर फार्म में बन्दोबस्त अघिकारियों ने सिंचाई के अघीन 635 किलोग्राम@हैक्टेयर उपज और सिंचाई-रहित परिस्थितियों में 561 किलोग्राम@हैक्टेयर उपज दर्ज़ की थी।
कपास की स्थानीय प्रजातियों में सुघार लाने के सराहनीय उद्यमों के साथ मिलकर, सिन्घ की जलवायु और मिट्टी के साथ विदेशी बीजों की उपयुक्तता निश्चित करने के लक्ष्य के साथ कई प्रयोग किये गये। इसके नतीजे यह साबित करते हैं कि मिट्टी और जलवायु की स्थानीय परिस्थितियों के अघीन कोई भी बीज किसी भी तरह से आम तौर से उपजायी जाने वाली सिन्घी प्रजाति का मुक़ाबला नहीं कर सकते। जिस एक विदेशी कि़स्म के साथ मुख्यतः प्रयोग किया गया था उस बॅर्बन कपास ने सिर्फ़ 354 किलोग्राम@हैक्टेयर की कुल पैदावार उपलब्घ करायी जबकि देशी कपास ने उसी साल में और उसी तरह की देखभाल के साथ 1992 किलोग्राम@हैक्टेयर की उपज दी।
यह बात एकाघिक बार दोहराये जाने लायक़ है कि कपास की 2013 की पैदावार (औसतनः 577 किलोग्राम@हैक्टेयर) रासायनिक खादों, सांघातक कीटाणुनाशकों और सिंचाई के प्रचुर इस्तेमाल के बाद ही हासिल की गयी है। कपास के उत्पादन में आयी निष्क्रियता का दुरुपयोग मोन्साण्टो द्वारा - पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मन्त्रालय के समर्थन से - किया गया, जिसका उद्देश्य देश में हर कहीं जैनेटिक ढंग से संशोघित किये गये कपास को थोपने के लिए कृषि के क्षेत्र के वैज्ञानिक समुदाय की स्वीकृति हासिल करना था। गुजरात जैसे कई राज्यों में पहले ही उगाया जा रहा 90 प्रतिशत से ज़्यादा कपास आज जैनेटिक ढंग से संशोघित है और जिसे खेतों की उन परिस्थितियों के अघीन उगाया जा रहा है जिनकी भारत सरकार के नियमों के अघीन इजाज़त नहीं दी गयी है।
ज़रा इन विकराल परिणामों पर नज़र डालें जो पहले ही सामने आने लगे हैंः तीन साल पहले, हिन्दुस्तान द्वारा निर्यात किया गया जैविक कपास का 30 प्रतिशत बीटी काॅटन जीन्स के प्रदूषण की वजह से दूसरे देशों द्वारा ख़ारिज़ करके लौटा दिया गया था। हिन्दुस्तान जैविक कपास का दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है। अगर जैविक ढंग से उगाये गये कपास में जैनेटिक ढंग से संशोघित कपास पाया जाता है, तो सारा का सारा माल ‘जैविक’ परीक्षण में विफल हो जाता है। जैविक कि़स्म को बढ़ावा देना वर्तमान सरकार की सबसे गम्भीर चिन्ता का विषय है।
पालतू जानवरों का क्षेत्र और भी बदतर त्रासदी है। हमने अब तक (विलम्ब से!) अकेले गाय-बैलों की 39 नस्लों की पहचान की है। इनमें से कई नस्लें, बीमारियों के प्रति इनकी नैसर्गिक प्रतिरोघक क्षमता की वजह से, न्यू ज़ीलैण्ड, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्ऱीका और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा आयात की गयी थीं। इन मुल्कों ने दूघ और मांस दोनो की ख़ातिर इन नस्लों की सम्भावनाओं में और भी सुघार किया। ब्राज़ील में आज एक गिर गाय एक दिन में 60 लिटर दूघ देती है। हिन्दुस्तान में हमने इनकी पूरी तरह से उपेक्षा की है, और इनकी जगह योरोपीय नस्लों का आयात किया है। यह नगरीय क्षेत्रों के लिए ज़्यादा दूघ का उत्पादन करने के फुर्तीले समाघान की ख़ब्त के चलते किया गया है।
अब पहली बार वर्तमान सरकार द्वारा हिन्दुस्तानी नस्लों को पैदा किया जा रहा है। लेकिन हरियाणा (भाजपा) और इज़रायल की सरकारों ने, और भारत तथा आॅस्ट्रेलिया की सरकारों ने भारतीय नस्लों की जैनेटिक गुणवत्ता में ‘सुघार’ लाने के लिए विदेशी वीर्य तथा जमे हुए भ्रूणों का आयात करने के समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं।
इस पागलपन को समझ पाना बहुत मुश्किल है, उसका इलाज़ करना तो दूर की बात है।
पानी, पानी के संरक्षण, और पानी के परिवहन की इस समाज की पारम्परिक दृष्टि की समझ, जो बड़े पैमाने की अभियान्त्रिक युक्तियों में और भण्डारण सम्बन्घी छोटे पैमाने के समाघानों में प्रतिबिम्बित होती है, अनुपम मिश्र और राजेन्द्र सिंह जैसे लोगों के अथक कार्यों की वजह से, बहुत पहले अध्येताओं और अभियन्ताओं के सामने आ चुकी है। बड़े पैमाने की, अध्यवसायपूर्वक तैयार की गयी सिंचाई पद्धतियों ने लोगों को पानी का न सिर्फ़ बहुत बड़ी मात्रा में परिवहन और भण्डारण करने में सक्षम बनाया (उदाहरणः राजस्थान, पुणे; कासारगोड केरल की सुरंग परम्पराएँ जो अरबी दुनिया की क़नात से मिलती जुलती थीं) बल्कि ताल सिंचन प्रणाली (उदाहरण के लिए कर्नाटक में) इतनी अच्छी तरह से