‘छपाक्’! सोपान जोशी
08-Jun-2019 04:30 PM 972     

तीन व्यंजनों को मिला कर बना एक शब्द है ‘छपाक्’। एक बार इसे सस्वर बोलिए, अपने ही कानों में इसे सुनिये। इसकी गूँज में गहरायी से निकलता एक देसी विचार सुनायी देगा। मिट्टी, पानी और सफ़ाई के सम्बन्ध्ा का विचार। छ-पा-क...दनी से।
‘छ’ की पहली ध्वनि तालू और जिह्ना से ऐसे छन्न-छन्न करती हुई निकलती है जैसे गरम तेल में पकौड़ा तलने के लिए बेसन का गोला डाला गया हो। फिर साँस मुँह के अगले हिस्से की तरफ़ आती है, दोनों होंठ मिल कर ‘प’ बनाते हैं ‘आ’ के स्वर के साथ, जैसे पानी का एक बुलबुला फूटा हो। फिर यह शब्द कण्ठ के भीतर जाकर ‘क्’ की ध्वनि में समा जाता है, जैसे भोजन का एक निवाला निगल लिया हो। ‘छपाक्’ में तीन ध्वनियाँ हैं, एक तालव्य, एक ओष्ठ्य, एक कण्ठ्य।
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पद्मा वांग्याल ने यह शब्द जब दो बार कहाः ‘छपाक् छपाक्’, तब वह किसी खाद्य पदार्थ की बात नहीं कर रहा था। वह शरीर के एक दैनिक कर्म से होने वाली ध्वनि की नकल कर रहा था। वही आवाज़ जो आधुनिक शौचालय यानी ‘वेस्टर्न कमोड’ पर बैठ कर टट्टी करते समय आती है। जब पिछले दिन खाया हुआ भोजन मल के टुकड़ों के रूप में हमारे शरीर से निकलता है और नीचे पड़े पानी पर गिरता है।
पद्मा को इस ध्वनि से घिन आती थी। उसके किसान कानों के लिए यह बरबादी की आवाज़ थी। कैसी बरबादी? सिंचाई के लायक ताज़ा पानी और खाद के लायक मल-मूत्र, दोनों मिला कर किसी अन्धे कुँए में डाले जाने की। वह भी लद्दाख के ठण्डे रेगिस्तान में, जहाँ सिंचाई की कमी किसानों को हमेशा से सताती आयी है! जहाँ की रेतीली मिट्टी में अगर कुदरती चीज़ों को सड़ा कर बनायी हुई खाद न डाली जाए तो कोई भी फ़सल उगाना मुश्किल हो जाए। बिना खाद की रेतीली मिट्टी में रेत के कण पानी रोक नहीं पाते हैं। यानी खाद नहीं हो तो पानी की कमी दुगुनी हो जाती है। पर ठण्डे रेगिस्तान में तो पेड़-पौधे गरम रेगिस्तान से भी कम होते हैं। कहाँ से इतना चारा पैदा हो और इतने जानवर पाले जाएँ जिनसे गोबर की खाद मिल सके?
इस समस्या का काट लद्दाखी समाज की मेधा ने न जाने कितना पहले निकाल ली थी। उसका एक तीन व्यंजनों वाला सुन्दर नाम भी रखा दिया था, ‘छागरा’, यानी एक कमरे का दो तल वाला पारम्परिक शौचालय। लद्दाख के गाँवों और शहरों में ऐसे ही शौचालय न जाने कब से बनते आये हैं। ऊपरी तल पर फ़र्श के बीच में एक छेद होता है, जिस पर उकड़ूँ बैठ के मलत्याग किया जाता है। निचले तल पर मल-मूत्र का ढेर लगता जाता है। इस तल के पिछले हिस्से की दीवार में एक किवाड़ होता है, जिसे खोल के इकट्ठे हुए मल-मूत्र को निकाला जा सकता है। लद्दाख के जाड़े में तापमान शून्य से 20 डिग्री नीचे तक चला जाता है। मल में मौजूद रोगाणु ज़्यादा समय बच नहीं पाते, और समय के साथ मल-मूत्र गल के मिट्टी जैसा होने लगता है, उसकी दुर्गंध जाती रहती है। जब गर्मी में लद्दाख के खेतों में पैदा होने वाली एकमात्र फ़सल का मौसम आता है, तब यह मल-मूत्र खाद के रूप में खेत में डाला जाता है। मिट्टी में उगने वाली पैदावार से जो खाद्य पदार्थ लद्दाखी लोग पाते हैं उसे खाद के रूप में मिट्टी में लौटा देते हैं।
ऐसा ही एक ‘छागरा’ पद्मा वांग्याल के यहाँ था, उसके पुश्तैनी गाँव खरू में। हमारी मुलाकात सन् 2003 के अक्टूबर के महीने में हुई थी। मैं लद्दाख के पर्यावरण पर एक लेख लिखने लेह पहुँचा था। लेख का मुख्य हिस्सा खेती पर था, किन्तु ऐसे लोग नहीं मिल रहे थे जो खेती कर रहे हों। सरकारी नीतियों की वजह से वहाँ खेती बहुत बुरे हाल में थी और युवकों की सेना में भर्ती की वजह से गाँवों में जवान लोग कम होते जा रहे थे। पद्मा की आँख ज़रा कमज़ोर थी, इसलिए फ़ौज में उसकी भर्ती नहीं हो सकी थी। कई साल पहले, उसके दादा ने लद्दाख में सहकारिता आन्दोलन की नींव रखी थी। परिवार की लगभग 50 एकड़ की खेती लायक ज़मीन थी। पद्मा उद्यमी था, वहाँ खेती करने लगा था। मेरा परिचय 29 साल के पद्मा से यह कह कर करवाया गया कि वह एक युवा, ऊर्जावान किसान है।
उसी दिन पद्मा और मैं लेह नगर से निकल के उसके गाँव खरू आ गये। उसका घर खेत के बीच ही था। उजाला रहते-रहते हम खेत घूमते रहे, बतियाते रहे। कब दिन ढला पता ही नहीं चला। बगल में बहती सिन्धू नदी का निनाद कान में गूँज रहा था, ऊपर आकाशगंगा साफ़ दिखायी दे रही थी। ठण्ड बढ़ने पर हम भीतर जा के सो गये। सुबह उठ कर मैंने पद्मा से पूछा कि पाखाना किधर है तो उसने घर से बाहर बने हुए ‘छागरे’ की ओर इशारा किया। यात्राओं के दौरान मैं तरह-तरह की जगहों पर मलत्याग करने गया हूँ। पाखाने के नीचे गहरा कुँआ कई बार देखा था। उसकी गहराई से मल के गिरने की आवाज़ आती थी। ऐसे ही एक बार हिमनद के किनारे भी सुबह उकड़ूँ बैठा हूँ और जंगलों में निवृत्त होने के तो अनेकानेक रोचक किस्से हैं। पर ऐसा शौचालय कभी नहीं देखा था, जिसमें मल-मूत्र ऐसे सहेजा जाता हो। यही नहीं, इसका इस्तेमाल खेत में खाद से खाद्य बनाने में होता था। निपटने के बाद मैंने पद्मा से पूछा, ‘तुम्हें मल-मूत्र को छागरे से निकालते हुए घिन नहीं आती?’
पद्मा को मेरा सवाल समझ में ही नहीं आया, जैसे किसी ने बहुत ही सहज बात को असहज बना दिया हो, सरल क्रिया को ऊल-जलूल जामा पहना दिया हो। जब मैंने उसे अपने शहरी अन्दाज़ में समझाया कि मल से घृणा की वजह से सफ़ाई करने वाली पूरी-की-पूरी जातियाँ ही अछूत बना दी गयी हैं, तब उसे समझ में आया कि मैं किस घिन की बात कर रहा हूँ। लद्दाख में छागरे से मल-मूत्र निकाल कर खेत में डालना सहज क्रिया रही है, लोग इसे मिल-जुल के ऐसे ही करते रहे हैं जैसे एक-दूसरे के खेत में बुआई और कटाई का काम होता है। उत्सव और शामिलाती भाव के साथ।
मेरे सवाल पर पद्मा थोड़ी देर चुप रहा। उसके चेहरे पर उलझन का भाव आ गया, जैसे किसी मिस्त्री के सामने कोई नया यन्त्र रख दिया गया हो, जिसे उसने कभी खोल के देखा ही नहीं है। फिर वह गुन्ताड़े का भाव एक झटके में हटा। उसने कहा कि उसे शहर में ‘वेस्टर्न कमोड’ पर बैठ कर टट्टी करने से घिन आती है। जब खाद-रूपी मल-मूत्र और सिंचाई-रूपी निर्मल जल बरबाद होता है, ‘जब नीचे से छपाक्-छपाक् की आवाज़ आती है।’
पत्रकारों को सवाल पूछना सिखाया जाता है। यह नहीं सिखाया जाता कि जब कोई बड़ा सत्य सामने आ जाए और आपके शोध तो क्या आपकी कल्पना तक का दायरा बहुत छोटा लगने लगे, तब क्या करना चाहिए, क्या कहना चाहिए। पहले पद्मा मेरे सवाल से निरुत्तर था, फिर मैं उसके ‘छपाक् छपाक्’ के आगे निरप्रश्न हो गया। एक पल में बोध हुआ कि यह ‘छपाक् छपाक्’ सहजता के विनाश का नाद है। इसके बारे में मैंने अपने लेख में लिखा। लेकिन यह साफ़ था कि इसका सटीक वर्णन करना मेरी पर्यावरण की पत्रकारिता के बूते की बात नहीं थी।
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हर पत्रकार के भीतर अनकही बातों का एक भण्डार होता है। ऐसी बातें जो किसी-न-किसी वजह से कभी लिखी नहीं जा सकी हों। आप चाहें तो इसे पत्रकारिता का अपशिष्ट भी कह सकते हैं, कचरा भी। ‘जल थल मल’ पुस्तक का बनना ऐसे ही ‘कचरे’ को संजोने की एक कहानी है।
दीन-दुनिया को टटोलने-परखने में पत्रकार तरह-तरह के लोगों से मिलते हैं। समय के साथ विविध जानकारी और विश्लेषण इकट्ठे होते जाते हैं। जो बातें पता चलती हैं, उन्हें कई छलनियों से छानना होता है। कौन-सी बात कहने लायक है? क्यों कहने लायक है? उस बात को अभी कहने का औचित्य क्या है? इकट्ठी हुई ज़्यादातर सामग्री इन छलनियों में छन के अलग हो जाती है, अनकही बातों के भण्डार में चली जाती हैं। थोड़ी-सी सामग्री ही ऐसी बचती है जिसके आधार पर कोई रपट या आलेख लिखा जा सकता है। अगर लिखने लायक बात मिल जाए तो एक दूसरी खोज शुरू होती है। फिर यह ढूँढ़ना होता है कि उसे लिखने का वाजिब तरीका क्या होगा। हर बार ऐसा हो नहीं पाता कि ठीक सामग्री भी मिल जाए और उसे लिखने का ठीक तरीका भी सूझ जाए। कभी यह हो जाता है और कभी नहीं भी होता। कभी तो कहने लायक बात अपने आप सामग्री में से प्रकट हो जाती है और कभी अथक प्रयास करने पर भी सधी हुई बात हो नहीं पाती। कभी सम्पादक को बात जम जाती है और कभी नहीं भी जमती। कभी लेख छप जाता है और कभी खुद को तसल्ली देनी पड़ती है।
सभी अनकही बातें बेकार नहीं होतीं। कुछ बातें काम की होती हैं, सत्य के किसी अहम पहलू को उजागर करती हैं, लेकिन फिर भी वे छप नहीं पाती। या तो पर्याप्त प्रमाण नहीं मिल पाते, या सम्पादक यह कह के मुकर जाते हैं कि लेख को छापने का कोई सामयिक कारण नहीं है, ‘इसे अभी क्यों छापें? दूसरी खबरें तो एकदम अभी छापने लायक हैं।’ बहुत से पत्रकारों का जीवन ‘तत्काल कोटे’ में ही खप जाता है। पत्रकारों आदतन पूछते हैं, ‘और नया-ताज़ा क्या है?’ रोज़ पानी पीने के लिए कुँआ भी रोज़ ही खोदना पड़ता है। जब किसी जाने-माने व्यक्ति ने हाल ही में कुछ नया और नाटकीय कर्म किया हो, तब ख़बर बन जाती है, लेख छप जाता है। कुछ गलत हो या सनसनीखेज़ हो, किसी साजि़श का पर्दाफ़ाश हो जाए, तब तो वारे न्यारे हो जाते हैं! पत्रकारिता का ज़्यादातर समय छिद्रान्वेशन में और मूर्ति-भंजन में ही जाता है। कोई मूरत गढ़ने की तो गुंजाइश ही नहीं होती है।
ऐसा बतलाया जाता है कि पत्रकारिता तो वही है कि आप कुछ ऐसा लिखें जिसे कोई-न-कोई छपने से रोकना चाहता है, जिससे किसी ताकतवर पक्ष को नुकसान पहुँचता हो। ऐसा भी कि अगर आपके लिखे को कोई भी छपने से रोकना नहीं चाहता या अगर उससे किसी को आपत्ति नहीं है तो फिर वह पत्रकारिता नहीं है, बल्कि जन-सम्पर्क या विज्ञापन है। पत्रकारिता ऐसी विधा बतलाई जाती है जो सत्ता प्रतिष्ठान से लोहा लेती है। जो ढेर खोज-बीन और ऊर्जा से हमारे ज्ञान और जानकारी की सीमा को लगातार आगे सरकाती है। जो तरह-तरह का जोखिम उठा कर लोकहित में काम करती है, जो ताकत के अहंकार में रहने वालों का पर्दाफ़ाश करती है। अगर किसी पत्रकार ने युद्ध ‘कवर’ किया हो तो यह सबसे विशेष तमगा बन जाता है। पत्रकारिता की दुनिया के महारथी तो युद्ध संवाददाता ही माने जाते हैं।
पत्रकारिता की नज़र सत्ता और अभिजात्य लोगों पर ही लगी रहती है। पत्रकारों की बातचीत में प्रसिद्ध और जाने-माने लोग अमूमन आते रहते हैं। जिन साधारण लोगों के गणतन्त्र के लिए पत्रकारिता काम करने का दावा करती है, उनके बारे में आपको सरलता से कुछ पता चलना मुश्किल होता है। जब राजनीतिक चुनाव हों या कोई प्राकृतिक आपदा जैसा असाधारण मौका आ जाए, तब साधारण लोगों की नब्ज़ टटोलने का काम होता है। लेकिन साधारणतया पत्रकार असाधारण लोगों और असाधारण परिस्थितियों को ही खोजते रहते हैं। पत्रकारों की अनकही बातों के भण्डार में प्रसिद्ध लोगों के बारे में बहुत से षडयन्त्र मिलते हैं, तरह-तरह की गप्पबाजी भी। किन्तु सहज-साधारण बातों के लिए, सहज-साधारण भाषा के लिए जगह नहीं होती है। साधारण लोग पत्रकारिता के उपभोक्ता तो बन सकते हैं, लेकिन पत्रकारिता के पात्र वे तभी हो सकते हैं जब उनके साथ कुछ असाधारण घटना घटे।
कई साल पहले पानी के व्यापार पर निदेशक देव बेनेगल ने एक फि़ल्म बनायी थी, शीर्षक था ‘स्प्लिट वाइड ओपन’ (1999)। उसका मुख्य पात्र ‘कटप्राइस’ उफऱ् ‘के.पी.’ एक जगह कहता है कि जब जीवन अच्छा होता है, तब टी.वी. पत्रकारिता खराब होती है और जब टी.वी. पत्रकारिता अच्छी होती है, तब जीवन खराब हो जाता है।
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लद्दाख पर मेरी रपट आयी-गयी हो चुकी थी। मैं नयी यात्राएँ कर रहा था, नये लेख लिख रहा था, नये विषय टटोल रहा था। कुछ महीने बाद ही मेरा काम भी बदल गया था। ‘डाउन टू अर्थ’ नाम की जिस विज्ञान और पर्यावरण की अँग्रेज़ी पत्रिका में मैं काम करता था, उसमें अब मुझे दूसरों के लिखे का सम्पादन करना था। कई संवाददाता और अनुसन्धानकत्र्ता पत्रिका के लिए लिखते थे। उनके जुटाए शोध और सामग्री में जलस्रोतों के प्रदूषण पर आये दिन तरह-तरह की जानकारी मिलती रहती थी। साफ़ था कि इसका सबसे बड़ा कारण शहरों के सीवर का मैला पानी है। इसमें नहाने-धोने और सफ़ाई का मैल तो बहता ही है, शौचालयों से होता हुआ नगरवासियों का मल-मूत्र भी होता है। हमारी नदियों और तालाबों में जो दुर्गन्ध्ा आती है, उसमें हमारे शरीर से निकला अपशिष्ट मुख्य है।
इसके ठीक विपरीत जनमानस में यह धारणा बैठी हुई है कि जल प्रदूषण का स्रोत कारखानों से निकलने वाले कचरे में है। उद्योग दिखने में बड़े होते हैं और कुछ स्थानों पर तो सही में कारखानों का मैला पानी नदियों में प्रवाहित होता है। इन जगहों पर लिखा भी खूब गया है और इनके चित्र भी छपते रहे हैं। किन्तु लोगों के लिए यह कल्पना करना कठिन है कि उन्हीं के शौचालय से निकलने वाला मैला हमारी नदियों और तालाबों को सड़ा रहा है। क्योंकि उन्हें तो बस वही थोड़ा-सा मैला दिखता है जो उनके शरीर से निकलता है। यह इकाई कब दहाई बनती है, कब सैकड़ा और कब गिनती के पार चली जाती है, पता ही नहीं चलता। जिन लाखों-करोड़ों लोगों की वजह से यह प्रदूषण हो रहा है, वे अपने इस प्रभाव से सर्वदा अनभिज्ञ हैं। उन्हें सिफऱ् अपनी सफ़ाई दिखती है, यह नहीं दिखता कि उनकी सफ़ाई से नदी और तालाब गन्दे हो रहे हैं। वे अपना कसूर न जानते हैं, न मानते हैं।
इस अज्ञान का एक और कारण है। हमारे नगरों का पानी दूर-दूर से लाया जाता है। किसी सुदूरवर्ती जलाशय से, किसी बाँध से, किसी नदी-तालाब से। पाइपलाइन आने के पहले ज़्यादातर घरों में पानी लाने के लिए कुँए-तालाब तक लोग जाते ही थे। उस समय उनका मोल था। जब पानी पाइप के रास्ते घर आने लगा, तब जल स्रोतों का मोल कम होने लगा।
यह बात आप बिना आलोचना के डर के साफ़-साफ़ नहीं कह सकते हैं क्योंकि आज घर-घर में पानी पहुँचाना हर सरकार का लक्ष्य बन चुका है। पाइप से घर में पानी पाना हर व्यक्ति का ‘बुनियादी अधिकार’ मान लिया गया है। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों में हर व्यक्ति को घर तक पाइप से पानी पहुँचाना ‘विकास’ की ज़रूरत कही जाती है। यह कहना बहुत बड़ा खतरा मोल लेना है कि पाइप के घर पहुँचने के साथ ही लोगों का जल-स्रोतों से सम्बन्ध्ा टूट गया है। शरीर और नदी में एक बहुत बड़ी दूरी आ गयी। अब नदी-तालाब से पानी निकाल के लोगों तक, घर तक पहुँचाना और उनके मैले पानी का निस्तार करना भी सरकार की जि़म्मेदारी बन चुकी थी।
जल स्रोतों की सफ़ाई का काम भी सरकार के अपने जिम्मे ले लिया था। सन् 1986 में केन्द्र सरकार ने गंगा नदी की सफ़ाई के लिए एक योजना खोली थी। उसके अँग्रेज़ी नाम में ही कर्मठता का जोश भरा हुआ था, ‘गंगा एक्शन प्लाॅन’। लेकिन कई साल और चरणों के बाद भी इस योजना से गंगा की सफ़ाई हो नहीं पा रही थी, अलबत्ता नदी की हालत लगातार खराब ही हो रही थी। लेकिन सरकार ने अपनी विफलताओं से प्रेरणा ले के इसे एक बड़ी परियोजना में बदल दिया था। गंगा का पानी तो और प्रदूषित ही हो रहा था, लेकिन सरकारी योजना फल-फूल के विशाल हो गयी थी।
अब इसमें सभी बड़ी नदियों की सफ़ाई का काम शामिल हो गया था। जिस तर्ज पर प्रदूषण से गंगा की मुक्ति नहीं हो सकी थी, उसी तर्ज पर अब दूसरी नदियों पर भी काम होने लगा था। सरकारी खातों में आवंटित धन का खर्च हो जाना काम का पूरा होना मान लिया जाता है। इसलिए योजनाएँ तो विधिवत पूरी हो रही थी, लेकिन नदियों में सड़ांध बढ़ती जा रही थी। इस कार्यक्रम के स्वतन्त्र मूल्याँकनों को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता था कि यह अट्टाहास भरते हुए किसी खलनायक का विद्रूप षडयन्त्र है। किसी विकृत कल्पना का गढ़ा हुआ भयानक मज़ाक!
