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फि़क्शन की सच्चाइयाँ शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी
08-Jun-2019 06:30 PM 467     

यह मेरे लिए बड़े इज़्ज़त की बात की है कि मैं शमीम निकहत यादगारी व्याख्यानों के सिलसिले का पहला व्याख्यान पेश करने के लिए आपके सामने हाजि़र हूँ। इज़्ज़त से ज़्यादा, यह मौक़ा मेरे लिए ख़ुशी का होता अगर मरहूमा हमारे दर्मियान होतीं। शमीम निकहत चूँकि क़ाबिले जि़क्र अफ़साना निगार और फि़क्शन की मातबर1 क़ारी2 थीं, इसलिए यह व्याख्यान एक तरह से उनकी खि़दमत में ख़राजे अक़ीदत3 भी कहा जा सकता है। मैं उन फि़क्शन निगारों की खि़दमत में बध्ााई भी पेश करता हूँ, जिन्हें आज शमीम निकहत यादगारी एवार्ड से सम्मानित किया जाएगा। इक़्बाल मजीद, सईद मुहम्मद अशरफ़, तरन्नुम रियाज़, हमारे लिए क़ीमती और क़ाबिले एहतिराम नाम हैं और ये तीनों फि़क्शन निगार हर तरह इस एवार्ड के हक़दार थे।
शमीम निकहत ने लम्बी बीमारी बड़ी मज़्बूती और सलाबत4 किरदार के साथ झेली। वे ग़ैर-मामूली सलाहीयत5 की ख़ातून थीं लेकिन जि़न्दगी ने उन्हें वह कुछ करने का मौक़ा नहीं दिया जिसके लिए लियाक़त6 और सलाहीयत ख़ुदा ने उनको वदीअत7 की थी। इकलौती, जवान बेटी का ग़म, और वह भी ऐसे वक़्त जब बेटी एक और जान को दुनिया-ए-फ़ानी8 में लाने की कशमकश में गिऱतार थी, ऐसा ग़म नहीं जिससे कोई भी सलामत निकल आए। लेकिन वे इस भयानक हादिसे को ज्यों-त्यों करके सह गयीं, दुनिया को कानों कान ख़बर न लगी।
सतह पे ताज़ा फूल हैं कौन समझ सका ये राज़,
आग किधर-किधर लगी शोला कहाँ-कहाँ गया।
यूनिवर्सिटी में तालीमी सरगर्मियाँ, घर-गृहस्थी और फिर शुआअ फ़ातिमा मेमोरियल ट्रस्ट का क़याम और उसकी निगरानी, ये मसरूफि़यात उनको ज़्यादा से ज़्यादा मश्ग़ूल तो रखतीं लेकिन अदब के लिए वक़्त उनके पास बहुत कम बचता था। यही वजह है कि उनकी अदबी जि़न्दगी की यादगार, कहानियों का एक संग्रह, पी.एच.डी. का शोधग्रन्थ (प्रकाशित) और कुछ लेख और बच्चों के लिए कुछ तहरीरों से ज़्यादा नहीं। लेकिन जितना भी है, क़ीमती और याद रह जाने वाला है।
याद नहीं आता कि शमीम निकहत और शारिब रुदौल्वी से ज़ाती मरासिम9 कब शुरु हुए। शायद वह ज़माना रहा हो जब मैं देहली में काम कर रहा था, यानी सन 1985 के पहले की बात है और देहली में मेरी नौकरी का यह दूसरा और ज़्यादा लम्बा दौर था। यूँ तो मेरे सम्बन्ध अदीबों और अदब के उस्तादों से हमेशा रहे हैं और ईश्वर की कृपा से हमेशा शिगुफ़्ता10 और दोस्ताना रहे हैं, लेकिन उनके घर पर जाने और घरेलू तजऱ् के मिलने-मिलाने का सिलसिला सबके साथ नहीं था। शारिब और शमीम उन चन्द मियाँ बीवी में थे जिनसे मैं और जमीला घरेलू ताल्लुक़ात के अंदाज़ में मिलते थे। शमीम निकहत उन दिनों दिल्ली यूनिवर्सिटी में थीं, शारिब जे.एन.यू. में। किताबी या पढ़ने-पढ़ाने की सतह पर हम में कोई बात साझा नहीं थी। फिर यह भी कि शारिब रुदौल्वी तरक़्क़ी पसन्द थे और उर्दू तनक़ीद पर उनकी मशहूर किताब मेरी नज़र से गुज़री थी और मुझे उस किताब में इख़्ितलाफ़ के कई पहलू भी नज़र आये थे। इसके बावजूद हम लोगों में आपसी सतह पर कभी कोई इख़्ितलाफ़ नहीं हुआ। आपसी इख़्ितलाफ़11 क्या, अदबी एतिबार से इख़्ितलाफ़ राय के भी मौक़े नहीं आये। मीर से दिलचस्पी हम दोनों को थी और मुम्किन है इस वजह से हमारी दोस्ती और मज़्बूत हो गयी हो।
शमीम निकहत और शारिब रुदौल्वी के बारे में ‘मन तो शुदम, तो मन शुदी12’ वाला रिवायती मिसरा तो बेशक पढ़ा जा सकता है। लेकिन बात अगर समाजी ताल्लुक़ात और मेहमान नवाज़ी और ख़ुल्क़13 व इंकिसार14 की हो, तो यह फ़कऱ् वाक़ई मुश्किल हो जाता है कि इन ख़ूबियों में कौन बढ़कर था? दोनों को मैंने एक जैसी मुहब्बत करने वाला, छोटे-बड़े का लिहाज़ करने वाला, लेकिन इस लिहाज़ को तकल्लुफ़ या तसन्नो15 तक पहुँचने से महफ़ूज़ रखने वाला पाया।