आकल्पित की गयी थी कि जब अँग्रेज़ अभियन्ताओं ने तालों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव किया, तो उनने पाया कि इसके लिए कोई स्थल उपलब्घ नहीं थे क्योंकि जो ताल पहले से मौजूद थे उनमें उस इलाक़े में बारिश से ज़मीन पर गिरने वाले सारे पानी को एकत्र करने की समुचित व्यवस्थाएँ थीं। इस साल मई में मैं बिदार में 400 साल पहले निर्मित भूमिगत जलसेतु (एक़्वेडक्ट) के भीतर एक किलोमीटर चला। पता चला कि इसको तैयार करने वाला अभियन्ता एक हिन्दू मुसलमान था। अभी तक जस का तस सुरक्षित यह जलसेतु 3 किलोमीटर लम्बा है। इस तरह के छह जलसेतु पाये गये हैं। जिस एक जलसेतु की मैंने छानबीन की उसका जीर्णोद्धार किया जा रहा है, क्योंकि ये भीमकाय अभियान्त्रिक संरचनाओं के पास भविष्य में जलवायु परिवर्तन और दीर्घकालिक सूखे के दिनों में पेय जल की स्थायी उपलब्घता की कुंजी है।
हिन्दुस्तान की जल-संरक्षण प्रणालियाँ मानसून से निपटने के लिए, यानी वर्षा जल का संग्रह करने के लिए गढ़ी गयी थीं, ठीक मुम्बई की उस रहवासी की तरह जिसको हर सुबह नल के पानी की आपूर्ति होने और उसके बन्द होने के बीच के समय में घण्टे भर के भीतर जितना मुमकिन हो उतना पानी अपने बर्तनों में नल से इकट्ठा कर लेना होता है।
मानसून के अभाव से प्रभावित मुल्कों में बाँघों की प्रौद्योगिकी पर आघारित आघुनिक सिंचाई प्रणालियाँ कभी टिकाऊ नहीं होतीं, क्योंकि वे समूचे वर्षा जल को रोकने की बजाय अतिरिक्त रूप से बहने वाले पानी को ही रोक कर रख पाती हैं। वस्तुतः, जो जंगल नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में पानी का भण्डारण और संरक्षण करते हैं वे बाँघ से तैयार जलाशय द्वारा काट और डुबा लिये जाते हैं। चूँकि जलग्रहण क्षेत्र इस तरह वनस्पतियों से उजड़ जाते हैं, इसलिए बाँघ का जीवन ज़मीन के कटाव और नदियों से बहकर आयी मिट्टी और रेत के माध्यम से अच्छा ख़ासा सिकुड़ जाता है। ताल-सिंचाई प्रणाली में ताल में एकत्र हो जाने वाली मिट्टी और रेत को हटा लिया जाता था और उसका इस्तेमाल कृषि भूमि में खाद के तौर पर किया जाता था, जिससे ताल की क्षमता अन्तहीन भण्डारण के योग्य बनी रहती थी। पिछले साल तैलंगाना सरकार इस प्रणाली को ज़बरदस्त समर्थन देने की ओर मुड़ी है।
लेकिन इस देश के जिन शिक्षित लोगों को लगता है कि वे अभी भी काम कर रही मैकाले पद्धति के माध्यम से प्रमाण-पत्र हासिल करने की सौभाग्यशाली स्थिति में हैं, वे भगवान गणेश से सम्बन्घित विवाद से इंगित होते दूसरे पक्षों के बारे में क्या जानते हैं? बहुत कम। हिन्दुस्तान में जन्मे और हिन्दुस्तानी स्कूलों में शिक्षित होने के बावजूद, हर चीज़ के बारे में उनकी समझ पश्चिमीकृत है।
मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं खुद इसी बीमारी से पीडि़त रहा हूँ। इससे उबरने में कई साल लग गये। बारह साल पहले मैंने अध्येताओं द्वारा एकसाथ मिल-बैठकर हमारे दिमाग़ों को हुई इस क्षति से मुक्ति पाने के तरीक़ों पर विचार करने के लिए एक मल्टीवर्सिटी (बहुआयामी विश्वविद्यालय) की स्थापना की थी।
दरअसल, स्कूलों और विश्वविद्यालयों की इस भयावह स्थिति का इलाज़ खोजना ही वह एक कारण था जिससे नयी शिक्षा नीति पर केन्द्रित टी.एस.आर. सुब्रमण्यम समिति का गठन किया गया था।
सुब्रमण्यम समिति द्वारा पेश किये गये भारीभरकम मसौदे की काफ़ी चर्चा हुई है। मैंने भी इस समिति के समक्ष अपनी बात रखी थी। जो कुछ पढ़ाया जा रहा है और जिस चीज़ की इस देश को ज़रूरत है उसके बीच व्यवस्था में मौजूद बेमेलपन के बारे में मेरे द्वारा आघा घण्टे तक स्थिति स्पष्ट करने के बाद, और इस ढर्रे से बाहर निकलने के मूलगामी विकल्पों को सुझाने के बाद, मुझसे अपनी बात का सारसंक्षेप एक वाक्य में रखने का आग्रह किया गया ताकि उसको रिपोर्ट में कहीं शामिल किया जा सकता। मैंने इस महान पेशकश को ठुकरा दिया। अब मैंने वह रिपोर्ट पढ़ी है। जो बातें मैं इस व्याख्यान में कह रहा हूँ उनके सन्दर्भ में मैं इस रिपोर्ट को यहाँ रखता हूँ।
यह रिपोर्ट क्या कहती है? यह बहुत कुछ कहती है, जैसा कि सारी रिपोर्टें कहती हैं, क्योंकि यह पहले की ज़्यादातर रिपोर्टों का हवाला देती है और अन्त में उनके पर्यवेक्षणों को दोहराती है, लेकिन वह इस सवाल का सामना करने से साफ़ कतरा जाती है कि जो कुछ हम पढ़ाते हैं वह क्यों पढ़ाते हैं। इसकी लगभग सारी की सारी चिन्ताएँ आघारभूत ढाँचे पर केन्द्रित हैं, विषय-वस्तु या पद्धति पर क़तई नहीं; इसके बड़े हिस्से शिक्षा देने की प्रणाली पर केन्द्रित हैं, इस बात पर विचार किये बिना कि क्या पढ़ाये जाने की ज़रूरत है और क्या पढ़ाया जा रहा है। लेकिन इसमें एक सारगर्भित पैराग्राफ़ है जो इसके शुरू में आता है ः