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सन् 1986 में गंगा को साफ़ करने की परियोजना के आस-पास ही स्वच्छता के पहले बड़े कार्यक्रम का उद्घाटन भी हुआ था। अँग्रेज़ी में नाम रखा गया ‘सेण्ट्रल रूरल सैनिटेशन प्रोग्राम’, हिन्दी में उसका अनुवाद हुआ ‘केन्द्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम’। इसके अन्तर्गत गाँवों में रहने वाले लोगों के घरों में शौचलय बनाने पर अनुदान मिलने का प्रावधान था। कोई दस साल बाद जब इस कार्यक्रम का आकलन हुआ, तो इसकी सफलता असन्तोषजनक पायी गयी। सन् 1999 में इस कार्यक्रम को बदला गया और इसका अँग्रेज़ी नाम बदल के ‘टोटल सैनिटेशन कैंपेन’ रखा गया। यानी सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान। अब इसका ध्यान सिर्फ़ गाँवों में शौचालय बनाने पर नहीं था, बल्कि लोगों को स्वच्छता का महत्व बताने पर था। शौचालय बनाने का अनुदान अभी भी था।
इसके अन्तर्गत जो गाँव हर घर में शौचालय बना लें और खुले में मलत्याग करने की पद्धति को बन्द कर दें, उनके लिए ‘निर्मल भारत पुरस्कार’ का प्रावधान था। यह पुरस्कार पाने वाले गाँव को सरकारी विकास कार्यक्रमों में प्राथमिकता मिलने का इन्तज़ाम था। कई गाँवों को यह पुरस्कार मिले। फिर स्वतन्त्र आकलन में ऐसे कई गाँवों में लोग खुले में मलत्याग करते हुए पाये गये। यह बार-बार निकल के आ रहा था कि जिन गाँवों में पानी की किल्लत है, वहाँ शौचालय बनाने के बाद भी लोग उनका इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। यह बात योजना आयोग के कागज़ात में भी आ चुकी थी। खुद सरकार के विशेषज्ञ लिख रहे थे कि केवल एक लक्ष्य बना के उसके लिए धन आवंटित करने से काम बनने वाला नहीं था। कि स्वच्छता का मसला जटिल है और इस पर ठीक काम करने के लिए ‘बहुआयामी’ पद्धति अपनाने की ज़रूरत है। यह भी कि जब सरकारी महकमों को एक लक्ष्य दे दिया जाता है, तब उनमें उस लक्ष्य को कागज़ों में पूरा करने की अधीरता आ जाती है। यानी ज़मीन पर काम हुआ हो चाहे नहीं, सरकारी दस्तावेज़ों में काम पूरा हुआ दिखाया जाता है। व्यक्तिगत बातचीत में कुछ सरकारी लोग खुद बतलाते हैं कि सरकारी आँकड़े बहुत विश्वसनीय नहीं होते हैं।
ऐसी योजनाओं के प्रस्ताव भी सुनने में आ रहे थे, जिनमें गाँव के लोगों को वैसी ही सुविधाएँ देने की बात थी जैसी शहरों में लोगों को मिली हुई थी। यानी ग्रामीणों को भी शहरों की ही तरह पाइप से पानी मिले और उनके यहाँ भी फ़्लश करने वाले शौचालय हों, ताकि सभी का एक समान विकास हो पाये। लेकिन इन प्रस्तावों में यह बात कहीं नहीं की जाती थी कि शहरों ने अपनी सुविधाओं के लिए दूर-दूर से पानी लूटने के तरीके विकसित कर लिये हैं। यही नहीं, शहरों ने अपने जल स्रोतों में अपना मैला पानी, अपना मल-मूत्र डाल-डाल के उन्हें सड़ा के बरबाद कर दिया है। अब यही परिस्थिति गाँवों में खड़ी करने की बात चल रही थी।
सरकारी योजनाओं को अगर गहराई से जाँचा जाए तो लगता है कि इन्हें बनाने वालों का वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता है। बस, आदर्शवादी मुलम्मे और नारों में बात होती है। सरकारी निर्णयों के ऐसे विश्लेषण भी मिलते हैं जो ज्ञानी लोगों ने अथाह मेहनत से किये होते हैं। इनसे अगर सरकारी नीतियों में कोई बदलाव आ भी जाए तो उसकी सीमा होती है। हमारी सरकारों में और उनके विशेषज्ञों में अपने लोगों को, अपने समाज को, अपने पर्यावरण को समझने की रुचि कम ही दिखती है। अपने लोगों के प्रति हमारी सरकारों का रवैय्या अभी भी अँग्रेज़ शासन जैसा ही है। लोगों में आज भी सरकार के प्रति डर दिखता है।
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अगर पानी और शौचालय लोगों के घर तक लाने की कवायद चल रही थी, तो खाद खेत से दूर हो रही थी। बीते हुए कुछ सालों में कृषि पर रिपोर्टिंग करते हुए खेतिहर ज़मीन के बिगड़ते हाल के कि़स्से मेरे सामने आते रहे थे। ‘डाउन टू अर्थ’ पाक्षिक पत्रिका है। उसके लिए काम करने का एक बड़ा कारण यह था कि किसी विषय पर लिखने के लिए यात्रा करने का अवसर मिलता था। पर्यावरण और समाज को गहनता से समझने के मौके मिलते थे। मुझे कुछ राज्यों के गाँवों में तसल्ली से घूमने को मिला था। किसी गाँव पहुँचने पर वहाँ से निकलने की हड़बड़ी नहीं होती थी। इसीलिए तो लद्दाख में खेती पर लिखने के लिए पद्मा वांग्याल के खेत पर जाकर दो दिन बिताने का मौका मिला था। ज़्यादातर पत्रकारों को देश के अलग-अलग हिस्सों में घूम के इस तरह काम करने को नहीं मिलता है। यही नहीं, अगर कोई पत्रकार गहनता से किसी विषय को समझ के उस पर लिखना चाहे तो आसानी से इसके लिए समय और साधन मिल नहीं पाते हैं। ‘डाउन टू अर्थ’ में समय भी मिलता था और साधन भी। बल्कि यही अपेक्षा रहती थी कि हम लगातार गहरी समझ और नयी सामग्री पर काम करें।
कई गाँवों में किसानों के साथ उनके खेत-खलिहान या घर में बैठ के उनके जीवन और काम को समझने का अवसर मिलता था। धीरे-धीरे खेती की लागत पता करना आदत-सी बन गयी थी। इस हिसाब में जगह-जगह एक भयानक गणित उभरता दिखता था। फसल पैदा करने की कीमत बढ़ती ही जा रही थी, जबकि आमदनी में बढ़ोतरी के उदाहरण कम ही मिलते थे। किसानों के साथ बातचीत में दो बातें बार-बार उठ के आती थीं। एक, खेतों-घरों में जानवर कम होने से गोबर की खाद की कमी पड़ने लगी थी। गोबर की खाद का दाम बढ़ चुका था और किसानों की ज़रूरत पूरी नहीं हो पा रही थी। दो, यूरिया और फाॅस्फेट की बनावटी खाद का इस्तेमाल महँगे दुरुपयोग तक पहुँच चुका था। बनावटी खाद से पैदावार में जैसी बढ़ोत्तरी 1970 और 1980 के दशकों में मिली थी, वह अब बीती बात हो चुकी थी। ढेर-सी बनावटी खाद डालने के बावजूद फसल में जिस तरह की तरक्की की उम्मीद थी, वह नहीं मिल रही थी।
दिल्ली में रहने की वजह से कई तरह की शास्त्रीय विधाओं के विशेषज्ञों से मिलना आसान हो जाता था, उनका शोध और लेखन पढ़ने को मिल जाता है। यात्राओं पर किसानों और कार्यकत्र्ताओं से जो पता चलता था, उसे उनके साथ परखने का मौका मिलता था। यह साफ़ दिख रहा था कि हमारी खेतिहर ज़मीन बिगड़ रही है। यह भी कि प्राकृतिक साधनों के बिगड़ने की जैसी चिन्ता जल स्रोतों के प्रति जताई जाती है, वह मिट्टी के लिए नहीं है। जिस मिट्टी से हमारा भोजन आता है, उसे हम माटी के मोल आँकने लगे हैं। विश्व खाद्य संगठन की एक बैठक में दो भारतीय वैज्ञानिकों ने इस घटती उर्वरता का अन्दाज़ा पेश किया, अपने अध्ययन के आधार पर। उन्होंने हर साल उर्वरकों का घाटा एक करोड़ टन का आँका था।
इसके कारण चारों तरफ़ बिखरे हुए थे। पहले के ज़माने में, जब बनावटी खाद नहीं थी, तब गोबर की खाद का इस्तेमाल तो ज़्यादा था ही, किसान ज़मीन को कुछ समय के लिए ‘पड़त’ में छोड़ के आराम भी देते थे। मिट्टी में जान लौटाने का एक समय-सिद्ध तरीका था किसानों और घुमन्तु पशुपालकों के सम्बन्ध्ा में। कई जगह यह चलन था कि फ़सल कटने के बाद बचने वाली पुआल@पराली पर पशुपालक अपने मवेशी चराते थे, और किसानों को उनके गोबर से खाद ठीक अपने खेत पर ही मिल जाती थी। कई जगह तो किसान पशुपालकों को अपने खेत पर पशुधन को ‘बैठाने’ के लिए अलग से धनराश भी देते थे।
हमारी खेतिहर ज़मीन को उर्वर रखने में घुमन्तु जातियों के लोग और उनके पशुधन की बड़ी भूमिका थी। लेकिन अब जानवरों को बड़े-बड़े झुण्ड में ले के चलना आसान नहीं बचा था। वन विभागों को इन पशुओं के जंगल में चरने से आपत्ति होने लगी थी। कई पारम्परिक घुमन्तु जातियों को ज़मीन दे के बसाने के कार्यक्रम भी सरकारें चलाती रही हैं। हमारी राजनीतिक आज़ादी के बाद भी हमारी सरकारों ने अपने बहुत-से लोगों के साथ अँग्रेज़ सरकार जैसा ही रवैय्या बनाए रखा। इसका उदाहरण घुमन्तु जातियों के लोगों के साथ बैठ के उनका मर्म समझने से सहज ही मिल जाता है। हर किसी को ज़मीन का पट्टा दे के बसाने के राजनीतिक ध्येय ने कई ऐसे कारीगर समाजों को उनके समय-सिद्ध काम से दूर कर दिया है। ऐसे काम जो प्रकृति के चक्र और पंचमहाभूत की लीला में रमे हुए थे।
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एक दिन एक अनुसन्धानकत्र्ता की एक रपट सामने आयी। इसमें वर्णन था एक ऐसे शौचालय का, जिसके बारे में मैंने सुना तो था, लेकिन जिसे समझ नहीं सका था। जिस पद्धति से वह बना था उसे अँग्रेज़ी में ‘इकोलाॅजिक सैनिटेशन’ या संक्षिप्त में ‘इकोसैन’ कहते हैं। इसमें ऐसे शौचालय बनाये जाते हैं जिनमें मल-मूत्र को अलग-अलग इकट्ठा कर लिया जाता है। दोनों को गला के, खाद बना के वापस मिट्टी में डाला जाता है। इस पद्धति के बारे में मैंने सुना भी था, और इस पर लेख पढ़े भी थे। लेकिन जिसे अँग्रेज़ी के ‘डेवेलपमेण्ट जर्नलिज़्म’ के अनुवाद में ‘विकास पत्रकारिता’ कहा जाता है, उसकी लिखाई विशेषज्ञों द्वारा जनसाधारण को जागृत करने का भाव रहता है। इस अधीरता में कई बार सामग्री ऐसे लिखी जाती है कि उसकी व्यवहारिक कल्पना करना मुश्किल हो जाता है।
इस रपट के लेखक से मैंने सम्पर्क किया और उससे आग्रह किया कि वे एक बार फिर इस शौचालय को ध्यान से देख के आएँ और साथ में एक फोटोग्राफ़र भी ले जाएँ। वे जब लौट के आये, तब उन्होंने एक सुन्दर लेख तैयार किया, जिसमें ऐसे सूखे शौचालय का वर्णन था जिसमें से मल-मूत्र खाद बन के वापस मिट्टी में पहुँचता है। उस लेख के सम्पादन के दौरान मुझे लद्दाख का ‘छागरा’ याद आ रहा था। वह पारम्परिक शौचालय भी यही काम करता था, जो आधुनिक ‘इकोसैन’ पद्धति का यह नया शौचालय कर रहा था। मिट्टी का माल वापस मिट्टी में पहुँचाने का इन्तज़ाम। यानी स्वच्छता ऐसी जो जल स्रोतों को दूषित न करे और मिट्टी की उर्वरता वापस मिट्टी में लौटाए।
ऐसा लगने लगा था कि पानी-मिट्टी के स्वच्छता के सम्बन्ध्ा को ज़रा नयी नज़र से समझना चाहिए। यह तो कई साल से पढ़ता-सुनता आ रहा था कि कोलकाता नगर के पूर्व में ऐसे तालाब हैं जिनमें शहर के मैले पानी की उर्वरता से मछली पैदा की जाती है, फिर शहर के लोगों को ही बेची जाती है। इस पद्धति पर जो सामग्री मिली थी वह ‘विकास पत्रकारिता’ वाली ही थी। इसमें ‘माॅडल’ और ‘व्यवस्था’ इत्यादि का शोध खूब मिलता था, लेकिन उन मछुआरों के बारे में श्रृद्धा से पता नहीं चलता था।
शोध और श्रद्धा के अन्तर का अन्दाज़ा तो हम हिन्दुस्तानियों को सहज ही होता है, लेकिन उसका ठीक-ठाक बोध नहीं हो पाता। अपने घर-समाज में हमें श्रद्धा का सबक सिखाया जाता है, पर स्कूल-काॅलेज-दफ़्तर में हम शोध की दृष्टि ही सीखते हैं। वहाँ श्रद्धा को अन्धविश्वास माना जाता है। लेकिन हमारा परिवार गाँधी विचार की संस्थाओं के आस-पास ही रहा था। यह आग्रह परवरिश में मिला था कि अपने लोगों को, अपने समाज को, अपने पर्यावरण को अपनेपन की आँख से देखना चाहिए, चाहे उसकी आलोचना ही क्यों न करनी हो। थोड़ा-सा ज्ञान अर्जित कर के अपने लोगों को किसी पराये विशेषज्ञ की तरह नहीं देखना चाहिए, हिकारत की दृष्टि से तो एकदम नहीं। क्योंकि समाज का सहज ज्ञान व्यवहारिक होता है, उसे समझने के लिए उसे जीना पड़ता है। यह सिर्फ़ ‘फ़ील्ड’ में जाकर शोध करने का मामला नहीं होना चाहिए। इसके कुछ पारिवारिक कारण हैं।
मध्यप्रदेश के इन्दौर नगर में जन्में मेरे पिता प्रभाष जोशी ने अपनी काॅलेज की पढ़ाई सन् 1955 के आस-पास ही छोड़ दी थी। अँग्रेज़ गुलामी से देश आज़ाद हुआ ही था। गाँधीजी ने युवा लोगों को गाँव में जाकर ग्राम स्वराज का काम करने का मन्त्र तो दिया ही हुआ था। उन्होंने एक गाँव में लगभग पाँच साल रह कर मास्टरी की थी। सर्टिफि़केट न होने की वजह से उन्हें वह नौकरी छोड़नी पड़ी थी। फिर सन् 1960 में विनोबा भावे इन्दौर प्रवास के लिए आये और उन पर लिखते-लिखते प्रभाष जोशी पत्रकार हो गये। सन् 1968 में वे दिल्ली आये तो पेशेवर पत्रकारिता को पीछे छोड़ कर। सन् 1969 में मनने वाली गाँधी शताब्दी के प्रकाशन के काम में हाथ बँटाने वे दिल्ली आये और हमारा परिवार गाँधी स्मारक निधि में रहने लगा था। सन् 1973 में वे जब पेशेवर पत्रकारिता में लौटे तो वहाँ भी उनके काम के मूल्य गाँधी विचार से ही प्रेरित थे। पत्रकारिता उनके लिए सामाजिक काम का ही एक रूप था। उनके मित्र और सहयोगी भी ऐसे ही विचार के थे और उनका घर आना-जाना चलता ही रहता था। वे हम बच्चों से खूब प्यार से मिलते-जुलते, हमसे लाड़ लड़ाते और सहज ही उनका असर हम पर पड़ता।