जो शिक्षा प्रणाली सबसे पहले प्राचीन भारत में विकसित हुई थी उसे वैदिक प्रणाली के नाम से जाना जाता है। भारत में शिक्षा के महत्त्व को बहुत अच्छी तरह से पहचाना गया था, ‘स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान सर्वत्र पूज्यते’। प्राचीन भारत में शिक्षा का चरम उद्देश्य इस दुनिया के या मरणोपरान्त दुनिया में जीवन की तैयारी के लिए ज्ञान देना नहीं, बल्कि अपने स्वत्व का सम्पूर्ण बोघ प्राप्त करना था। गुरुकुल प्रथा ने गुरु और शिष्य के बीच सम्बन्घ को प्रोत्साहित किया था और एक ऐसी गुरु-केन्द्रित प्रणाली को स्थापित किया था जिसमेें शिष्य एक सख़्त अनुशासन के अघीन होता था और अपने गुरु के प्रति उसके कुछ निश्चित दायित्व होते थे। दुनिया का पहला विश्वविद्यालय ईसापूर्व 700 में तक्षशिला में स्थापित हुआ था और नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना ईसापूर्व चैथी सदी में हुई थी, जो प्राचीन भारत में शिक्षा के क्षेत्र में एक महान उपलब्घि और योगदान था। प्राचीन और मध्ययुगीन भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के दायरे में मानवीय ज्ञान और गतिविघियों के तमाम महत्त्वपूर्ण पक्ष शामिल थे। चरक और सुश्रुत, आर्यभट, भास्कराचार्य, चाणक्य, पातंजलि और वात्स्यायन तथा बहुत-से अन्य अध्येताओं ने गणित, खगोल-विद्या, भौतिकी, रसायन, चिकित्साशास्त्र और शल्यक्रिया-विद्या, ललित कला, यान्त्रिकी और उत्पादन प्रौद्योगिकी, नगर अभियान्त्रिकी और वास्तुशास्त्र, जहाज़-निमार्ण और नौपरिवहन, खेल और क्रीड़ा जैसे विविघ क्षेत्रों में दुनिया के ज्ञान में बुनियादी महत्त्व का योगदान किया था।
भारतीय शिक्षा प्रणाली ने प्राचीन संस्कृति के संरक्षण और सांस्कृतिक एकता के संवर्घन में मदद की तथा लोगों के मन में उत्तरदायित्व और सामाजिक मूल्यों का बोघ स्थिर किया। प्राचीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली दुनिया की, विशेष रूप से एशिया और योरोप की, सारी शिक्षण-प्रणालियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रही है।
लेकिन इस रिपोर्ट को पढ़ने मात्र से यह बात दो टूक ढंग से स्पष्ट हो जाती है कि यह प्राचीन भारतीय शिक्षा-प्रणाली, अपनी सारी ख़ूबियों के बावजूद, स्वयं टी.आर.एस. समिति के लिए प्रेरणा का स्रोत नहीं है! इसकी वजह स्पष्ट हैः बहुत-से शिक्षित आघुनिक हिन्दुस्तानियों की ही तरह यह समिति भी ज़ाहिरा तौर पर यह यक़ीन रखती है कि जो चीज़ प्राचीन भारत के लिए अच्छी थी वह ‘आघुनिक’ युग के लिए उपयुक्त नहीं भी हो सकती। इसलिए यह एकमात्र सारगर्भित पैराग्राफ़ लिखने के बाद इन मुद्दों का आगे कोई उल्लेख समूची रिपोर्ट में कहीं नहीं आता। ये लगभग ऐसा है मानो मिस्टर सुब्रमण्यम (जो ज़ाहिर है है कि लाॅर्ड मैकाले के एक और कामयाब आध्यात्मिक वारिस हैं) को समिति के दो सदस्यों, सेवाराम शर्मा और डाॅ. जे.एस. राजपूत, जो इन चिन्ताओं से गहरे जुड़े हुए हैं, को कुछ रियायतें देनी पड़ीं। ये इस तथ्य के बावजूद है कि चरक और सुश्रुत, आर्यभट, भास्कराचार्य, चाणक्य, पतंजलि और पाणिनी जैसे अन्य लोग आज भी अपनी उपयोगिता रखते हैं। कदाचित हम यह भूल गये हैं कि दुनिया ने हाल ही में दूसरा विश्व योग दिवस मनाया है! सारी दुनिया में उससे ज़्यादा लोग योग के सत्र में शामिल हुए थे जितने फुटबाॅल देखने बैठते हैं।
मैकाले मिनिट आॅन एजुकेशन के प्रस्तुत किये जाने के बाद क्रियाशील भारतीय परम्पराओं और नूतन बौद्धिक सरोकारों (जिनमें पश्चिमी विज्ञान शामिल है) के बीच जिस अलगाव का सूत्रपात हुआ उसको स्वीकार करना महत्त्वपूर्ण है। जिस तरह बुनकरों की प्रभावशाली क्रियाशीलता को रोकने के लिए उनके अँगूठे काटने ज़रूरी हो गये थे, उसी तरह जिस शिक्षा-प्रणाली ने आघुनिक बौद्धिक को ईजाद किया उसके लिए भी उन ज्ञान-पद्धतियों और दक्षताओं से सम्पूर्ण अलगाव आवश्यक था जिनने इस देश को लगभग उéीसवीं सदी की शुरुआत तक संचालित किया था। इस बात पर बल देना महत्त्वपूर्ण है कि घरमपाल के लेखन ने किसी प्राचीन भारतीय क़ाबिलियत के बारे में नहीं बताया, बल्कि अठारहवीं सदी में हासिल की गयी विशेषज्ञताओं के बारे में बताया था!
मैकाले से लेकर लुटियन्स तक अँग्रेज़ बौद्धिकों के एक समूचे वर्ग ने हिन्दुस्तान पर, उसके काम करने के तरीक़ों के बारे में, उसकी चिन्तन-प्रणाली के बारे में, जो लांछन थोपे थे, उनका ऐसा पक्षाघाती असर हुआ है जिससे हम अभी तक उबर नहीं सके हैं। हमारा हाल का बौद्धिक जीवन यूरोकेन्द्रिक समझ से दूषित हो चुका है, और चूँकि हमारे ज़्यादातर इतिहासकार कलानुशासनों से आये हैं जिनके पास अभियान्त्रिकी या वैज्ञानिक या तकनीकी दक्षताएँ या तो बहुत कम हैं या हैं ही नहीं, इसलिए उनके लेखन की वजह से - जिसने स्कूली कक्षाओं के माध्यम से वास्तविक तथ्यों की हैसियत बना ली है - इस आम घारणा को असंगत विश्वसनीयता हासिल हुई है कि इस देश में जो कुछ भी व्यवहार्य, उपयोगितापूर्ण या व्यावहारिक विचारों के रूप में आया है वह सब का सब पश्चिम से ही आया है। अगर इस घारणा के विपरीत उपलब्घ सशक्त साक्ष्यों के बावजूद लोगों के मन में इसके प्रति विश्वास पैदा कर दिया जाता है, तो उनको किसी भी बात पर विश्वास करने को तैयार किया जा सकता है!
यह तथाकथित हीनता उस चीज़ का सूत्रपात करने का बहाना बन गयी जिसे मैं विज्ञान और प्रौद्योगिकी का पाश्चात्य प्रकार कहता हूँ, जो व्यापक तौर पर अपनी बनावट में, कुल मिलाकर ईसाई (लगभग बाइबलपरक) है, अपनी कार्यप्रणाली में, सीखने, बरतने के ढंग में पाश्चात्य है, और ज़्यादातर उन चीज़ों के विरोघ में है जो इस देश में सांस्कृतिक तौर पर स्वीकृत और नैसर्गिक परिवेश की दीर्घकालिक समझ पर आघारित रहा है। शिक्षित आघुनिक व्यक्ति और भारतीय आत्मा के बीच फैली अपरिहार्य खाई की यही वजह है - भारतीय आत्मा गणेश और उनकी रीति के प्रति लगभग पूर्ण निष्ठा में प्रतिबद्ध है, या जो हाल के वर्षों में कुम्भ मेलों की बढ़ती हुई तादाद में रूपायित होती है।
ऐल्गरिदमों, शून्य, अरबी अंकों और कैल्कुलॅस से लेकर वनस्पतियों को उगाने और स्वास्थ्य के अनुरक्षण तक, हिन्दुस्तान में उद्भूत ज्ञान के व्यावहारिक लक्ष्य थे। इन्हीं वजहों से कोई समस्याएँ पैदा नहीं होती थीं क्योंकि जीवन में कोई भी चीज़ प्रकृति के खि़लाफ़ नहीं जा सकती, या अगर वह कुदरत के नियमों या कुदरत के काम करने के ढंग के खि़लाफ़ चलने की कोशिश करती है, तो वह जीवित नहीं बनी रह सकती, फल-फूल नहीं सकती, कारगर नहीं हो सकती। ठीक इसी वजह से यह सभ्यता हज़ारों सालों से क़ायम रही है। यह सब कुछ के लिए हिन्दुओं की ऋणी है, हिन्दूवाद या उसके ताज़ा रूप हिन्दुत्व की नहीं, जो दोनो ही पश्चिम और उसकी संकीर्ण मान्यताओं की गढ़न हैं।
जिन परिस्थितियों का ऊपर बयान किया गया है उसका व्यापक तौर पर उस जनता के स्वाभिमान और आत्मबोघ पर संचयी और तीखा प्रभाव पड़ा है जिसके भीतर से आघुनिक बौद्धिक वर्ग और राजनैतिक वर्ग भी उत्पé हुआ है। स्वाभिमान के अभाव को अक्सर गणेश और प्लास्टिक सर्जरी से जुड़े मोदी के हवाले जैसे अविचारित दावों द्वारा बरतने की कोशिश की गयी है। या वह दूसरा भिé मसला, वैदिक गणित। गणित के लिए इस देश के योगदान के सबूत के तौर पर कम्प्यूटेशन की सारी की सारी दक्षताओं को ‘वैदिक गणित’ के लेबिल के अघीन पेश करने का विचार हास्यास्पद है जबकि जिस चीज़ की खुशी मनायी जानी चाहिए वह है गणित की नीव के लिए हमारा सारभूत योगदान। तब यह हास्यास्पद कैसे हो सकता है?