ऐसे ही एक मित्र थे अनुपम मिश्र। वे गाँध्ाी स्मारक निधि में ही रहते थे। उनके परिवार से हमारा घरोपा ऐसा था कि अपने घर से ज़्यादा वहाँ रहने का मन रहता। अनुपम मिश्र हमारे लिए चाचा थे। बचपन में हमें यह नहीं पता था कि 1970 के दशक में भारत में पर्यावरण पर लिखने वाले शुरुआती लोगों में अनुपम चाचा थे। हम यह जानते थे वे पर्यावरण पर शोध करते हैं, लिखते हैं, अच्छे काम करने वाले कार्यकत्र्ताओं को संजोते भी हैं। हम बच्चे अनुपम चाचा के साथ घूमते थे, गाँध्ाी शान्ति प्रतिष्ठान में उनके दफ़्तर में आते-जाते भी थे। अनुपम चाचा पेशेवर पत्रकारिता में नहीं गये थे, इसलिए वे सीधे गाँध्ाीजी के मूल्यों वाला काम करते थे। वे बार-बार याद दिलाते थे कि अपने लोगों को, अपने समाज को सिफऱ् शोध की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। उसमें श्रद्धा का अंश भी डालना चाहिए। याद रखना चाहिए कि समाज में ऐसा बहुत कुछ है जो हम समझते नहीं हैं, क्योंकि उसका व्यवहारिक ज्ञान सदियों के अनुभव सहज बातों में समेट लेता है। उस सहज ज्ञान को समझने की कोशिशें सतत करनी चाहिए।
बचपन से अनुपम चाचा के साथ यात्राएँ भी की थीं। सन् 1993 में उनकी पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ छप के आयी। उसे बनाने में जो सालों की मेहनत लगी थी उसे क़रीब से देखने का मौका मिला था। कई सालों के शोध और अनुभव को उन्होंने बहुत सुन्दर और संक्षिप्त रूप में संजोया था, एक सधे हुए शिल्पी की तरह। जल प्रबन्धन की सामाजिक परम्पराएँ उनकी कलम से निकल के और सुन्दर दिखने लगी थीं, क्योंकि उनकी दृष्टि में शोध और श्रद्धा का मेल था। स्कूल-काॅलेज के दिनों से ही मैं उनके कुछ छोटे-मोटे काम करता रहता था। उनका काम करने का तरीका इतना मोहक और आनन्दकारी था, कि पता ही नहीं चला कि पर्यावरण में मेरी रुचि कब और कैसे बन गयी, कब पर्यावरण और समाज को गाँध्ाी विचार के मूल्यों से समझने का काम कब आकर्षक लगने लगा!
स्नातकोत्तर पूरा करने के बाद अकादमिक दुनिया में रहने का मन नहीं था। एक मित्र के साथ-साथ मैं भी एक अँग्रेज़ी अख़बार में भर्ती हो गया और मुम्बई चला गया। अख़बार में काम करना रोचक था, वहाँ सहयोगी और सम्पादक भी अच्छे मिले। लेकिन मेरा मन ख़बरों का पीछा करने से ज़्यादा उसमें लगता था, जो ख़बरों के पीछे हो। साल भर के भीतर ही दिल्ली वापस लौट आया। पर्यावरण पर निकलने वाली ‘डाउन टू अर्थ’ पत्रिका में डेस्क पर काम ढूँढ़ता हुआ पहुँच गया।
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‘साहित्य पढ़े हो? विज्ञान की पढ़ाई तो तुमने की ही नहीं है। जब कठिन वैज्ञानिक विषय सामने आएँगे तब क्या करोगे?’ यह सवाल पूछने वाले थे ‘डाउन टू अर्थ’ पत्रिका के सम्पादक अनिल अग्रवाल। मैंने जवाब दिया कि जो समझ में नहीं आएगा उसे पुस्तकालय में पढ़ के समझ लूँगा, कि 23 साल ऐसी उमर नहीं है कि कुछ नया समझा न जा सके। उन्होंने मुझे अपनी पत्रिका में उप-सम्पादक रखा लिया। वे बहुत कड़ाई से काम करवाते थे, उनकी अपेक्षाएँ अत्यधिक रहती थीं, और काम में किसी तरह की लापरवाही उन्हें मंज़ूर ही नहीं होती थी। उनकी डाँट सुन के लोगों के आँसू तक छूट जाते थे। लेकिन वे खुद इतनी मेहनत करते थे और इतनी तरह-तरह का ज्ञान उन्हें था कि उनके साथ काम करना रोमांचक अनुभव होता था।
वे कानपुर के आई.आई.टी. में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर के पत्रकार बन गये थे। देश-विदेश में काम करने का अनुभव उन्हें था। 1980 के दशक में जब भारत में पर्यावरण आन्दोलन पनपने लगे और एक नयी चेतना उभर के आने लगी, तब उसमें उनकी अग्रणी भूमिका थी। उनकी ख्याति अन्तर्राष्ट्रीय थी। वे ऐसे सम्पादक थे जो सही में सम्पादन करते हैं। शुरू में तो पत्रिका का एक-एक शब्द जाँचते थे। सीखने के लिए उत्सुक किसी युवा पत्रकार के लिए वे बहुत प्रभावशाली सम्पादक थे। तुलसीदासजी ने लिखा है, ‘बरषहिं जलद भूमि निअराए। जथा नवहिं बुध विद्या पाए’ लेकिन बादल का पास होना और भूमि का प्यासा होना भर पर्याप्त नहीं होता है। पानी को ग्रहण करने के लिए तालाब-टाँकी बनानी पड़ती है। सुपात्र बनना पड़ता है, जो टेढ़ा काम है।
जब नये लोगों में काम का बँटवारा होने लगा, तब अनिलजी ने मुझे विज्ञान पर हर अंक में 14 पन्ने निकालने की जिम्मेदारी सौंप दी। साफ़ था, वे मेरी परीक्षा लेना चाहते थे, देखना चाहते थे कि अँग्रेज़ी साहित्य की पढ़ाई कर के आया यह युवक कठिन विषयों को कैसे समझेगा। मेहनत करेगा या नहीं। मैंने तय कर लिया कि मुझे पर्यावरण की पत्रकारिता ही करनी है, सो मैं जुट के काम करने के लिए तैयार था। कभी-कभी तो पूरा-का-पूरा दिन पुस्तकालय में बीत जाता था, विज्ञान पर अच्छी सामग्री जुटाने के लिए। दिल्ली के सबसे अच्छे पुस्तकालयों में उसकी गिनती आती थी, और वहाँ दुनिया भर की श्रेष्ठ विज्ञान पत्र-पत्रिकाएँ आती थीं। लेकिन विज्ञान की दृष्टि से विषयों को समझने में बड़ी मुश्किलें आती थीं। विज्ञान का प्रशिक्षण पाये हुए किसी व्यक्ति के लिए जो बातें सहज होतीं, वे मेरे लिए बहुत कठिन बन जातीं। विषय भी नये थे और उनकी शब्दावली भी अनजान थी। कई बार तो शब्दकोष बगल में रख के वैज्ञानिक पर्चे पढ़ने बैठता था, एक-एक शब्द का अर्थ ढूँढ़ना पड़ता, फिर उसे बार-बार पढ़ के समझना पड़ता।
अनिलजी कठोरता से हर काम को जाँचते, किसी काम को बार-बार करना पड़ता था, जब तक उनकी कसौटी पर वह खरा न उतरे। उनकी डाँट तो लगातार पड़ती ही रहती थी, लेकिन वे समय निकाल के हर पन्ने पर अपनी टिप्पणी लिख के लौटाते थे। उनकी टिप्पणियों और बातचीत में पत्रकारिता की कारीगरी सीखने को मिल जाती थी, कि अपना काम हुनर के साथ कैसे करें। दो-तीन महीने में ही काम चलाने लायक समझ आ गयी, विज्ञान पर बात करने का बुनियादी लहज़ा पकड़ में आ गया। उसके बाद विज्ञान से सम्बन्ध्ाित जो भी काम हाथ में आता, वह मेरी समझ का दायरा लगातार बढ़ाता गया। पत्रिका का अंक दर अंक, साल दर साल।
यह अध्ययन स्कूल और काॅलेज की विज्ञान की पढ़ाई से भिन्न था, क्योंकि यह किसी तरह की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए नहीं था। यह अपने काम को विज्ञान की दृष्टि से समझना था। नदी-पहाड़, पेड़-पौधे, अपना शरीर और मानस, समाज और पर्यावरण... अब विज्ञान की दुनिया में आने वाले बदलावों पर वैसी ही रुचि से नज़र रहने लगी थी, जैसी क्रिकेट-फुटबाॅल या संगीत की दुनिया पर रहती थी। ज्ञान के लिए नहीं, रस के लिए, मनोरंजन के लिए। फिर मैं पर्यटन और यात्रा पर निकलने वाली एक नयी पत्रिका में काम करने चला गया, जहाँ लिखाई का मोहक होना ज़रूरी था। यह काम पर्यावरण और विज्ञान से एकदम भिन्न था, रोचक था। उसी दौर में अनिलजी की मृत्यु हो गयी। मैं ‘डाउन टू अर्थ’ में वापस आ गया। अब मेरा मुख्य काम उप-सम्पादन नहीं, लिखना बन गया था। इसमें शोध और वैज्ञानिक दृष्टि का आग्रह तो था ही, गम्भीर विषय को रोचक रूप में लिखना भी ज़रूरी था। क्योंकि जितना समय किसी विषय को समझने के लिए मुझे मिलता था, उतना समय पाठक के पास नहीं था। लिखना रिझाने का काम भी होता है।
सन् 2005 के आस-पास विज्ञान पत्रिकाओं में सूक्ष्म जीवों पर ढेर सारी नयी जानकारी आने लगी थी। ऐसा नाटकीय बदलाव जैसा पीढ़ी-दो-पीढ़ी में एक बार आता है। जो विज्ञान की विशेषज्ञों वाली दुनिया को ही नहीं, जनसाधारण की समझ भी बदल देता है। यह उभर के आ रहा था कि हमारे शरीर में कुल जितनी कोशिकाएँ होती हैं, उनसे दस गुना ज़्यादा सूक्ष्म जीवाणु हमारे शरीर में रहते हैं। इनमें सबसे ज़्यादा हमारे पाचन तन्त्र में रहते हैं, विशेषकर हमारी आँतों में और हमारी चमड़ी के ऊपर। हमारी पढ़ी-लिखी दुनिया में जीवाणुओं से हमारा परिचय ऐसे होता है जैसे आतंकवादी संगठनों से होता है। डरावने चित्रण और विवरण में हमें बताया जाता है कि बैक्टीरिया से जानलेवा रोग होते हैं। सफ़ाई के विज्ञापनों में बैक्टीरिया राक्षसों की तरह दिखलाये जाते हैं, जिन्हें महँगी और ज़हरीली दवाओं से मार के काबू में रखना हमारे स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है। लेकिन नया शोध कुछ और ही बता रहा था। तब तक मैं सम्पादन के काम में आ गया था। लेखकों और संवाददाताओं से इस विषय पर मैंने लेख माँगने शुरू कर दिये थे।
यह नयी दृष्टि संसार को नहीं, हमारे शरीर को भी अति सूक्ष्म जीवाणुओं की आँख से देख रही थी। इसमें हमारे शरीर को एक ग्रह की तरह देखा जा रहा था, जिसमें अनेक जीवाणु वैसे ही रहते हैं जैसे हर तरह के जीव पृथ्वी पर रहते हैं। यही नहीं, यह उभर के आ रहा था कि हमारा सुखी रहना, स्वस्थ्य रहना, यह सब हमारे शरीर में रहने वाले जीवाणुओं से हमारे तालमेल पर निर्भर है। विज्ञान की दुनिया ब्रह्माण्ड से हमारे सौर मण्डल होते हुए हमारे ग्रह पृथ्वी तक आती है, और फिर छोटी चीज़ों को देखती है। यह नयी दृष्टि जीवन को सूक्ष्माकार से विशालाकर तक देख रही थी।
नौकरी अगर सम्पादन की हो तो लिखने का दबाव नहीं रहता है, बशर्ते आप दूसरों से नियमित रूप से लिखवाते रहें। अब मेरे पास गहनता से पढ़ने का समय था। विज्ञान पर लिखने वाले अनेकानेक अच्छे लोगों को पढ़ने लगा था। साहित्य की पढ़ाई में महाकाव्य का चरित्र समझा था, और उसी से उपजी उपन्यास की विधा का भी। अब लगने लगा था कि हमारे समय का महाकाव्य विज्ञान की बड़ी किताब है। आज विज्ञान के पास जितनी सामग्री है, उतनी पहले कभी किसी कवि या लेखक की कल्पना में भी नहीं रही है। आज आख्येय साहित्य में इतना कुछ कहा जा सकता है जितना कथा साहित्य में भी न कहा जा सके। खासकर अमेरिका में आख्येय साहित्य में विज्ञान की दृष्टि से बहुत ऊँचा लेखन हो रहा है। इसका स्वरूप एकदम महाकाव्य जैसा है, क्योंकि विज्ञान की मदद से बहुत बड़ी चीज़ें समझायी जा सकती हैं। बस लिखायी ऐसी सरल होनी चाहिए जो जटिल बातों को ढो सके।
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सन् 2008 में पत्रकारिता की एक शोधवृत्ति के अन्तर्गत मुझे छुट्टी ले के अमेरिका जाने का मौका मिला। वह भी दुनिया के सबसे प्रसिद्ध अख़बारों में से एक, ‘वाॅशिंगटन पोस्ट’ में। इन छह महीनों में वहाँ घूमने-फिरने के कई मौके थे, कुछ पत्र-पत्रिकाओं को भीतर से देख के उनके काम करने के तरीके समझने के भी। इनमें विज्ञान पर लिखने वाले कुछ जाने-माने पत्रकार भी थे, जिनके साथ बैठ के अपने काम की चर्चा भी हो पाती थी। अमेरिका की राजधानी में भी मुझे मैले पानी को ले के एक बड़ी रिपोर्ट लिखने का मौका मिला। वाॅशिंगटन डी.सी. में मैला पानी साफ़ करने के कारखाने को ले के एक बड़ा विवाद मैंने खोज निकाला था, और वह रिपोर्ट ‘वाॅशिंगटन पोस्ट’ में मुख्यता से छपी। दुनिया के सबसे अमीर देश की राजधानी में भी मैले पानी को ले के कुछ वैसी ही कटकट हो रही थी जैसी हमारे जैसे गरीब देश में दिखती है।
यह समझ आ रहा था कि बहुत ज्ञान और साधन जहाँ हैं, वहाँ भी पर्यावरण के संकट गहरा ही रहे हैं। अमेरिका में इनका वर्णन आख्येय साहित्य में बहुत जतन से होता है। वहाँ यह परम्परा है कि पत्रकार रोज़मर्रा के काम से विश्राम ले के किसी एक विषय पर गहन अध्ययन करते हैं, और फिर उन पर पुस्तकें लिखते हैं। ये किताबें तमाम तरह के विशेषज्ञों का शोध उजागर करती हैं, लेकिन इनकी लिखाई विशेषज्ञों वाली नहीं होती। साधारण लोगों के लिए लिखी इन पुस्तकों में वही रस मिलता है जो कथा-साहित्य में मिलता है। एक विशाल दृश्य दिखता है, एक गहरी समझ मिलती है।