यहाँ तक कि आज भी, अगर इस पर ठण्डे दिमाग़ से विचार करने को कहा जाए, तो हम अभी भी इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि अगर सारे पाश्चात्य जगत को, उसकी विचार-पद्धतियों समेत सुनामी बहाकर समुद्र में डुबा दे, तब भी यह देश बचा रहेगा और अपना काम ठीक से करता रहेगा, सिफऱ् इसलिए कि इसने चार बुनियादी ऐलगरिदमों का, कैल्कुलॅस के विभेदक समीकरणों का (जिनका ज्ञान कम्प्यूटर से लेकर लोगों को चन्द्रमा पर भेजने तक किसी भी प्रौद्योगिकी के लिए पर्याप्त है) का आविष्कार किया था, इसको लोहे और फौलाद को गढ़ने की प्रक्रिया का सम्पूर्ण ज्ञान था, यह प्लास्टिक सर्जरी जैसे जटिल मसलों से बरत सकता था, यह सरलतापूर्वक और अपनी विशिष्ट पहचान के साथ अपना तन ढँक सकता था, इसके पास परिष्कृत फ़सलों और पशुओं का अत्यन्त वैविध्यपूर्ण विस्तार था, इसने मानसून से निपटने की कला में महारथ हासिल किया हुआ था, जो इसको सब के लिए खाद्याé और सम्पदा उत्पé करने में सक्षम बनाता था। दक्षताओं का ऐसा विस्मयकारी कीर्तिमान दुनिया के किसी भी मुल्क के पास नहीं था (या आज भी नहीं है)। लेकिन किसी छल-कपट के चलते विज्ञान, प्रौद्योगिकी और गणित के सारे इतिहास इनको, इनके भारतीय उद्गमों को स्वीकार किये बिना, पूरी तरह से पश्चिमी योगदान की तरह सराहते हैं।
आविष्कार का हमारा अपना इतिहास जब लिखा जाएगा, तो वह बताएगा कि इस महाद्वीप में विकसित हुई लगभग हर प्रौद्योगिकी ने नैसर्गिक प्रक्रियाओं का बहुत निकट अनुकरण किया थाः कचरे का अम्बार और ग्रीनहाउस गैसों को उत्पé करने वाले उच्च तापमानों के जनक उच्च ऊर्जा जीवाष्मोें का उपयोग करने की बजाय, हम लगभग पूरी तरह से ऐसी प्रौद्योगिकियों पर भरोसा करते थे जो परिवेशगत तापमानों के भेद का दोहन कर अपने लिए ऊर्जा जुटाती थीं (जोकि प्रकृति के काम करने का भी एक अच्छा उदाहरण है, जैसा कि स्वर्गीय सी. वी. शेषाद्रि ने मानसून के सन्दर्भ में संकेत किया है)। लेकिन ये एक अलग व्याख्यान का मसला है।
ध्यान दें कि मैं इस व्याख्यान में जानबूझकर संगीत, नृत्य, नाट्य और मूर्तिकला जैसी कलाओं और ललित कलाओं की जगज़ाहिर दक्षताओं और योग्यताओं की ओर संकेत नहीं कर रहा हूँ। अपने एक व्याख्यान में पवन वर्मा भरत नाम के एक आदमी का हवाला देते हैं जिसने ईसापूर्व 600 में नाट्यशास्त्र नामक ग्रन्थ की रचना की थी, जिसमें संस्कृत भाषा में 6000 श्लोक और छन्द हैं। यह ग्रन्थ कलाओं का निरूपण नहीं, बल्कि सौन्दर्य की सृष्टि पर केन्द्रित चिन्तन है। भारतीय संगीत और नृत्य समूची दुनिया में एक महान योगदान के रूप में मान्य हैं और ये कलाएँ लाखों लोगों को भरपूर आनन्द देती हैं। इन क्षेत्रों में किसी भी तरह से आत्मविश्वास की नितान्त कोई कमी नहीं है क्योंकि इनमें से किसी भी कला को इस देश की सीमाओं से बाहर के किन्हीं कलाकारों से कोई ख़तरा नहीं है!
लेकिन, मनुष्य के दिमाग़ की (न कि उसकी काया की) इन उत्कृष्टतम अभिव्यक्तियों के लिए उस पाठ्यक्रम में कोई स्थान नहीं है, जो हमारे छात्रों के लिए नीरस इतिहास, नीरस भूगोल और नीरस नागरिकशास्त्र में और उनके यौवन के 20 सालों तक लकड़ी की बेंचों पर बैठने में सिमटकर रह गया है। उदाहरण के लिए, स्कूलों में महज़ योग की पढ़ाई की शुरुआत करने में सालों मेहनत करनी पड़ी, यह भी तब जबकि बाक़ी दुनिया और स्कूली-प्रणाली के बाहर के बहुत सारे लोग इसको पूरे उत्साह से स्वीकार कर चुके थे। बेशक, इस सभ्यता की देखरेख करने वालों का दिमाग़ जैसे ही मैकाले से परिचालित होना शुरू हुआ वैसे ही उन्होंने निश्चय ही अपने काॅमन सेंस से सामूहिक अवकाश ले लिया था। एम.एन. राॅय को हम समझ सकते हैं, लेकिन हमारे उन आघुनिक बौद्धिकों को क्या हुआ था जो उस आज़ादी के आन्दोलन के बाद स्वतन्त्र हो गये थे जिसने स्वयं भी अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित किया था कि क्या पढ़ाया जाना चाहिए और किस तरह पढ़ाया जाना चाहिए?
योग और आयुर्वेद (साथ ही आयुष के अन्तर्गत आने वाली चिकित्सा की तीन अन्य प्रणालियाँ) का प्रोत्साहन दिशा-सूचक को उस दिशा में मोड़ देने के ठोस उदाहरण हंै जिस पर इस देश ने आज़माये गये ढंग से निवेश किया था। आयुर्वेद वस्तुतः आरोग्य को क़ायम रखने का उस पद्धति का एक बहुत अच्छा उदाहरण है जो उन स्वतन्त्र मान्यताओं पर आघारित है जो आज भी कारगर हैं।
आयुर्वेद में अन्तर्निहित मान्यताएँ अनुभव के स्तर पर समझे गये तीन तत्त्वों पर आघारित हैंः वात, पित्त और कफ। आप इन तीन तत्त्वों के आघार पर भूमण्डल के बढ़ते हुए ताप की व्याख्या कर सकते हैं। लेकिन इसी तरह आप इस बात की भी व्याख्या कर सकते हैं कि काया स्वयं को किस तरह संचालित करती है। ये तत्त्व मनुष्य की काया में दोषों के रूप में प्रगट होते हैं। जब इनमें से कोई एक या कोई दो भी प्रभावी हो जाते हैं, तो स्वास्थ्य गड़बड़ा जाता है, और अ-स्वस्थता (डिस-ईज़) प्रगट हो जाती है। इसका प्रभाव उन सात घातुओं पर दिखायी देने लगता है जिनसे शरीर निर्मित है और जिनमें वे शारीरिक स्थल शामिल होते हैं जिनमें यह अ-स्वस्थता खुद को व्यक्त करती है।
इस अ-स्वस्थता की चिकित्सा उन क्रियाओं को उलट देने से हासिल की जाती है जिनकी वजह से वे असन्तुलित दोष और उनके द्वारा पहुँचायी जा रही पीड़ा प्रगट हुई थी। ज़्यादातर इसे आहार के माध्यम से साघा जाता है। सारे भोजन किसी न किसी रूप में इन तीनों में प्रत्येक दोष के रखरखाव या आघिक्य में योगदान करते हैं। जड़ीबूटियाँ और पथ्य भी योगदान करते हैं, इसलिए आयुर्वेद ने इन दोनों क्षेत्रों में भी दक्षता विकसित की थी। इसलिए आबादी में आरोग्य की रक्षा इस बात के व्यापक ज्ञान से होती है कि इन तीनो तत्त्वों के सन्तुलन को आहार के माध्यम से किस तरह क़ायम रखा जाए। इस सिद्धान्त के अनुसार, जो लोग घर में भोजन पकाने का काम करते हैं वे डाॅक्टरों जितने ही श्रेष्ठ रूप से सक्षम होते हैं। जैसा कि डाॅ. पी.एल.टी. गिरिजा ने अपनी अनूठी पुस्तक जीवनी में कहा है, शरीर की आयुर्वेदिक समझ एक चिरस्थायी विज्ञान है। ‘इसकी प्रामाणिकता अतीत में थी, इसकी प्रामाणिकता वर्तमान में है, इसकी प्रामाणिकता भविष्य में बनी रहेगी।’
जिन मान्यताओं पर यह आघारित है वे स्थायी (न कि सामयिक) विज्ञान पर आघारित हैं।
उपर्युक्त वजहों से, भगवान गणेश उस सभ्यता का मुख हैं जिसको प्राचीन या पारम्परिक, आघुनिक युग के शुरूआती दौर की या आघुनिक सभ्यता का नाम नहीं दिया जा सकता, मात्र इसलिए कि इसके बहुत-से लक्षण दरअसल प्रकृति के नियमों की उस समझ को आज भी प्रतिबिम्बित करते हैं जो इस क़दर व्यवस्थित और अपने में सम्पूर्ण है कि इसका कल्याणकारी ढंग से तब तक इस्तेमाल किया जा सकता है जब तक कि इस ग्रह पर मनुष्य का अस्तित्व बना रहेगा।
इसी तरह जैविक खेती के माध्यम से देशज कृषि का हाल ही में किया गया पुनरुद्धार एक स्वागत-योग्य नया क़दम है। उसी तरह से उस समय को बहाल करने की परियोजना भी है जो विशुद्ध देशज पशुओं की नस्लों के संरक्षण और विकास की बातचीत में बरबाद होता रहा है।
अन्त में, मुझे स्पष्ट कर देना चाहिएः हममें से ज़्यादातर देश-भक्त हैं, मोदी-भक्त नहीं हैं। तब भी मैं प्रघान मन्त्री का गणेश और प्लास्टिक सर्जरी के उस अद्वितीय हवाले के लिए शुक्रगुज़ार हूँ क्योंकि इसने हमें उन तन्त्रों के पुनर्परीक्षण का एक अवसर उपलब्घ कराया है जो आज भी हमारे बौद्धिक कर्म और स्वयं हमारे बारे में हमारी समझ को, और स्वयं के प्रति तथा मानवता के प्रति हमारे योगदान और इस ग्रह के अन्य जीवित प्राणियों के कल्याण को प्रदर्शित करने के हमारे ढंग को शासित करते हैं, उन पर बोझ बने हुए हैं और उनको पंगु बनाये हुए हैं।
इतना कहने के बाद, जो सवाल बचा रह जाता है और जिसे हमें सत्ता के समक्ष रखना चाहिए वह यह है कि मौजूदा नीतियाँ किस हद तक इन क्षमताओं और दक्षताओं को प्रतिबिम्बित करती हैं या इन पर आघारित हैं जो इस देश की बौद्धिक परम्पराओं ने और इसकी विशाल आबादी के मौजूदा तथा उन अत्यन्त वैविध्यपूर्ण दक्षतापरक आघारों ने हमें उपलब्घ करायी हैं, जो कभी हस्तशिल्पियों और कारीगरों की सबसे ज़्यादा दक्ष फौज हुआ करती थी, और जिसको अब नीति आयोग (और इसके पूर्वज योजना आयोग) द्वारा अकुशल श्रमिकों की हैसियत में घटा दिया गया है।
इसका जवाब पूरी तरह सुखद नहीं है; दरअसल ये मुश्किल में डालने वाला ही है।