ऐसी ही एक पुस्तक एक मित्र से मिली, शीर्षक था ‘डानिं्सग इन द स्ट्रीट्सः अ हिस्टरी आॅफ़ कलेक्टिव ज्वाॅय’। किताब का प्रसंग यह था कि साथ मिल के नाचना-गाना मनुष्य प्रजाति का मूल स्वभाव है, और हर तरह के क्रूर सत्ता संस्थान लोगों पर नियन्त्रण करने के लिए उन्हें मिल-जुल के उत्सव मनाने से रोकते हैं। इसकी लेखिका हैं अमेरिकी पत्रकार-वैज्ञानिक बारबरा एहरनराइख, जिनकी लिखाई का मैं बहुत पहले से कायल था। किताब में कई वैज्ञानिक विधाओं पर गहन शोध था, लेकिन लिखाई में किसी सामाजिक उत्सव-सा रस था, उल्लास था। निराले अंदाज़ में यह पुस्तक मनुष्य के सहज स्वभाव की मीमांसा करती है, उसे कई दृष्टियों से परखती है, शोध की भी और श्रद्धा की भी। गहरायी से वैज्ञानिक और सामाजिक सामग्री प्रस्तुत करती है, सहज भाषा में, साधारण लोगों के सन्दर्भों के साथ। आख्येय साहित्य में जो कुछ मुझे आकर्षित करता है, वह सब इस पुस्तक में था।
यह पुस्तक पढ़ते हुए रोमांचित हो रहा था, लेकिन एक बेचैनी भी महसूस कर रहा था। हमारे यहाँ ऐसा आख्येय साहित्य अँग्रेज़ी में तो फिर भी थोड़ा-बहुत मिल जाता है, लेकिन हिन्दी में ऐसी सामग्री अगर है भी तो मुझे तो नहीं मिली है। अपने देश में यात्राओं के दौरान मिलने वाले लोग तरह-तरह के सवाल करते थे। स्वच्छता पर, जल स्रोतों के प्रदूषण पर, खेती के बिगड़ती हालात पर। मेरे पास उन्हें साधारण भाषा में समझाने का वह मुहावरा ही नहीं था, जो इन सब के आपसी सम्बन्ध्ाों के बारे में बता सके। जो सहज हिन्दी में समझा सके कि अपनी दुनिया को हम कितना नासमझी से बरत रहे हैं। कि हमारी स्वच्छता मल-मूत्र को पानी में बहाने की मुहताज हो गयी है। कि हम अपनी मिट्टी को बंजर बना रहे हैं और अपने जल स्रोतों को दूषित कर रहे हैं। और यह सब वही पढ़ा-लिखा समाज कर रहा है, जो देश को स्वच्छ बनाने का बीड़ा उठाये हुए है। जबकि सामान्यतः लोगों के पास स्वच्छता के कहीं बेहतर उदाहरण है।
अनकही बातों का एक भण्डार भीतर कुलबुलाने लगा था। अब मेरे कान में जोर-जोर से पद्मा वांग्याल के शब्द गूँजने लगे थे, ‘छपाक् छपाक्’।
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सन् 2009 में अचानक मेरे पिताजी की मृत्यु हो गयी। किसी अग्रज का विछोह जीवन का पड़ाव होता है, जहाँ पहुँच के आप आगे-पीछे देखते हैं। सिर के ऊपर से छतरी हट जाने से सूरज की रोशनी सीधी आँख तक आती है, संसार बदला हुआ दिखता है। वे पत्रकारिता में सामाजिक काम करने आये थे, अपना कैरियर बनाने नहीं। लेकिन उन्हें यह मलाल रहता था की रोज़मर्रा की पत्रकारिता और एक दैनिक के सम्पादन में व्यस्त रहने की वजह से वे गहनता से किसी एक विषय पर काम नहीं कर पाये। सन्त कबीरदास के हवाले से वे कहते रहते थे, ‘आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास!’ यही नहीं, वे अपने उन प्रिय मित्रों की शिकायत भी करते रहते थे, जिन्होंने अपनी प्रतिभा को किसी एक काम में गहनता के साथ साधा नहीं।
अनुपम चाचा का काम उन्हें बहुत प्रिय था, खासकर उनकी पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’। जब यह पुस्तक सन् 1993 में छप के आयी, तब उन्होंने एक लेख लिखा था, शीर्षक था ‘अपने पर्यावरण का यह अनुपम आदमी’। उसमें लिखा थाः ‘अनुपम ने तालाब को भारतीय समाज में रखकर देखा है। सम्मान से समझा है। अद्भुत जानकारी इकट्ठी की है और उसे मोतियों की तरह पिरोया है। कोई भारतीय ही तालाब के बारे में ऐसी किताब लिख सकता था। लेकिन भारतीय इंजीनियर नहीं, पर्यावरणविद नहीं, शोधक विद्वान नहीं, भारत के समाज और तालाब से उस के सम्बन्ध्ा को सम्मान से समझने वाला विनम्र भारतीय। ऐसी सामग्री हिन्दी में ही नहीं अँग्रेज़ी और किसी भी भारतीय भाषा में आप को तालाब पर नहीं मिलेगी। तालाब पानी का इन्तज़ाम करने का पुण्यकर्म है जो इस देश के सभी लोगों ने किया है। उनको, उनके ज्ञान को और उनके समर्पण को बता सकने वाली एक यही किताब है... अनुपम जैसे व्यक्ति की पुण्याई पर हमारे जैसे लोग जी रहे हैं। यह उसका और हमारा, दोनों का सौभाग्य है।’ यह शब्द केवल एक बड़े भाई-समान व्यक्ति के एक छोटे भाई-समान व्यक्ति के लिए नहीं हैं। इनमें एक कारीगर अपने एक पुराने जोड़ीदार का मूल्यांकन भी कर रहा है।
स्कूल-काॅलेज के दिनों से ही घर में पिताजी के लिए कई काम करता था। लेकिन हमारे परिवारों में पिता-पुत्र सम्बन्ध में एक तरह की झिझक होती है। अनुपमजी तो चाचा थे, उनके साथ झिझक नहीं थी। उनका राग मुझमें इतना रहता था कि पिताजी कहते थे कि मुझ पर बचपन से ही अनुपम की छाया पड़ी है। सन् 1973 में जब मेरा जन्म हुआ था, तब का एक किस्सा मुझे अनुपम चाचा ने सुनाया था। तब वे पिताजी के साथ चंबल घाटी में डाकुओं के समर्पण से सम्बन्धित काम में लगे थे। इन्दौर में मेरे जन्म की ख़बर उस समय जैसे भी मिलती होगी, वैसे मिली। भिण्ड या मुरैना से जो सिफऱ् एक बस इन्दौर जाती थी, उसमें दोनों सवार हो गये। वह बस एक ऐसी जगह रुकती थी, जहाँ केवल एक रबड़ी की गुमटी लगती थी। अनुपम चाचा कहते थे, ‘तुम्हारे जन्म की मिठाई हमने चम्बल की रबड़ी के रूप में खायी थी।’
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एक हिन्दी भाषी परिवार से मैं हूँ। किन्तु पढ़ाई अँग्रेज़ी साहित्य में की थी और नौकरी भी अँग्रेज़ी प्रकाशनों में ही की थी। फिर भी, मुझे यह एकदम साफ़ पता था कि जब अपने मन का काम करूँगा, तो वह हिन्दी में ही होगा। अपने लोगों से अपनी भाषा में बात करने का आनन्द क्या होता है यह मैंने बचपन से महसूस किया था। फिर अनुपम चाचा को धीरे-धीरे काम करते हुए देखा था, जिसमें वे कठिन-से-कठिन बात भी सहज बना के कहते थे। इस शिल्प में जो आनन्द मिलता है, उसके रस में डूबे हुए मैंने उन्हें सदा ही पाया था। यह इच्छा रहती थी कि वैसा ही रस मुझे भी मिले। इतने साल पत्रकारिता करने के बाद अब पर्यावरण पर कहने लायक बातें भी मन में खूब जुड़ गयी थीं। यह इच्छा प्रबल थी कि जहाँ-कहीं मिट्टी-पानी-स्वच्छता पर अच्छा काम हो रहा है, उसे वहीं जा के देखूँ-सीखूँ। जहाँ-कहीं गड़बड़ हो रही है उसे जतन से समझूँ।
सम्पादन की नौकरी के साथ यह करना असम्भव था। मैंने नौकरी छोड़ के एक समसामयिक विषयों की पत्रिका में संवाददाता की नौकरी पकड़ ली। मैंने जानबूझ के पदावनति माँगी थी, ताकि सम्पादन की जिम्मेदारियों से मुक्त रह के अपने शोध और लेखन पर ध्यान दे सकूँ। मुझे यह वाएदा किया गया कि मुझे यात्रा करने दी जाएगी। परन्तु दिल्ली में स्थित पत्रिकाओं में चुनावी राजनीति, सरकार और सत्ता के प्रति विशेष आकर्षण होता है। राजनीतिक दुनिया की कुछ समझ मुझमें पहले से थी ही, कुछ परिचय भी थे। जब पत्रिका में राजनीति पर खबरों और लेखों पर बहुत जोर दिया गया, तब मैंने दो-एक राजनीतिक लेख लिख दिये। लेख पसन्द किये गये, और मुझसे यह अपेक्षा की जाने लगी कि मैं नियमित रूप से राजनीतिक मामलों पर लिखूँ।
राजनीतिक खबरों और सरकार की बातों पर पत्रकारिता में अत्यधिक ध्यान दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि पत्रकारिता सत्तावान लोगों पर अंकुश रखती है, इसलिए लोकतन्त्र का चैथा खम्भा इत्यादि है। ऐसा माना जाता है कि अगर आप पत्रकार हैं, तो आपकी मुख्य रुचि राजनीति और सरकार में ही होगी। किसी पत्रकार का महत्व इसी से तय किया जाता है कि वह राजनीति पर लिखता-कहता है कि नहीं, कि वह किसी भी विषय को राजनीतिक आँख से देख सकता है या नहीं। अगर किसी युवा पत्रकार में प्रतिभा दिखती है, उसे राजनीति पर लिखने के लिए प्रेरित किया जाता है। यही दुहराया जाता है कि पत्रकार जनसाधारण की ओर से सत्ताधारी लोगों की निगरानी करते हैं।
सत्ता की दलगत राजनीति में पत्रकारों की जितनी रुचि होती है, उससे तो लगता तो यही है कि वे खुद उसकी महत्ता बढ़ाते रहते हैं। मैंने पत्रकारों को प्रसिद्ध और सत्ताधारी लोगों के आसपास रहने में, उनकी ओर से पलट के आने वाली चमक में खुद प्रकाशित होने में रमे हुए देखा है। ‘चैथे स्तम्भ’ की इस चैकसी की वजह से सत्ताधारी लोगों में लोक-लाज का थोड़ा-बहुत डर ज़रूर रहता है। लेकिन इस चैकीदारी की आड़ में सत्तावान लोगों की चापलूसी भी होती रहती है। इसका माने सिर्फ़ ‘पेड न्यूज़’ से नहीं है, जिसमें पैसा देने वालों के विज्ञापन खबरों के रूप में छापे जाते है। नहीं, इसके अलावा भी बहुत कुछ होता है। बहुत-सी पत्र-पत्रिकाओं और खबरी टी.वी. चैनलों की कोई एक राजनीतिक ‘लाइन’ होती है। यानी उसके मालिक और सम्पादक को कोई एक राजनीतिक विचारधारा पसन्द होती है, उससे भिन्न विचारधाराएँ नापसन्द होती हैं। यह राजनीतिक झुकाव उनकी शैली में, उनकी प्रस्तुति में, उनके खबरों के चयन में साफ़ दिखता है। इस झुकाव को भी जनसाधारण की लोकतान्त्रिक चिन्ता का रूप ही बताया जाता है।
सत्ता और दलगत राजनीति के प्रति इस विशेष लगाव के अलावा पत्रकारिता में शहर और नागर समाज के प्रति भी विशेष आग्रह होता है। हमारे देश का आधे से ज़्यादा हिस्सा अभी भी गाँवों में रहता है, लेकिन उसकी अवस्था के बारे में हमारे पत्र-पत्रिकाएँ और टी.वी. चैनल उदासीन ही रहते हैं। खेती-किसानी की खबरें व्यापार के पन्नों पर ही मिलती हैं, वह भी इसलिए क्योंकि शहरों में कृषि उत्पाद के व्यापारियों में मण्डी में भाव-तोल को ले के कुतूहल रहता है। इसीलिए स्वच्छता का मतलब सिफऱ् इतना रह जाता है कि कोई बाहर खुले में जा के मलत्याग न करे। क्योंकि हमारे समाज के पढ़े-लिखे वर्ग को उन लोगों से शर्म आती है, जो दिशा मैदान जा के मलत्याग करते हैं। अगर पानी-मिट्टी के विषय पत्रकारिता में आ भी जाते हैं, तो उन्हें ‘विकास पत्रकारिता’ का जामा पहनाया जाता है। प्रकाशन और पत्रकार इसे अपना पराक्रम बताते हैं कि उन्होंने शहरी और दलगत राजनीतिक दायरे से बाहर देखा। इसमें भाव यह नहीं होता कि सहज रूप से अपने लोग और समाज की खोज-खबर ली जाए।
यह आग्रह लिखने की शैली में भी झलकते हैं। लिखाई को प्रभावशाली बनाने के लिए लच्छेदार भाषा का भरपूर उपयोग होता है। किसी भी बात को बढ़ा-चढ़ा के कहना ज़रूरी माना जाता है। जैसे ढाबे पर बासी दाल-तरकारी को तीखे मसाले में बघार के फिर से चलाया जाता है, वैसे ही खबरों को अति महत्वपूर्ण बनाने के लिए अतिशयोक्ति का सहारा लिया जाता है। टी.वी. चैनलों पर तो यह बीमारी इस हद तक फैल गयी है कि ख़बर पढ़ने वाले एंकर सदाबहार उत्तेजना में ही रहते हैं, जैसे पत्रकार न हुए, किसी मसालेदार फि़ल्म के पात्र हो गये। जब भाषा और प्रस्तुति की शैली इतनी बनावटी हो, तो उसमें सत्य और सहजता के लिए, साधारण लोगों के लिए जगह बचती ही नहीं है। सादगी में भी कोई आकर्षण होता है, यह बात हमारी पत्रकारिता में स्वीकार्य ही नहीं लगती है।
इस राजनीतिक पत्रकारिता की दुनिया में मैं भी अपने-आप को पा रहा था। और यहाँ मैं इसलिए आया था क्योंकि मुझे मिट्टी-पानी-स्वच्छता की बात साधारण लोगों के सन्दर्भों से करनी थी। पाँच महीने में ही मैं छटपटाने लगा था। ‘छपाक् छपाक्’ की आवाज़ डूबती हुई लग रही थी।
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मेरे मित्रों को मेरी चिन्ता होने लगी थी। उनसे बातचीत में मैं उन्हें बताता था कि जो मैं करना चाहता हूँ उसके लिए समय ही नहीं मिल पा रहा है। लेकिन नौकरी छोड़ना मेरे लिए मुश्किल था। थोड़ी-बहुत बचत थी, लेकिन महीने की तनख्वाह के बिना खर्चा पूरा करना असम्भव था। मित्रों ने मुझे कहा कि अपने खर्चों का हिसाब लगाऊँ। मेरे सभी खर्चे छह मुख्य हिस्सों में बँटते थे। तो छह मित्रों ने आगे आ के मुझे आश्वासन दिया कि वे एक-एक हिस्से का खर्च साल भर उठाने के लिए तैयार हैं। वे यही चाहते थे कि जो बात मेरे अन्दर कुलबुला रही थी, उस पर अध्ययन करने और उसे लिखने के लिए मैं साल भर के लिए नौकरी से मुक्त हो जाऊँ। सभी पुराने मित्र थे, वे मेरी पत्रकारिता की यात्रा जानते थे, मेरे सुख-दुख के सहभागी थे। पिछले कई सालों से वे मुझसे यह सुनते आ रहे थे कि मैं कैसा अध्ययन करना चाहता हूँ, क्या लिखना चाहता हूँ। उनके आश्वासन से मुझे हिम्मत मिली।