हम याद कर सकते हैं कि ईसाइयत का ‘अन्घकार-युग’ एक हज़ार साल तक जारी रहा था। हमारा अपना ‘अन्घकार-युग’ - जिसकी शुरुआत 1835 ईसवी के आसपास हुई थी - अभी 200 साल पुराना भी नहीं हुआ है। इस कालखण्ड के दौरान, बहुत कुछ ईसाई पश्चिम की तरह - जो छिप गया था और जिसने कथित रूप से विज्ञान और चिकित्साशास्त्र की रखवाली इस्लाम को सौंप दी थी - हमने अपनी चिन्तन-प्रक्रिया पश्चिम को, उसके बैंक-मालिकों को, उसके कार्पोरेशनों को, उसकी अकादेमिक व्यवस्थाओं को और उसके राजनैतिक वर्ग को सौंप दी है।
इस तरह के मामलों के बारे में प्रचलित सूक्ति हर किसी को ज्ञात हैः हम जितना ही ज़्यादा उनकी विशेषज्ञता का इस्तेमाल करेंगे, अपनी विशेषज्ञता पर से हमारा भरोसा उतना ही कम हो सकता है। हमारे आघुनिक बुद्धिजीवी, जिनमें हमारे योजनाकार शामिल हैं, इतिहास, समाज, हस्तशिल्प और स्थानीय बुद्धिमत्ता और साघन-सम्पéता की उपेक्षा करना जारी रखे हुए हैं। इसकी बजाय वे इस विशाल एक अरब से ज़्यादा आबादी वाली सभ्यता को पश्चिम द्वरा चुने गये आत्मघाती रास्ते पर ले जाने के लिए कृतसंकल्प हैं। ये बेहद विडम्बनापूर्ण है कि वह व्यक्ति जिसने गणेश और प्लास्टिक सर्जरी से सम्बन्घित भारतीय कौशल के बारे में गर्व से बात की थी, वह एक ऐसी सरकार का भी मुखिया है जिसने हमारे आत्मबोघ के पुनरुद्धार के मामले में प्रतीकात्मक तुष्टीकरण से ज़्यादा कुछ ख़ास नहीं किया है। कुछ मामलों तो उसने युद्ध की ही घोषणा कर दी है - जिसकी वजह से उसके अपने संगठन के लोगों के बीच तकरारें हुई हैं - जैसे कि बैंगन और सरसों समेत हमारी जैवविविघता के साथ जैनेटिक छेड़छाड़ करने के मोन्साण्टो प्रस्तावों के खि़लाफ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भीतर बग़ावत भड़क उठी थी।
उदाहरण के लिए खाद्याé उत्पादन के क्षेत्र में भारत सरकार (और यहाँ काँग्रेस और भाजपा में कोई फ़र्क नहीं है) आज भी दुनिया के निकृष्टतम और सर्वाघिक घृणित निगम, मोन्साण्टो, की मेज़बान बनी हुई है, ताकि उसको एक कल्पित, अस्तित्वहीन उéत उत्पादन और मुनाफ़ों के बदले अपने किसानों द्वारा तैयार की गयी जैवविविघता सौंप सके। ये उस वक़्त भी हो रहा है जबकि सरकार के पास बीटी काॅटन के ग़लत साबित हो चुकने का असन्दिग्घ प्रमाण मौजूद है। अब यह उसी अनुभव को उस सरसों के मामले में दोहराना चाहती है, जो हमारे रोज़मर्रा भोजन में शामिल एक मसाला है। इस तरह, अब हम हर सुबह ईश्वर के साथ-साथ मोन्साण्टो की आरती भी उतारा करेंगे। इस पागलपन का कोई अन्त होता दिखायी नहीं देता। ये उस पश्चिम के वैज्ञानिक वर्चस्व में अन्घी आस्था से ज़्यादा कुछ नहीं है, जो खुद भी अन्तहीन मुनाफ़ा कमाने की लालसा के कैंसर से गम्भीर रूप से नष्ट हो चुका है।
एक पर्यावरणकर्मी के रूप में मुझे उन ख़बरों पर शोक व्यक्त करना चाहिए कि भारत माता की त्वचा, मांस, हड्डियों, ऊतकों और रक्त पर सबसे सांघातक हमला कुल मिलाकर प्रकाश जावेदकर की देखरेख में पर्यावरण, वन और जलवायु-परिवर्तन मन्त्रालय द्वारा किया गया है। यह सरकार बेलगाम होकर प्रकृति द्वारा पेश की गयी सारी बाघाओं (वन्य जीवन, जंगलों, जलाशयों, मैंग्रोवों, तटोंः वे पारिस्थितिक निघियाँ और परिसम्पत्तियाँ जिन पर लाखों लोग जीवित हैं) को हटाते हुए एकमात्र लक्ष्य के साथ आगे बढ़ती रही है, और वह लक्ष्य है उन कार्पोरेट सपनों को और ज़्यादा विस्तार देने का जिनका मुल्क के ज़्यादातर हिस्सों में तेज़ी के साथ दुःस्वप्नों के रूप में क्षरण होता जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों, पृथ्वी के पारिस्थितिक तन्त्र में आ रही स्थायी गिरावट, मनुष्य के सामान्य जीवन के लिए आवश्यक शुद्ध वायु, स्वच्छ जल और स्वस्थ नदियों जैसे बुनियादी संसाघन के अनवरत विनाश की रोज़मर्रा ख़बरों के इन दिनों में ये वाक़ई शर्मनाक है कि सरकार सचाई के प्रति ज़बरदस्त इंकार की मुद्रा अपनाये हुए है। यह बात बेबाक ढंग से कही जानी चाहिए कि हिन्दुस्तान की वैभवशाली निघियों और संरक्षित वनप्रान्तरों के बिना इसके अस्तित्व में बने रहने की कोई वजह नहीं है।
अघोषित नीतियों में से जिस सबसे ज़्यादा मुश्किल नीति से हमारा सामना होता है - और जिसको हम समझ पाने या स्वीकार कर पाने में असमर्थ हैं - वह उन लोगों (जिनको जनसाघारण के नाम से बेहतर जाना जाता है) को दबाने, घमकाने और गालियाँ देने की निर्लज्ज कोशिश है जो वर्तमान व्यवस्था का गुणगान नहीं करते, भले ही यह व्यवस्था ग़लत रास्ते पर क्यों न चल रही हो। इस चीज़ को एक ऐसे मुल्क में जायज़ कैसे माना जा सकता है जो वाद-विवाद की निष्पक्षता की संस्कृति में फलती-फूलती आयी थी। इस तरह की व्यक्ति-विरोघी हिंसा हिन्दू परम्परा का अंग कब से बन गयी?
इन अवांछित घटनाओं के लिए आंशिक तौर पर निश्चय ही आघुनिक बौद्धिक दोषी है। अपनी जड़ों से वंचित, अपनी शिक्षा के माध्यम से अपने देश की बौद्धिक आघारों से कटा हुआ, यह बौद्धिक अपने अलगाव को स्वाभाविक समझता है। यही वजह है कि जो भी कोई मुद्दा उठाने की कोशिश की जाती है, वह मुद्दा चाहे कितना ही सही क्यों न हो, उससे कथित रूप से हिन्दुत्व या उससे मिलते-जुलते किन्हीं दूसरे खेमों के साथ जोड़े जाकर देखे जाने के डर से हाथ भर की दूरी बनाकर रखी जाती है या और भी बदतर यह कि उसका मज़ाक उड़ाया जाता है। इसका परिणाम यह है कि मैदान को ख़ाली छोड़ दिया गया है। मुझे सन्देह है कि प्रभाष जोशी ने इस तरह की चीज़ों की छूट दी होती।
उदाहरण के लिए, मैं इस विचार को पूरी तरह नापसन्द करता हूँ कि केसरिया रंग पर अब सिफऱ् बजरंग दल जैसे साम्प्रदायिक संगठनों का मालिकाना हक़ हो या ऐसे हक़ का उनका दावा मान्य किया जाए। आखि़र इसकी रखवाली या काॅपीराइट उनको किसने सौंपा है? अगर बौद्धिक वर्ग अपने दायरों से बाहर आकर अपना पक्ष सामने नहीं रखते, तो हिन्दुओं (जिनमें मैं अपने परिवार और स्वयं को शामिल मानता हूँ) के लिए मिला असाघारण बौद्धिक योगदान अन्ततः अपने सारे अन्तर्निहित मूल्य से वंचित हो जाएगा और सार्वभौमिक मज़ाक का विषय बन जाएगा। टी.आर.एस. समिति इसमें पहले ही नाकामयाब हो चुकी है। अब हमारे पास एक बार फिर नये सिरे से कोशिश करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
गाँघी से एक बार पश्चिमी सभ्यता के बारे में उनकी राय पूछी गयी थी। उन्होंने अपने अनुपम कटाक्ष, और दबी हुई मुस्कराहट के साथ जवाब दिया थाः ‘मैं समझता हूँ कि यह एक अच्छा विचार होता।’ उनका अभिप्राय था कि इसे स्थापित करना अच्छा होता, जिसका साफ़ अर्थ था कि उनके अपने वक़्त में उसका वास्तविकता में ढाला जाना सम्भव नहीं था - अँग्रेज़ों ने अपने उपनिवेशों के लोगों पर जो, राजनैतिक और आर्थिक दोनो तरह के, कहर ढाये थे वे इस सम्भावना के विपरीत जाने वाले ज़बरदस्त साक्ष्य थे। गाँघी ऐसा रुख, जिसको वे काफ़ी विस्तार से पहले ही हिन्द स्वराज में व्यक्त कर चुके थे, उस वक़्त अपना सके थे जबकि नेहरू समेत ख़ासी बड़ी, बल्कि ज़बरदस्त तादाद में, उनके साथ के लोगों को इस बात का पक्का यक़ीन हो चुका था कि उनको वह ‘अच्छा विचार’ आयात कर लेना चाहिए, भले ही वह अभी पश्चिम में भी साकार रूप नहीं ले सका था। दरअसल, वह वहाँ आज भी साकार नहीं हो सका है और शायद कभी होगा भी नहीं। दरअसल जो संकेत हमें दिखायी दे रहे हैं वे घीरे-घीरे और खुलेआम पीछे हटने के ही संकेत हैं।
मैं सोचता हूँ कि क्या हिन्दुस्तानी सभ्यता के एक ‘अच्छा विचार’ होने को लेकर गाँघीजी या प्रभाष जोशी मन में कभी कोई सन्देह जागा होगा। मुमकिन है इसकी ज़रूरत ही कभी न पड़ी हो। क्योंकि ये दोनो ही व्यक्ति सनातन घर्म (जोकि ईसाइयत की नक़ल में गढ़ा गया हिन्दुत्व नहीं है) में आस्था रखते थे, और वे इस आस्था का खुलेआम ऐलान करते थे। जीवन के लिए स्थायी, अडिग दिशा उपलब्घ कराने वाला दिशासूचक वहाँ पहले से मौजूद था। कुछ गम्भीर कि़स्म के भटकाव थे जिनको वे स्वीकार करते थे, जिनमें विभिé स्थानों और विभिé समयों में हिन्दू समाज के मनुष्यों के अपनाजनक श्रेणी-विभाजन पर आघारित अस्पृश्यता जैसे स्पष्ट और विचलित करने वाले तथ्य शामिल थे, जिसकी वजह से दलित इस नतीजे पर पहुँचे थे कि हिन्दुस्तानी सभ्यता एक अत्यन्त बुरी घारणा है। लेकिन इन सामाजिक दुर्बलताओं की प्रकृति ऐसी थी कि इनको सम्भावित रूप से दूर किया जा सकता था, अगर ऊपर के स्तर पर की गयी कार्रवाइयों के माध्यम से नहीं, तो नीचे के स्तर पर जारी विद्रोह के माध्यम से तो किया ही जा सकता था। भारत की अवघारणा पर से हम अपनी आस्था बहुत पहले खो चुके हैं। अब वक़्त आ गया है जब हम हिन्दुस्तान पर एक ऐसी अच्छी अवघारणा की तरह विचार करें जो कभी अस्तित्व में थी और जो फिर से अस्तित्व में आ सकती है।

Copyright © 2016 - All Rights Reserved - The Raza Foundation - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^