किन्तु यह निर्णय अन्ततः लिया गया छन्द की उन चार पंक्तियों के दम पर, जिन्हें अठ्ठारवीं शताब्दी के दिल्ली के कवि मीर-तक़ी-मीर ने रचा था। इन्हें काॅलेज के दिनों में पढ़ा था और तभी ये आँख से होते हुए सीधे मन में उतर गयी थीं। कुछ यूँ याद हैंः
ख़ुदा को काम तो सौंपे हैं मैंने सब लेकिन
रहे है ख़ौफ़ मुझे वाँ की बेनियाज़ी का
बसान-ए-ख़ाक हो पामाल-ए-राह-ए-ख़ल्क, ऐ मीर
हुवे है क़सद ग़र तुझको सरफ़राज़ी का
अपने सभी काम परमात्मा को सौंपने के बाद मीर को डर उठा, कि अगर परमात्मा ने उस पर दया नहीं रखी तो उसका क्या होगा। फिर भीतर से आवाज़ उठी, अगर अपना माथा ऊँचा उठा के चलना है तो उस रास्ते की धूल में जा के बस, जिसे साधारण लोग अपने पैर से कुचलते हैं।
कई कलाकारों ने कई सुन्दर तरीकों से यह बताया है कि हमारे भीतर जहाँ डर रहता है, ठीक वहीं रोमांच भी बसता है। जिस बात से डर लगता है, उसी का बड़ा आकर्षण भी होता है। एक को दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। अगर एक चाहिए तो दूसरे को भी बरतना पड़ता है। मीर जैसे कवि बड़े इसीलिए हैं, क्योंकि उनकी कविता कई लोगों को कमज़ोरी के पल में सम्बल देती है। उनकी कलम भयानक और वीर जैसे रसों की आदि स्याही में भीगी रहती है। मीर से अपनी तुलना करना तो निरी मूर्खता ही होगी। लेकिन जो आपके मन पर राज करता है, उसका एक अंश आपके भीतर कहीं रह जाता है। एक काँपती हुई लौ, जिसके सहारे अँधेरे में भी रास्ता दिख सकता है।
सन् 2011 के जनवरी में मैंने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया। सम्पादक ने त्यागपत्र रख लिया, कहा कि एक महीने कोशिश करूँ की नौकरी और अपना शोध साथ-साथ हो सके। इसी पशोपेश में अनुपम चाचा से एक दिन मिलने गया। उन्हें पता लगा कि नौकरी छोड़ रहा हूँ, तो उन्होंने डाँटा। परिवार की आर्थिक स्थिति वे जानते थे। कहने लगे कि नौकरी करते हुए भी तो शोध कर सकते हो। मैंने बताया कि पाँच महीने में राजनीतिक पत्रकारिता के चक्कर में कुछ भी काम नहीं हो पाया था। तो वे पूछने लगे कि मेरे मन में यह कौन-सा विचार है जो मैं इतना अधीर हो रहा हूँ। मैंने उन्हें संक्षिप्त में समझाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें भरोसा नहीं हुआ। उनके चेहरे पर संशय का भाव था। फिर मैंने उन्हें ज़रा विस्तार से अपना विचार समझाना शुरू किया। आखिर में मामला जमाने के लिए उनसे कहा कि वे इसे एक त्रिकोण की तरह देखें। एक तरफ़ पानी है, दूसरी तरफ़ मिट्टी है, और तीसरी तरफ़ हमारा शरीर और उससे निकलने वाला अपव्यय है। फिर एकदम से मुँह से प्रस्तावित किताब का सार तीन शब्दों में निकल आयाः ‘जल, थल, मल!’
यह तीन शब्द सुनते ही अनुपम चाचा के चेहरे पर एक मुस्कुराहट चमक उठी। वे बोले, अगर यह काम करना है तो तुम यहाँ गाँध्ाी शान्ति प्रतिष्ठान आ जाओ, अपन साथ मिल के काम करेंगे। मेरे लिए तो यह बिना माँगा वरदान था। अनुपम चाचा ने खुद से एक नोट बना के प्रतिष्ठान के बोर्ड को दिया और अप्रैल 2011 में मैं वहाँ ‘रिसर्च फेलो’ हो गया। शोध के लिए धन की आवश्यकता थी। चाचा ने कहा कि करने लायक काम कभी साधन के अभाव में रुकते नहीं हैं, धन का इन्तज़ाम भी कहीं न कहीं से हो जाएगा। चाचा के साथ काम करने का एक बड़ा लाभ यह था कि अपनी चिन्ता नहीं करनी पड़ती थी। अपनी नाव मँझधार में उतारनी भर होती थी। उसके बाद वह उनके भरोसे नीके-नीके चलने लगती थी। उनके एक सहयोगी हैं अहमदाबाद के फ़रहाद काॅन्ट्रेक्टर। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं ‘जल थल मल’ का अपना विचार एक दो पन्ने के नोट में लिख के उन्हें भेज दूँ। कुछ दिन बाद उन्होंने बताया कि यह किताब लिखने और इसके शोध के लिए बेंगलुरु की संस्था ‘अघ्र्यम’ फ़ेलोशिप देने के लिए तैयार है। उदार मन से संस्था ने आर्थिक सहयोग देना भी शुरू कर दिया। पुराने सहयोगियों को जल्द पता चल गया कि मैं स्वतन्त्र हूँ। तरह-तरह के लिखने और सम्पादन के काम आने लगे। जिन छह मित्रों ने माली मदद की पेशकश की थी उनसे एक बार भी कुछ माँगना नहीं पड़ा।
अँग्रेज़ी का एक पेशेवर पत्रकार अब उस गाँध्ाी विचार के हिन्दी काम में लौट आया था जिसने उसे अदृश्य रूप से गढ़ा था। अनुपम चाचा के साथ काम करने का आनन्द रोज़ रहता था। गप्पबाजी के साथ-साथ हर तरह के काम होते रहते थे। गम्भीर बातें भी हल्के खेल-कूद के अन्दाज़ में होती थीं। बहुत बड़े काम भी छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट के धीरे-धीरे होते जाते थे।
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पत्रकारों को अपनी बात का महत्व बढ़ा-चढ़ा के लिखने का अभ्यास हो जाता है। किसी क्रिया को बतलाने के लिए तरह-तरह के विशेषण इस्तेमाल करना स्वीकार्य ही नहीं, वांछनीय माना जाता है। जब इतनी सारी सामग्री लिखी जा रही हो, जब पाठक की तवज्जोह के लिए आपका लिखा हुआ इतने सारे दूसरे लेखों के साथ मुकाबला कर रहा हो, तब शेष से अलग हो कर विशेष दिखने की इच्छा प्रबल हो जाती है। अगर कोई व्यक्ति शान्ति से अपने घर में बैठे हुए दाल-भात और तरकारी खा रहा है, तो यह भी सनसनीख़ेज़ अन्दाज़ में बताने पर ही छप सकता है। अतिशयोक्ति की इस प्रतिस्पर्धा से पैदा होने वाली मानसिकता हमारी पत्रकारिता में इतनी गहरी पैठी है, कि जो इसमें भाग न ले, उसे अयोग्य मान लिया जाता है। अभिव्यक्ति में सहजता होना अवगुण माना जाता है।
इस प्रतिस्पर्धा से मैं बचना चाहता था। सन् 1996 में जब पत्रकारिता करने लगा, तब तीन महीने में ही संवाददाता का काम छोड़ के उप-सम्पादन में आ गया था। दूसरों का लिखा सुधारने और तराशने में भी मज़ा आता था। फिर सौभाग्य से ऐसे सम्पादक मिलते चले गये जिन्होंने मुझे अपने तरीके से लिखने की आज़ादी दी, मेरे लिखे को तराशा भी। चूँकि मैं नौकरी उप-सम्पादन की करता था, इसलिए मेरा लिखा हुआ सम्पादकों को यूँ भी फ़ायदे का सौदा लगता था। जब ग्वाला नाप बराबर पूरा दूघ ग्राहक को दे देता है, उसके बाद उसे खुश करने के लिए थोड़ा और दूध बर्तन में उँड़ेल देता है, जिसे कुछ जगह रुँझावन या रिझावन भी कहते हैं। मेरा लिखना भी कुछ रुँझावन वाला मामला ही था, इसलिए सम्पादक उसे उदार मन से देखते थे, उसमें प्रचलित अतिशयोक्ति अलंकार न होने पर भी वे छाप देते थे। यही नहीं, सम्पादन का ऐसा काम भी मुझे देते रहते थे जिसमें कठिन और जटिल बातों को साधारण लोगों के लिए निरूपित करना हो, जिसमें विचार का ठहराव और भाषा की तरलता ज़्यादा ज़रूरी हो, बजाए अतिशयोक्ति और विशेषणों के अलंकरण के। जैसा काम हम करते जाते हैं, वैसा ही हमारा स्वभाव ढलता जाता है।
अनुपम चाचा की लिखाई में वही ठहराव था जो उनके स्वभाव में था। उनमें कभी भी किसी बात की अधीरता नहीं दिखती थी, वे अपने सभी काम धीरज के साथ करते थे। उनका यह गुण मुझे खूब भाता था। लेकिन मेरा स्वभाव एकदम वैसा नहीं है। मुझे तरह-तरह की बातों में रोमांच खोजने की आदत है, मन को विविध रसों में रंगने की भी। इस वजह से कई तरह की रुचियाँ भी हैं, चाहे खेल-कूद हो या संगीत, फि़ल्में हो या हास्य-व्यंग्य। पर्यटन और यात्रा वृत्तान्त भी लिखता रहा हूँ और उसके लिए देश-विदेश में घूमने को भी मिला है और तरह-तरह का भोजन खाने-परखने को भी। मोटरसाइकिल से लम्बी-लम्बी यात्राएँ भी की हैं और दुष्कर यात्राओं में, जोखिम भरे कामों में रोमांच भी आता है। विविध विषयों पर विविध तरीकों से लिखने के अवसर भी अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं में मिलते रहे हैं, लेकिन अँग्रेज़ी में। सन् 2011 तक हिन्दी में बहुत कम लिखा था। फिर विविधता की भी अपनी कीमत होती है, वह आपको किसी एक विषय को गहराई से समझने नहीं देती। आप बहुत सारी चीज़ों को आज़माते रहें तो किसी एक चीज़ में गहनता से डूब नहीं पाते। चित्त आसानी से किसी ओर खिंच जाए तो साधना नहीं हो सकती।
‘जल थल मल’ ने मेरे अन्दर कुछ बदल दिया था। अब एक जगह स्थिर खड़े रह के एक विषय का निरूपण करने का मन बन रहा था, कोई गहरा विचार खींच रहा था। ‘अघ्र्यम्’ संस्था की उदारता से हर तरह का अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य खरीद कर पढ़ सकता था, देश में कहीं भी जा के देखने-समझने के साधन भी थे। फिर कई सालों से पर्यावरण पर लिखने की वजह से विविध जानकारी जुटाना आ गया था। जो कुछ नया पता चलता, उस पर अनुपम चाचा के साथ लम्बी-लम्बी बातचीत होती रहती। कठिन बातों को गला के सहज बना के कहने के वे कायल थे।
वे उन दिनों ‘गाँध्ाी मार्ग’ पत्रिका के सम्पादक थे। मेरी अलग-अलग रुचियों के हिसाब से वे ‘गाँध्ाी मार्ग’ में लेख लिखवाते रहते थे। इस वजह से हिन्दी लिखने का मेरा अभ्यास भी हो जाता था और अपने प्रिय सम्पादक के साथ लिखाई और सम्पादन की बारीकियों पर चर्चा भी होती रहती थी। मैं अपनी रुचियों के हिसाब से विविध अन्तर्राष्ट्रीय सामग्री उनके सामने रखता था, और वे उसे अपने देसी मन के हिसाब से सम्पादित कर लेते थे। लेखों का सम्पादन तो बाद में होता है, अनुपम चाचा मेरे मन के सम्पादक थे। वे अपने सभी प्रिय लोगों के विचार भी साफ़ करते रहते थे। बार-बार कहते थे कि गाँध्ाी विचार कोई आदर्शवाद नहीं है, जिसकी वजह से अपने जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने पड़ें। बल्कि अपने जीवन को सहज बना के जीना गाँध्ाी विचार का सजीव रूप है।
अगर कोई पत्रिका मुझसे कहती कि मैं मोटरसाइकिल से तिब्बत जा के एक यात्रा वृत्तान्त लिखूँ, तो अनुपम चाचा कहते, ‘ज़रूर जाओ। इसे भी गाँध्ाीजी का काम मान के ही करो, अच्छे से करो, सहजता से करो।’ जितना लेखन इस दौर में मैंने किया और जितने विविध विषयों पर किया, अँग्रेज़ी और हिन्दी दोनों में, उतना कभी नहीं किया था। इसका शायद सबसे बड़ा कारण यही था कि विविध बातें जोड़ने का विचार मुझे मिल गया था। ‘जल थल मल’ की दृष्टि की वजह से उन चीज़ों में मूल्य दिखने लगा था जिन्हें कचरा समझा जाता है। फिर अनुपम चाचा के सहज विवेक का सहारा तो था ही। जिन बातों को हमारा पढ़ा-लिखा समाज मूल्यहीन मानता है, उन्हें समझना-समझाना ही उनका काम था।
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प्रकृति में कचरा कैसे पैदा होता है और उसका प्राकृतिक उपचार कैसे होता है, यह समझना मेरे लिए ज़रूरी था। विज्ञान पर बहुत गहरी बातें पढ़ने में आ रही थीं। सृष्टि के बनने और पृथ्वी पर जीवन के विकास से ले के इतिहास और मैला पानी साफ़ करने के विज्ञान की भी, और स्वास्थ्य की भी। कुछ बातें समझ में आती थीं, कुछ नहीं आती थीं। विज्ञान की बुनियादी शिक्षा जिस उमर में स्कूल में होती है उस उमर में मेरा मन पढ़ाई में एकदम नहीं लगता था। इन्दौर के ‘गुरुजी’ यानी विष्णु चिंचालकर जब दिल्ली आते थे, तब हमारे यहाँ रुकते थे। वे बहुमुखी प्रतिभा के विलक्षण कलाकार थे। लेकिन उनका व्यवहार इतना सहज होता था कि पता ही नहीं चलता था कि जो बात वे खेल-खेल में, यूँ ही हँसते-हँसते कह रहे हैं, वह कितनी गहरी और मौलिक होती थी। आज तक उनकी बातों की मौलिकता के नये आयाम समझ में आते रहते हैं।
दस साल का था तब ‘गुरुजी’ ने मुझे गिजुभाई बधेका की पुस्तक ‘दिवास्वप्न’ पकड़ा दी थी। उसे पढ़ने के बाद औपचारिक शिक्षा से मोहभंग हो गया था। स्कूल छोड़ने की हिम्मत तो नहीं थी, लेकिन स्कूली शिक्षा का खोखलापन समझ में आ गया था। इने-गिने शिक्षकों को बच्चों को पढ़ाने में रस आता था। ज़्यादातर समय पाठ्यक्रम पूरा करने की जल्दबाज़ी में जाता था। क्या पढ़ रहे हैं, क्यों पढ़ रहे हैं, यह समझने का मौका ही नहीं होता था। शिक्षकों से इस तरह के सवाल पूछो तो उन्हें लगता था कि उनके काम में बाधा डाली जा रही है। गणित और विज्ञान से तो मैं यूँ ही छिटक गया था।
जब नौकरी करने लगा, तब पत्रकारिता के लिए विज्ञान को नये सिरे से समझा। लेकिन यह समझ भी काम-चलाऊ थी। ध्येय यही था कि छापने के लिए अच्छी सामग्री मिल जाए। विज्ञान की दुनिया की जटिलताएँ समझ में आने लगी थी, लेकिन यह खोजबीन आवश्यकता पर आधारित थी। काम के सम्बन्ध और सम्बन्ध के काम में अन्तर होता है। किन्तु ‘जल थल मल’ तो अपने मन का काम था, यह अनुसन्धान मेरा अपना था, अपनी समझ के लिए। किसी परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए या कोई लेख लिखने भर के लिए नहीं। इसलिए जो अबूझ लगता था, उसे समझने के लिए गुणी और गहरे लोग खोजता रहता था, जो कठिन बातों का निरूपण कर सकें।
एक मित्र कई दिनों से मुझे अपने पिता के एक मित्र से मिलवाना चाहता था, जो जर्मनी में रहते हैं। वे दिल्ली आये हुए थे, सो मैं उनसे मिलने पहुँच गया। उनका नाम है विक्टर स्मेटाचेक। समुद्रीय पर्यावरण की विधा में वे दुनिया के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं। उनका जन्म लगभग 70 साल पहले उत्तराखण्ड के भीमताल में हुआ था और बचपन भी वहीं बीता था, वहाँ के हरे-भरे वनों में घूमते हुए। प्रकृति और प्राणीजगत की उनकी समझ जितनी व्यवहारिक है, उतना ही उनका शास्त्रीय अध्ययन भी है। वे विज्ञान की दुनिया के शीर्ष पर हैं, लेकिन मेरे मित्र के मेरे प्रति स्नेह की वजह से वे मेरे प्रति बहुत जल्दी उदार हो गये।
उनसे भेंट होना मेरे लिए एक अनूठा अनुभव था। वे बड़ी-बड़ी शास्त्रीय बातों को सुन्दर रूपकों में समझा सकते हैं। वे उन दिनों गोवा के राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान में पढ़ाने के लिए हर साल जाड़े में आते थे। एक दिन उन्होंने मुझे फ़ोन लगाया और कहा कि मैं गोवा आ के उनके साथ कुछ दिन रहूँ। उनका स्वभाव सामाजिक है, मन खुला है। वे दरियादिली से अपनी साधना के फल दूसरे लोगों को थमाते चलते हैं। इसके पहले अनेक वैज्ञानिकों से मिलने का मौका मुझे मिला था, कुछेक को ज़रा नज़दीक से जाना था। पर इतने व्यापक विषयों पर इतने गहरे ज्ञान को इतनी सहजता से ढोने वाला वैज्ञानिक मुझे पहले कोई नहीं मिला था। उनके साथ पूरे-पूरे दिन गप्पबाज़ी होती रहती थी, शाम को हम समुद्रतट पर तैरने चले जाते, और रात को देर तक विविध विषयों पर चर्चा होती रहती थी। उनके साथ पैदल चलना तक यादगार अनुभव बन जाता, क्योंकि वे चलते-फिरते आस-पास के पौधों पर, कीट-पतंगों पर, चिडि़याओं पर एक-के-बाद-एक गज़ब बातें बताते जाते। उनका अध्ययन तमाम तरह के विषयों पर रहा है, जिसमें स्वास्थ्य और पर्यावरण ही नहीं, जीवन का क्रमिक विकास और हर तरह की वैज्ञानिक विधा शामिल है। कई बार मैं किसी प्रसिद्ध वैज्ञानिक के काम के बारे में पूछता और धीरे से अंदाज़ा लगता कि श्री विक्टर का उनके साथ मिलना-जुलना रहा है, बातचीत रही है। यूँ लगा कि कोई विराट पुस्तकालय किसी कल्पनाशील कथाकार का सुलभ और मनोहर रूप धर के मेरे पास आ गया है। आश्चर्य होता था कि इतना बड़ा वैज्ञानिक इतना सहज और आकर्षक वक्ता कैसे हो सकता है!
उनके जैसा गुणवान वैज्ञानिक मुझ जैसे पत्रकार में इतनी रुचि ले, इसका कोई कारण नहीं था। बस, उन्हें ‘जल थल मल’ का विचार जँच गया था। वे चाहते थे कि इस विचार को समृद्ध करें, उसे गढ़ने में लगे एक सामाजिक पत्रकार को मदद दें। मल-मूत्र से मिलते-जुलते विषयों पर उन्होंने कई साल पहले शोध किया था और प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिकाओं में लिखा भी था। यह सब सामग्री उन्होंने खुले मन से मुझे दी, समझायी भी। जिन विषयों पर बात करने से डर लगता था, उन्हें वे अड्डेबाज़ी के मुहावरों में उतार लाते। मेरी कई उलझनों को उन्होंने खेल-खेल में सुलझा दिया।
उनसे कई तरह से मदद मिली, आज भी मिलती है। लेकिन उनके तीन बड़े उपकार मुझ पर हैं। पहला यह कि उन्होंने मेरे कुछ पूर्वाग्रह दूर कर दिये, स्नेह के साथ, जैसे कोई प्रिय मित्र पाँव में गड़ा हुआ काँटा एक झटके में निकाल दे। अपने-अपने अनुभव और दायरे के हिसाब से हम में से हर किसी के पूर्वग्रह होते हैं। ऐसा तो कोई नहीं होगा जिसके सभी पूर्वग्रह दूर हो सकते। किन्तु ईमानदारी की कसौटी यही है कि आप अपने पूर्वग्रहों को ले के सचेत रहें, अपने-आप से भिन्न विचार रखने वालों के लिए अपने मन में पर्याप्त स्थान छोड़ के रखें। श्री विक्टर की दक्षता और सहृदयता से मेरे कुछ पूर्वाग्रह दूर हुए, कुछ को ले के मैं सावधान हो गया।
श्री विक्टर का दूसरा उपकार मुझ पर यह था कि मनुष्य को बाकी प्राणियों से अलग कर के देखना मैंने एकदम छोड़ दिया। ‘मानवीय’, ‘मनुष्यता’ और ‘मानवतावाद’ जैसे शब्दों को कभी-कभी अत्यधिक गम्भीरता से लिया जाता है। अगर हम अपनी प्रजाति को उन जीवों की दृष्टि से देखें, जिन्हें अपने ‘विकास’ के चक्कर में हमनें जड़मूल से मिटा दिया है, तो हमारा ‘मानवतावाद’ कैसा लगेगा?
तीसरा उपकार उनका यह रहा कि उन्होंने हर तरह के ज्ञान की सीमा का आभास मुझे कराया। कई बार सामाजिक विषयों पर काम करने वाले लोग विज्ञान का सहारा लेते हैं, लेकिन अपने पूर्वाग्रहों के हिसाब से। यानी जो जानकारी उनके पूर्वाग्रहों को प्रमाणित करती है, उसे बढ़ा-चढ़ा के बताते हैं और ऐसी जानकारी को अनदेखा करते हैं जो उनकी गलती प्रमाणित करती है। श्री विक्टर खुल के उन विषयों पर बात करते थे जिन पर उन्हें अपना मत प्रमाण के आधार पर बदलना पड़ता। अगर कोई सिद्ध विद्वान ऐसी विनम्रता रखता है तो सामाजिक बातचीत में लगे एक पत्रकार के लिए ज्ञान-विज्ञान के प्रति विनम्र रहना एकदम लाजि़मी है। पुष्ट प्रमाण के समक्ष अपना मत बदलने की हिम्मत रखना सज्जन गुण है, यह कमज़ोरी या अज्ञान का द्योतक नहीं है। श्री विक्टर अपनी मान्यता को सदा ही प्रमाणों की कसौटी पर कसते रहते हैं।
इसका एक और प्रभाव ‘जल थल मल’ के काम पर पड़ा। वैज्ञानिक प्रमाणों को ध्यान से देखना आ गया। इसका आभास भी हो गया कि वैज्ञानिकों की विशेषज्ञ दुनिया भी सब-कुछ जानती नहीं है। इसलिए क्या तर्क-संगत है, क्या वैज्ञानिक है, इसका निर्णय काल पर छोड़ देना चाहिए। ऐसा देखने में आता है कि लोग जिस बात से सम्मत नहीं होते, उसे तर्कविरुद्ध और अवैज्ञानिक करार दे देते हैं। अगर हमारे ज्ञान की सीमा है तो ज्ञान में हमारे विश्वास की भी सीमा होनी चाहिए। विज्ञान में भी एक तरह का अन्धविश्वास होता है, यह तो पहले ही मेरे देखने में आया था। अब यह भी समझ आ गया था कि वैज्ञानक जानकारी का उपयोग सिफऱ् अपनी बात का औचित्य बढ़ाने के लिए नहीं करना चाहिए। और हर नयी जानकारी को अन्तिम सत्य भी नहीं मानना चाहिए। सत्य-असत्य का असली अन्तर तो समय के साथ ही उजागर होता है।
अपने ज्ञान की सीमा का बोध उपयोगी होता है। पहले सहज बातचीत में लोग कह लेते थे, ‘राम जाने’ या ‘अल्लाह जाने’ या ‘दाता जाने’। ऐसे में उन बातों के लिए मन में जगह रहती है, जो अपने दायरे से बाहर हैं। किन्तु महँगी शिक्षा पाये ऐसे व्यक्ति भी मिलते हैं, जो उन बातों के प्रति सजग नहीं रहते जिन्हें वे नहीं जानते हैं।
हमारा कुल ज्ञान-अज्ञान सापेक्ष होता है, देशकाल के हिसाब से यह बदलता है। अपने अज्ञान के प्रति सचेत व्यक्ति पक्की ज़मीन पर खड़ा रहता है। उसे ध्यान रहता है कि सृष्टि से मनुष्य बना है, मनुष्य ने सृष्टि को नहीं बनाया है। हम अपनी दुनिया में कई तरह के फेरबदल कर सकते हैं, लेकिन कोई दूसरी दुनिया नहीं बना सकता है। बचपन में टी.वी. पर एक कार्यक्रम देखा था, ‘भारत एक खोज’। वह एक संस्कृत गीत से खुलता था, फिर उसका अनुवाद भी गान में आ जाता था। ‘सृष्टि का कौन है कत्र्ता? कत्र्ता है या है विकत्र्ता? ऊँचे आकाश में रहता, सदा अध्यक्ष बना रहता, वह ही सचमुच में जानता, या नहीं भी जानता, है किसी को नहीं पता, नहीं पता, नहीं है पता, नहीं है पता...’
बहुत बाद में पता चला कि यह ‘ऋग्वेद’ का ‘नासदीय सूक्त’ कहा जाता है। ऐसे वेद पढ़े हुए लोगों से मिला हूँ जिनके आचरण से लगता है कि वे सब कुछ जानते हैं। और ऐसे साधारण लोग भी मिले हैं जिन्होंने कभी वेद नहीं पढ़े, लेकिन ‘नहीं पता’ वाली बात उन्हें सहज ही पता है।
जब उनके कान में ‘छपाक्’ की आवाज़ पड़ती है, तब उन्हें उसका मतलब भी पता होता है।
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इसके पीछे कोई योजना नहीं थी। खेती और पर्यावरण पर खोजते-लिखते मैं अकस्मात ही ‘जल थल मल’ के रास्ते आ गया। अब स्वच्छता की दुनिया को नये सिरे से समझना था। हमारे यहाँ सूखे शौचालयों को साफ़ करने का काम जाति के आधार पर कई शताब्दियोँ से होता आया है। इन्दौर में हमारे पुश्तैनी घर में यह 1990 के दशक तक हो रहा था। लेकिन सीवर की नालियाँ कई जगह बनी और ऐसा लगने लगा कि यह प्रथा समाप्त हो गयी है। किन्तु हमारा देश बहुत बड़ा है, बहुत विविध है। इसमें ऐसी अनेक बातें हैं जो हम सत्य मानते हैं, पर उनका विपरीत भी सत्य निकलता है। चूँकि हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा सूखे शौचालय इस्तेमाल नहीं करता, इसलिए ऐसा लगता है कि यह प्रथा खतम हो गयी है।
सच्चाई इससे बहुत अलग है। जो लोग हाथ से मैला साफ़ करने के लिए सिफऱ् इसलिए मजबूर हैं क्योंकि उनका जन्म एक जाति विशेष में हुआ है, उनके प्रति व्यापक समाज में संवेदना नहीं है। इस संवेदना को जगाने का काम पत्रकारिता को करना चाहिए, लेकिन हमारा पत्रकारिता जगत राजनीतिक सत्ता और साधन-संपन्न शहरी लोगों के सम्मोहन में रहता है। उन्हीं की सुनता है, उन्हीं को सुनाता है, उन्हीं से विज्ञापन पाता है, उन्हीं में रमा रहता है। कारीगरों, किसानों और मजदूरों पर सामग्री साधारणतया पढ़ने-देखने को मिलती ही नहीं है। इस वजह से हम अपने देश और समाज के एक बड़े हिस्से से अनजान रहते हैं। अपने अज्ञान का बोध तक हमें हो नहीं पाता है।
मैला ढोने वाली जातियों की हालात पर कुछ पुस्तकें मिलीं। उन्हें पढ़ने के बाद उन कार्यकत्र्ताओं से सम्पर्क किया जो इन जातियों की मुक्ति के लिए काम करते हैं। बेजवाड़ा विलसन और सफ़ाई कर्मचारी अभियान के उनके सहयोगियों से परिचय हुआ। तीन दशक के उनके काम से एक अभियान खड़ा हुआ है, इन जातियों की मैला ढोने के काम से मुक्ति के लिए। इसका एक हिस्सा कानूनी है, क्योंकि यह काम गैर-कानूनी होने के बावजूद होता है। दूसरा हिस्सा सामाजिक है, जिसमें वे इन मजबूर जातियों के लोगों को संगठित करते हैं, ताकि वे अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर सकें।
यह संघर्ष बहुत कड़वा है, क्योंकि जिन लोगों ने सदियों से यह अन्याय सहा है, उनकी वेदना की कल्पना करना भी बाहर के लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है। लेकिन विलसनभाई में मैंने किसी के प्रति वैमनस्य नहीं पाया। घृणा में लिप्त इस विषय को वे प्रेम और सामाजिकता से बरतते हैं। उनके पास अधीर हो के अतिवाद का सहारा लेने के सभी कारण हैं, लेकिन मैंने उनमें वही गुण पाए जो हमारे स्वतन्त्रता संग्राम में थे, अपने आप से बाहर निकल के कुछ बड़ा सोचने का बड़प्पन, सालों-साल एक समाजिक लड़ाई को नैतिक आधार पर लड़ने की हिम्मत, अपने साधनों को अपने साध्य की तरह ही साफ़-सुथरा रखने की साधना।
फिर भी, यह समझ नहीं आता कि हमारा समाज और सरकार सफ़ाई कर्मचारियों के प्रति इतने उदासीन कैसे हैं। इसका एक कारण यह हो सकता है कि इस कड़वी सच्चाई को हम सामाजिक रूप से देखने कि बजाए विचारधारा की आँख से देखते हैं। जिसकी जैसी विचारधारा होती है, वह इस प्रथा का इतिहास वैसे ही समझता है। यानी इसका समाधान तभी हो सकता है जब उस विचारधारा के हिसाब से पूरा समाज बदल जाए। लेकिन अगर कोई भी एक विचारधारा एकदम ठीक होती, तो आज इतनी सारी विचारधाराएँ होती ही नहीं। इस बुरी प्रथा का ऐतिहासिक कारण जो कुछ भी रहा हो, आज इस जातिगत मलिनता को हम मिटा क्यों नहीं पाते? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी सामाजिक संवेदना का अपहरण राजनीतिक विचारधारा ने कर लिया है? जो हम नहीं जानते हैं, उसे करुणा के साथ समझने की बजाए हम सिद्धान्त, आदर्श, इतिहास और अपने ज्ञान की जकड़ में रहते हैं?
सन् 2014 में केन्द्र सरकार में बदलाव आया। नये प्रधानमन्त्री ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का उद्घाटन किया तो वह भी वाल्मिकी बस्ती से। वाल्मिकी जाति के लोग सफ़ाई करने के जातिगत काम से मुक्ति चाहते हैं। इस मुक्ति के लिए संसद ने दो बार कानून बनाये हैं, जिनमें इन जातियों के पुनर्वास का प्रावधान भी है। उन कानूनों के पालन की बजाए प्रधानमन्त्री ने देश की स्वच्छता का अभियान वाल्मिकी जाति से जोड़ दिया। हजारों करोंड़ रुपये का खर्च इस कार्यक्रम के अन्तर्गत शौचालय बनाने में किया गया है, लेकिन मैला ढोने वाली जातियों की मुक्ति के लिए जो खर्च करने का निर्देश कानून में है, उसका पालन नहीं हुआ है। इससे दिखता तो यही है कि हमारा स्वच्छता का आग्रह अपने लोगों की चिन्ता से नहीं, हमारे सत्तावान लोगों की अपनी छवि की स्वच्छता से निकला है। हमने अपनी स्वच्छता का बोझ या तो उन जलस्रोतों पर डाल दिया है जिनमें हमारा मैला पानी जाता है, या उन दलित जातियों पर जो सफ़ाई का काम करने के लिए मजबूर हैं। समय के साथ अन्याय कम होने की बजाए एक और विकृत रूप ले चुका है। सीवर की नालियों को साफ़ करने के लिए सफ़ाई कर्मचारियों को उनके भीतर उतरना पड़ता है। यह काम करते हुए हर साल बीसियों लोग अपनी जान गँवा देते हैं, और न जाने कितने लोग ऐसे रोगों के शिकार हो जाते हैं जो इस नर्क में उतरने से होती हैं। सफ़ाई के मन्दिर में हमने एक नयी बलि प्रथा शुरू कर दी है।
इस प्रथा का इतिहास समझना भी ज़रूरी काम है। मुझे इस पर दो कमाल की किताबें मिली। पहली का नाम है ‘नरक सफ़ाई’, और इसे मुम्बई के दो सामाजिक कार्यकत्र्ताओं ने महाराष्ट्र और गुजरात में कई महीने के सर्वेक्षण और मेहनत के बाद मराठी में लिखा था। इसका हिन्दी अनुवाद सन् 1996 में दिल्ली से छपा था। इसके दो लेखकों में एक हैं मुहम्मद खड़स, जिनसे मैं मुम्बई में मिला। उनके पास मराठी मूल तो था पर हिन्दी की एक प्रति भी नहीं थी। दिल्ली में हिन्दी की अन्तिम प्रति प्रकाशक की कृपा से मुझे उनके गोदाम से प्राप्त हुई। दूसरी किताब सन् 2000 में अँग्रेज़ी में छपी थी, और दिल्ली के समाजशास्त्री विजय प्रशाद की डाॅक्टरेट पर आधारित थी। अपने अथक शोध से श्री विजय ने दिल्ली और पंजाब की वाल्मिकी जाति का सामाजिक इतिहास जोड़ा था। अब वे अमेरिका में पढ़ाते हैं और एक इतिहासकार के नाते बहुत चर्चित हैं।
‘जल थल मल’ छपने के बाद एक टी.वी. कार्यक्रम में इस पुस्तक की चर्चा हुई। इसकी खबर श्री विजय तक भी पहुँची। तब उन्होंने एक लेख लिखा। इसमें उन्होंने बतलाया कि यह शोध करने में उन्हें विश्वविद्यालय और अकादमिक दुनिया की तरफ़ से कितनी परेशानी झेलनी पड़ी। उनका शोध गहन था पर उनकी लिखाई स्पष्ट और सामाजिक थी। कई प्राध्यापकों ने इसके लिए उनकी आलोचना की, जैसे सहज भाषा में लिखना शास्त्रीय ज्ञान का अपमान हो। यही नहीं, कम-से-कम 20 प्रकाशकों ने इस किताब की पाण्डुलिपि अस्वीकार कर के लौटायी। अन्ततः यह छपी इसलिए कि एक सहृदय सम्पादिका ने अपने प्रकाशन को धमकी दी कि इसे न छापने की सूरत में वे नौकरी छोड़ देंगी। हर स्तर पर हमारा समाज मैला ढोने की प्रथा से जी चुराता है। और जो दो पुस्तकें इस जातिगत मलिनता को गहरायी से समझने की कोशिश करती हैं, वे दोनों ही पहले संस्करण के बाद गुमनामी में खो गयीं।
इस प्रथा का इतिहास समझते हुए जाति के बारे में बहुत कुछ ऐसा मिला जो मेरे लिए नया था। इतिहास पढ़ने और पढ़ाने वाले परिचित लोगों से पूछते-पूछते मुझे अमेरिकी मानवशास्त्री बरनार्ड कोह्न के काम का परिचय मिला। उन्होंने 1950 के दशक में अपने शोध के दौरान जाति के स्वभाव पर नया प्रकाश डाला था और उनके काम से प्रेरित कई शास्त्रीय विद्वानों ने ताज़ी आँख से जाति को समझने की कोशिश की है। श्री बरनार्ड के शोध में हमारे समाज पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के असर को समझने की नयी दृष्टि मिलती है। तो क्या अँग्रेज़ हुकूमत के पहले हमारे समाज में जाति या उसके आधार पर भेदभाव नहीं था? क्या हमारा स्वरूप किसी आदर्श समाज का था? ऐसा लगता नहीं है। अच्छी-बुरी बातें तो तब भी थीं। लेकिन ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने हमारी समझ को बहुत बदला है। ऐसा भी प्रतीत होता है कि गुलामी के इस दौर में हमारे सामाजिक अवगुणों का विस्तार और विकास हुआ, जबकि हमारे सामाजिक गुणों का विक्षेप और क्षय हुआ।
आज हमारे देसी गुणों को समझने और संजोने की बात बहुत से लोग करते हैं। लेकिन हमारा पढ़ा-लिखा समाज साम्राज्यवाद की पढ़ाई में बहुत उलझा हुआ है, चाहे उसकी नज़र नकारात्मक हो या सकारात्मक। हमारे ज़माने की हवा में साधारण समाज के ऐसे लोग भी बहते जा रहे हैं जिनके आचरण में वे सामाजिक गुण सहज रूप से मौजूद हैं। ऐसे में श्री बरनार्ड जैसे शास्त्रीय विद्वानों के काम का महत्व बढ़ता है, फिर चाहे वे विदेशी ही क्यों न हों। क्योंकि वे हमें साम्राज्यवाद के ज्ञान के दर्शन कराते हैं, उसका बोध कराते हैं। साम्राज्यवादी ज्ञान ने हमारा अपना माथा बदला है, हमें अपने लोगों से दूर किया है, हमारी पुरानी कड़वाहट बढ़ाई है, और पुराना अपनापन घटाया है। इस ज्ञान से लड़ना असम्भव है, क्योंकि इस लड़ाई में हमारी हार निश्चित है, इसका पक्ष और विपक्ष, दोनों ही साम्राज्यवाद ने गढ़े हैं। शायद इस ज्ञान को विसर्जित करने से ही कुछ रास्ता निकल आए। हमें अपने ज्ञान को किनारे रख के, अपने शौचालयों के नीचे से आने वाली आवाज़ को ध्यान से सुनना पड़ेगा। सीवरों में उतरने वाले अपने ही लोगों की वेदना को स्पर्श करना पड़ेगा, अपनेपन के साथ।
पवित्र-अपवित्र का बोध हममें बचपन से डाला जाता है। मलत्याग करने के बाद जब हम गुदा धोते हैं तो ‘पवित्र’ दाहिना हाथ पानी डालता है और ‘अपवित्र’ बाँया हाथ धोता है। ‘जल थल मल’ ने मुझे बाँए हाथ से पानी डालना और दाहिने हाथ से धोना सीखा दिया। दोनों हाथ अपने ही हैं।
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आखिरकार कोलकाता में ध्रुबोज्योति घोष से मिलना हुआ। पूर्वी कोलकाता की भेरियों को बचाने वाले वे ही थे। अनेक पत्रकारों से उनके बारे में सुना था। उनसे लोग डरते थे। वे स्वभाव से बहुत कड़क और अपने विचार के पक्के माने जाते थे। पर मेरा अनुभव तो एकदम अलग रहा। उन्होंने अपने बच्चे की तरह मुझे स्नेह दिया, खुले दिल से अपनी अपार शोध सामग्री दिखायी, भेरियाँ दिखाने ले के गये। इसका एक कारण था अनुपम चाचा के प्रति उनका सम्मान था। यात्राओं और अध्ययन के दौरान मुझे कई ऊँचे और बढि़या लोग मिले। धीरे-धीरे समझ में आया कि मेरे पिताजी और अनुपमजी ने सालों की मेहनत से कितने मीठे सामाजिक सम्बन्धों का संसार गढ़ लिया था, जिसका रस मुझे सहज ही मिल रहा था। इन सम्बन्धों से नया परिचय भी हुआ। दोनों ही लोग गाँध्ाी विचार से निकले थे। गाँध्ाीजी का प्रेम संसार कितना व्यापक रहा होगा, इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है।
दक्षिण भारत में नये सिरे से यात्राएँ की। यहाँ भी एक-के-बाद-एक बढि़या लोगों का काम देखने को मिला। बेंगलुरु के विश्वनाथ के बारे में पढ़ा-सुना था। उनसे मिल के पता लगा कि वे कितने जानकार हैं। तमिलनाडु के श्री सुब्बुरामन के साथ यात्रा करना यादगार रहा। उन्होंने हज़ारों सुन्दर और कारगर शौचालय बनाये हैं। उनका अनुभव उतना ही गहरा है जितना उनका व्यवहार सहज। उनकी प्रेरणा से मूसिरी नगर पंचायत में वह आधुनिक शौचालय देखा जो ज़मीन को उर्वर और इलाके को साफ़ रखता है। आज भी जब कभी यात्राओं में लिए नोट्स निकाल के देखता हूँ, तब आश्चर्य होता है कि कितने सारे अच्छे लोगों से मिल सका। कितने उदार मन से लोगों ने समय निकाला, मदद दी। उनका आभार प्रकट करने में न जाने कितना समय चला जाए। इसका आभास भी हुआ कि सिफऱ् प्रकृति और मिट्टी-पानी से ही नहीं, हम न जाने कितने लोगों के साथ मन से भी जुड़े रहते हैं, चाहे हम ध्यान दें या न दें।
पढ़ी-लिखी दुनिया से भी ‘जल थल मल’ ने नया परिचय कराया। बीसियों सुन्दर पुस्तकें मिली, हज़ारों शोध-पत्र इकट्ठे हुए। जीवन भर लिख सकूँ, इतनी सामग्री जुट गयी है। अनेक विद्वानों की मेहनत का फल मिला, उनके लिखे से, उनके साक्षात्कार से। इस काम में मैं यूँ ही, अपनी जिज्ञासा का पीछा करते हुए आया था। मेहनत करने का फल किताब लिखने के पहले ही मिल गया। मल-मूत्र में झाँकते-झाँकते एक ताज़ी दृष्टि मिली। मूल्य क्या होता है, योग्यता कैसे मिलती है, रास्ते कैसे खुलते हैं, ध्येय क्या होता है, ज्ञान-अज्ञान का सम्बन्ध क्या है... यह सब बरतने की एक नयी संवेदना!
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सोचा था एक साल में काम पूरा कर लूँगा पर अब तो नौकरी छोड़े को ढाई साल से ज़्यादा बीत चुके थे। अपार सामग्री एकत्र हो चुकि थी। लेकिन कुछ भी लिखा नहीं जा रहा था। अनुपम चाचा का धीरज तक चुकने लगा था। बीच-बीच में पूछते थे, ‘बेटा, लिख क्यों नहीं रहे हो? लिख के दिखाओ।’ मित्रों ने मज़ाक में खिंचाई भी शुरू कर दी थी और वे चिन्ता भी जताने लगे थे। दूसरे हर तरह के लेख लिख रहा था, तरह-तरह के काम कर रहा था। किन्तु ढाई-तीन साल की मेहनत और दस साल के अनुभव और चिंतन के बावजूद ‘जल थल मल’ पर दिखाने को कुछ भी नहीं था। आत्मविश्वास डोलने लगा था, लगने लगा था कि यह क्या बला मोल ले ली।
सोच तो यह था कि इस जटिल विषय का साधारण लोगों के लिए निरूपण करूँगा। ऐसी पुस्तक लिखूँगा जिसमें सटीक बातों का संक्षिप्त वर्णन होगा। यानी कि शौचालय कैसे बनाया जाए, नदी को साफ़ करने के तरीके क्या हो सकते हैं, खेती की ज़मीन कैसे सुधारी जाए। लेकिन ढाई साल में उस मानसिकता से मैं बहुत दूर आ चुका था। प्राकृतिक सम्बन्धों की जटिलता का आभास होने से यह इच्छा ही खतम हो गयी थी कि किसी को उसका जीवन जीने के तरीके बताऊँ। विशेषज्ञों से जिस तरह के ज्ञान की अपेक्षा होती है, उससे डर लगने लगा था। मुम्बई में संयुक्त राष्ट्र की एक बैठक विशाल बैठक में मैं उपस्थित रहा था, जिसमें दुनिया भर के विशेषज्ञ यह बात कर रहे थे कि खुले में शौच जाने वालों को शर्मिंदा करने के वैज्ञानिक तरीके क्या हो सकते हैं। वह भी एक पाँच सितारा होटल में बैठ के, जिसमें पानी की घोर बरबादी तो होती ही है, जिसका मैला पानी किसी नदी-तालाब को दूषित करता है। लेकिन उन्हें शर्मिंदा करने वाला कोई नहीं था। ऐसे अनेक लोग मिले थे जिनका ढेर-सा ज्ञान भी उन्हें अच्छे कामों की ओर नहीं ले जा रहा था। इसके ठीक विपरीत, ऐसे लोग भी मिले थे जो कहीं से ज्ञानी नहीं कहे जा सकते, लेकिन सहज ही बहुत सुन्दर और ऊँचा काम कर रहे थे।
हमारे नये पढ़े-लिखे लोगों में एक नया जुमला आया है, ‘नकारात्मक बात मत कीजिए, समाधान बताइए। समाधान क्या है?’ टी.वी. स्टूडियो से ले के सार्वजनिक बैठकों तक में समाधान की बात ऐसे होती है जैसे हर समस्या का समाधान परचून की दुकान पर मिलता हो। बस, विशेषज्ञ बुलाइए, समाधान पाइए। जैसा विशेषज्ञ वैसी पुडि़या पाईए। अगर स्थानीय विशेषज्ञ है, तो समाधान बीस रुपये किलो! अगर राष्ट्रीय स्तर का विशेषज्ञ है तो हज़ार रुपये का पाव भर! अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ तोले-दो-तोले का भी लाखों रुपया ले सकते हैं। विशेषज्ञों से अटे इस मौसमी ज्ञान संसार में कोई यह नहीं पूछता कि समय-सिद्ध काम कहाँ है? ऐसा क्या है जो हम नहीं जानते, जिसका अज्ञान हमारी बड़ी-से-बड़ी योजना को ढकोसला बना के छोड़ देता है? नीति निर्धारण में ऐसा क्या है कि सरकारी कार्यक्रम अनीति पर उतर आते हैं?
सरकारी कार्यक्रमों की आलोचना कर के और उनमें बदलाव सुझाने की इच्छा ही नहीं थी। सरकारों के पास एक-से-एक विशेषज्ञ भी रहते हैं और उन्हें क्या करना चाहिए, यह बताने वाले अनगिनत ज्ञानीजन पहले से हैं। उनकी एक लम्बी कतार है, जिसमें आप कहाँ खड़े हैं यह इससे तय होता है कि आपकी डिग्री कितनी वज़नदार है। आपने अगर सामाजिक काम किया है या सामाजिक काम करने वालों को समझा है, तो अपन-आप ही आप इस कतार के आखिर में पहुँचा दिए जाते हैं। मुझे इस कतार में खड़ा नहीं होना था।
नीति और आदर्श बताने में मेरी रुचि पहले ही बहुत कम थी। ढाई साल के अनुभवों ने तो उसे मिटा ही दिया था। मुझे कोई समाधान नहीं देना था, किसी को प्रेरित नहीं करना था, कोई आदर्श नहीं सुझाने थे, कोई योजना नहीं प्रस्तावित करनी थी, किसी तकनीक के फ़ायदे नहीं जताने थे। हम सब जीवन की बाज़ी अपने-अपने हिसाब से खेल रहे हैं, अपने-अपने मूल्यों के आधार पर, किसी योजना के अन्तर्गत नहीं। किसी काम के असल नतीजे समय के साथ ही पता लगते हैं। अच्छी योजनाओं के नतीजे खराब भी होते हैं और खराब योजनाओं के अच्छे परिणाम अचानक निकल आते हैं।
साधारण लोगों का अच्छा काम शुरू कैसे होता है, उसकी प्रेरणा उन्हें कैसे मिलती है, यह मैंने बार-बार पूछा। ऐसा लगा कि उन्हें कहीं-न-कहीं से सहज विचार मिलता है। कहाँ से मिलता है, कहा नहीं जा सकता। पद्मा वांग्याल के लिए यह सेना में भर्ती न हो पाने का दुख था, ध्रुबाज्योति घोष के लिए यह जानने की जिज्ञासा थी कि कोलकाता का मैला पानी कहाँ जाता है, सुब्बुरामन के लिए गाँव में उसी तालाब का पानी पीने की मजबूरी थी, जिसके किनारे उसी सुबह उन्होंने मलत्याग किया था।
अच्छा काम करने वाले अपनी सुविधा की नहीं सोचते, वे दुविधा से प्यार करते हैं। कठिन परिस्थिति में रहने वाले कठिनाई को सहज ही साध लेते हैं, चाहे लद्दाख के किसान हों, पूर्वी कोलकाता के मछुआरे या तमिलनाडु में इकोसैन शौचालय बनाने वाले। अपने मिट्टी-पानी से उनका सम्बन्ध सीधा होता है। वे कोई माॅडल बना के दूसरों को नहीं सिखाना चाहते, वे अपने जीवन को ठीक से जीने के व्यवहारिक तरीके खोजते हैं। अपने प्रयोगों के आधार पर अपना जीवन बदलने की हिम्मत रखते हैं। कई अच्छे काम करने वालों में एक और बात दिखीः वे जो नहीं जानते हैं, उसमें उनका विश्वास था। यानी अपने अज्ञान में एक सुरुचिपूर्ण विश्वास।
‘जल थल मल’ की यात्रा में ढेर सारा ज्ञान एकत्रित हो चुका था। जीवन पर, समाज पर, हमारी पृथ्वी पर। और बात करनी थी मुझे अज्ञान की! न कुछ लिखते बन रहा था, न कोई रास्ता ही सूझ रहा था।
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‘नाना, अपना के नी पतो कि भगवान किना रूप में आ के अपनी परीक्षा लइ ले। तो अपना के जो नी पता होए, ओके भगवान मान के चलनो।’ मालवी बोली में यह बात मेरी दादी अलग-अलग रूप में कहा करती थीं। इसका अनुवाद पढि़ए, ‘बेटा, भगवान किस रूप में आ के हमारी परीक्षा लेने लगें यह हम नहीं जानते। इसलिए जो तू नहीं जानता है, उसे भगवान मान के चलना।’ हम सभी बच्चों के लिए दुनिया की सबसे मज़ेदार बात हमारी दादी की कथा-कहानियाँ ही हुआ करती थीं। एक कहानी के लालच दे के वे हमसे कुछ भी करा सकती थीं।
कि़स्से-कहानी कहना-सुनना ही उनके लिए जीवन की कठिनाइयों को सहने का और प्रियजनों के साथ उत्सव मनाने का तरीका था। उनकी माँ उन्हें जन्म देने के कुछ समय बाद ही गुज़र गयी थीं, पिता और चाचा ने सन्यास ले लिया था। सम्बन्ध्ाियों ने उन्हें पाला था। आठ साल की उमर में एक गरीब घर में उनकी शादी हो गयी थी। उनके पति यानी हमारे दादा प्रतिभावान और प्रेमी व्यक्ति थे, लेकिन उनके गुस्से से सारा कुनबा थर्राता था। दादी पर घर-गिरस्ती चलाने का ही नहीं, दस बच्चों और कई सम्बन्ध्ाियों को पालने-पोसने का जिम्मा भी था।
वैष्णव परवरिश ने उन में सुन्दर भजन और कि़स्से-कहानी का स्वाद पैदा कर दिया था। फिर उन्होंने पढ़ना सीख लिया और भाग्वद्पुराण से ले के गुलशन नन्दा के उपन्यासों तक न जाने क्या-क्या पढ़ डाला। दादा की मृत्यु के बाद उन्होंने भी अपना जीवन सन्यासियों जैसा बना लिया था। तीर्थाटन में ही रहती और बीच-बीच में मिलने आतीं। उनके दिल्ली आने से हमारा संसार आबाद हो जाता था। उनकी सखी-सहेलियाँ साथ आती थीं, जिन्हें वे तीर्थ करने के लिए साथ खींच लातीं। इन वृद्ध महिलाओं का समय कथा और भजन में ही बीतता। हम बच्चे इनकी कुछ सेवा करते और उनकी कथा भी सुनते थे। हमारे कुनबे में पढ़ने-लिखने का रस दादी से ही फैला। क्योंकि उनके लिए कथा पढ़ना-सुनाना जीवन जीने का तरीका था, समाज सुधार का नहीं। अगर मैं लिख के, सम्पादन कर के अपनी आजीविका चला लेता हूँ तो इसका श्रेय स्कूल और शिक्षकों से ज़्यादा मेरी दादी को जाता है।
‘जल थल मल’ का शोध पूरा हो चुका था। लिखने की सभी कोशिशें नाकाम हो रही थीं। जो भी लिखता, उसे किसी मित्र को ही दिखाने की इच्छा नहीं होती थी। अनुपम चाचा को कैसे दिखाता? फिर किसी कारण से एक सन्दर्भ ढूँढ़ते हुए पिताजी की लिखी कुछ पंक्तियाँ पढ़ीं। उन्हें यहाँ दुहराता हूँ, ‘संघ परिवारी प्रकाशन गृहों से जितना भी साहित्य मिल सकता था खरीद के लाया, दोस्तों से किताबें बटोरीं, लाइब्रेरियों की खाक छानी और ऐसे मनोयोग और अनुशासन से पढ़ना शुरू किया जैसा कि जि़न्दगी में कभी नहीं किया था। लेकिन जैसे-जैसे पढ़ता और नोट्स लेता गया मेरा मन उचटा गया। ऐसे तो एक शास्त्रीय पुस्तक लिखी जाएगी और अपन न शास्त्री हैं न अपने को संघ सम्प्रदाय के शास्त्रियों से शास्त्रार्थ करना है।’
उसी क्षण उलझे हुए गुच्छे में धागे का सिरा मिल गया। शास्त्रीय बात को शास्त्रीय लोग ही करते हुए ठीक लगते हैं। एक सामाजिक पत्रकार को शास्त्रीय बात करना शोभा नहीं देता। जो अपनापन मैं अपनी लिखाई में चाहता था, उसकी ध्वनि मेरी दादी की कहानियों से ही निकली थी। ज्ञान का बोझ मेरी भाषा नहीं उठा सकती थी। लेकिन कोई लम्बी कहानी कहना तो मेरे बूते से बाहर नहीं था। यानी मैंने जो इकट्ठा किया था, वह मेरे लिए ज्ञान नहीं था, सिफऱ् अपनी बात सुनाने की सामग्री थी। बस, मुझे पत्रकार वाली सावधानी बरतनी थी कि हर बात का प्रमाण और आधार पाठक के सामने रखूँ। उसी समय किताब की पहली पंक्ति सूझ गयी। ‘बात पुराने ज़माने की है...’
इसमें यह जोखिम ज़रूर था कि सारी सामग्री घिच-पिच हो जाए। लेकिन यह खतरा तो नहीं था कि बिना पात्रता के मैं शास्त्रीय बात कहूँ। यह तो पता ही है हममें से किसी का लिखा हुआ अन्तिम नहीं होता। किसी एक लेख या पुस्तक की कमी अगले लेख या अगली पुस्तक में पूरी की जा सकती है। फिर अगर सुधार मैं खुद नहीं कर सका तो कोई और कर सकता है। किन्तु अपनी बात को अपने तरीके से कहने का जोखिम उठाना ज़रूरी था।
इसके बाद चार-पाँच महीने में ही लेखन पूरा हो गया। अगर लिखाई का भाव सामाजिक हो, दस्तकारी का हो तो फ़ोटो और अकादमिक ग्राफ़ से काम नहीं चल सकता। लिखाई की तरह सज्जा को घरेलू रखने के लिए हाथ के चित्र ही बनवाने की इच्छा थी। कुछेक प्रतिभाशाली कलाकार मित्रों से बात हुई। मुझे लगा कि यह ज़रूरी है कि कलाकार हिन्दीभाषी ही हो, पाठक के मानस से मिलता हुआ। बिहार में बड़े हुए सोमेश कुमार से कुछ साल पहले परिचय हुआ था। उसके एक प्रशिक्षक के साथ मैंने पहले काम भी किया था। उनसे पूछा। उनका आश्वासन मिला, तब सोमेश से बात हुई। धीरे-धीरे आज़मा के चित्रों की शैली तय हुई। काम लम्बा और मेहनत का था, सोमेश ने सिफऱ् अपने बुनियादी खर्चे पर काम किया। उसका मेहनताना मित्रवर फ़रहाद काॅण्ट्रेक्टर ने अपने पल्ले से दिया। सज्जा का काम पूरा होते-होते दो साल लग गये। लेकिन सोमेश के साथ काम करना इतना आनन्दकर अनुभव रहा कि उसके बाद हम दोनों ने मिल के दो पुस्तकें और बनायी हैं।
15 जुलाई 2016 को पहली प्रति छप के आयी, जिसे ले के मैं अनुपम चाचा के पास उनके घर गया। छह महीने पहले ही पता चला था कि उन्हें कैंसर है। उनकी तबीयत बिगड़ने लगी थी, दफ़्तर आना उन्होंने बन्द कर दिया था। उस दिन उन्होंने पुस्तक हाथ में ली और उनकी आँखें नम हो गयीं। बोले, ‘आज भाई साहब का जन्मदिन है ना!’ उसके बाद जो उन्होंने कहा, वह मेरे और उनके बीच ही रहेगा। जितने लोगों का प्यार हमें मिला था, उन्हें याद कर के दोनों चुपचाप रो पड़े। पाँच महीने बाद अनुपम चाचा का देहान्त हो गया। मुझ जैसे बहुत-से लोगों के जीवन का एक पड़ाव समाप्त हो गया।
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मुझे कोई अन्दाज़ा नहीं था कि यह पुस्तक पढ़ी जाएगी भी या नहीं। बस अनुपम चाचा का आश्वासन था, ‘लोग नाहक शिकायत करते हैं कि उन्हें अपने काम का श्रेय नहीं मिला। ठीक सामाजिक भाव से करो अपना काम करो और समाज पर छोड़ दो। तुम्हारी योग्यता से ज़्यादा श्रेय मिलेगा।’ पुस्तक छप के आने के बाद दो-ढाई साल में ‘जल थल मल’ के पाठकों ने उस पर 100 से अधिक कार्यक्रमों में मुझे बुलाया है। असीम प्यार और सम्मान दिया है, ढे़र सारी प्रशंसा भी। लगभग रोज़ ही किसी-न-किसी का प्यार भरा सन्देश आज भी आता है। पाठकों में से कई नये मित्र भी बने हैं।
जिन बढि़या पुस्तकों का उल्लेख ‘जल थल मल’ में किया गया है, उनमें भी कुछ लोगों की नयी रुचि जगी है। ‘सफ़ाई विज्ञान और कला’ शीर्षक की एक बढि़या पुस्तक वाराणसी के वल्लभस्वामी की सन् 1957 में प्रकाशित हुई थी और अप्राप्य थी। इसका पुनः प्रकाशन हुआ है। जोसेफ़ जेनिं्कस नामक एक अमेरिकी लेखक की एक अद्वितीय पुस्तक है ‘द ह्यूमन्योर हैंडबुक’, जिसका वर्णन पुस्तक में है। इसका भारतीय संस्करण इन्दौर के एक सहृदय प्रकाशक ने निकाला है। मैं कोशिश में हूँ कि ‘नरक सफ़ाई’ और ‘अनटचेबल फ्रीडम’ भी पुनः प्रकाशित हों। अगर हम चाहते हैं कि आगे अच्छा काम हो तो यह ज़रूरी है कि अच्छा विचार और अच्छी लिखाई के लिए नयी ज़मीन भी तैयार हो।
सामाजिक भाव से बनी किसी पुस्तक की असली कसौटी तो यही है कि वह साधारण सामाजिक कार्यकत्र्ताओं के लिए भी उपयोगी हो। यही ‘जल थल मल’ का काम है, यही इसका विचार है। जिन अच्छे कामों का वर्णन इसमें है, उसे पढ़ के कुछ मित्रों ने अपने शौचालय बदले हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने इसकी बीसियों प्रतियाँ बाँटी हैं। उनसे सुनने को मिला है कि कुछ पाठकों ने स्वच्छता को मिट्टी और पानी से जोड़ने के प्रयोग शुरू कर दिए हैं। जिन समय-सिद्ध कामों का यशगान ‘जल थल मल’ ने किया है, उनकी कीर्ती थोड़ी आगे गयी है। उनका विचार फैला है। पत्रकारिता डाक विभाग जैसा काम है। अच्छे विचार और समय-सिद्ध काम को नये चाहने वाले मिले, यह किसी डाकिये का सौभाग्य ही हो सकता है। इस डाकिये को यह मिला है।
बहुत दिनों के बाद पिछले महीने पद्मा वांग्याल से फ़ोन पर बात हुई। मैं उसे बता रहा था कि उसके दो शब्दों की गूँज का मुझ पर कितना गहरा असर हुआ। पद्मा को 15 साल पहले मेरे साथ गुज़ारे दो दिन एकदम ठीक से याद थे। उसे वह भी याद था जो मैं भूल गया था। उसने मुझे बताया कि मैंने उसे एक रंगीन पन्नों की रिपोर्टर वाली नोटबुक भेंट की थी, जिसका उसने उपयोग कई साल से नहीं किया था। उस नोटबुक को उसने अभी हाल में निकाला है।
कितना अच्छा होगा कि पद्मा के सहज कान जो सुनें, उसे वह उन पन्नों पर उतार दे।

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