देहली छूटी तो शारिब और निकहत से मिलना-मिलाना भी कम हो गया, लेकिन ताल्लुक़ात में गर्मजोशी वैसी ही बकऱ्रार रही। नौकरी से छुट्टी पाने के बाद से मैं इलाहाबाद में रह रहा हूँ। कभी शारिब से और कभी दोनों से मिलना जुलना हो जाता। कभी वे इलाहाबाद आते, कभी मैं लखनऊ जाता। वक़्त के बीतने और जगह की दूरी का हमारे ताल्लुक़ात पर कोई असर नहीं पड़ा। जब शमीम निकहत की सुनावनी16 सुनी तो लगा कोई मेरा क़रीबी अज़ीज़ रुख़्सत हो गया है।
मेरे भाई शारिब रुदौल्वी ने फ़ोन पर मुझे मरहूमा की वसीयत के बारे में बताया कि उन्होंने फि़क्शन पर सालाना व्याख्यानों का मंसूबा बनाया था और सालाना फि़क्शन एवार्ड की तज्वीज़17 भी उनके सामने थी लेकिन मौत ने उन्हें फ़ुर्सत नहीं दी। शारिब साहब चाहते थे कि शमीम की वसीयत पर अमल किया जाये, एक सालाना व्याख्यान का आयोजन हो जो फि़क्शन से वाबस्ता किसी विषय पर और एक सालाना फि़क्शन एवार्ड भी दिया जाये। मैंने इन दोनों सुझावों पर साद18 किया। फिर शारिब साहब ने हुक्म दिया कि सिलसिला-ए-व्याख्यान का पहल व्याख्यान मैं ही हाजि़र कर सकूँ। शारिब और शमीम से दिली इरादत और मुहब्बत की बिना पर राज़ी हो गया, हालाँकि, उस वक़्त मैं सेहत और फ़ुर्सत दोनों की कमी का मारा हुआ था। यह इन मरहूमा की रूहानी करामात ही समझिए कि मैं इस फ़र्माइश को पूरा कर सका हूँ।
मैं लम्बे समय से फि़क्शन का पाठक रहा हूँ। मुख़्तलिफ़ ज़बानों में मुख़्तलिफ़ तरह का फि़क्शन बहुत तादाद में पढ़ डालने के बावजूद यह सवाल मुझे हमेशा परेशान करता रहता है कि वह क्या ख़ूबी है जो किसी तहरीर को फि़क्शन बनाती है? (यहाँ फि़क्शन से मेरी अव्वलीन मुराद नाॅविल और अफ़साना हैं। लेकिन यह सवाल दूसरी तरह के बयानों मसलन दास्तान, कि़स्सा, बच्चों के लिए बनायी हुई कहानियाँ वग़ैरह के भी बारे में पूछा जा सकता है।)
ज़ाहिर है कि पहला जवाब तो यही है कि फि़क्शन की बिना हक़ीक़त पर नहीं होती। हक़ीक़त से मेरी मुराद वे वाकि़ए हैं जो वाक़ई और यक़ीनी तौर पर पेश आ चुके हैं। फि़क्शन को हक़ीक़त पर आध्ाारित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें जो वाकि़ए बयान होते हैं उनके बारे में लेखक का दावा यह नहीं होता कि वो हक़ीक़ी दुनिया में पेश आ चुके हैं, और न ही फि़क्शन पढ़ने वाला ही ऐसा समझता है कि जो कुछ मैं किसी फि़क्शन में पढ़ूँगा, वह सब का सब सच होगा, यानी उसमें जो कुछ बयान किया जाएगा, वह वाक़ई और हक़ीक़ी तौर पर पेश आ चुका होगा।
लिहाज़ा फि़क्शन की पहली तारीफ़ यह हुई कि वह ‘झूठ’ होता है, या सरासर झूठ नहीं तो झूठ पर टिका हुआ ज़रूर होता है। यही वजह है कि कुछ तहज़ीबों में यह मसला उठाया गया है कि अगर फि़क्शन झूठ है, या झूठा है, तो इसका बयान करने वाला झूठ बोल रहा है। यानी वह एक ख़ासे संगीन अख़्लाक़ी गुनाह का दोषी है। इन तहज़ीबों में यह सवाल भी उठाया गया है कि अगर ऐसा है तो फि़क्शन निगारी को अख़्लाक़ी19 जुर्म क़रार दिया जाना चाहिये और तहज़ीब से फि़क्शन को बिल्कुल ख़त्म कर देना चाहिये। और अगर ऐसा मुम्किन नहीं हो तो कम से कम अब से फि़क्शन लिखने और फि़क्शन पढ़ने पर पाबन्दी आयद होनी चाहिये।
लेकिन इस मामले में बहुत-सी उलझने हैं। हक़ीक़त या सच्चाई की कि़स्म और उसके इल्मियाती20 वजूद पर जो बहसें हैं उन्हें तो अलग रखिए, लेकिन यह सवाल फिर भी बाक़ी रहता है कि ‘हक़ीक़त पर आध्ाारित होना’ से क्या मुराद है? यह तो ज़ाहिर है कि कोई भी फि़क्शन, चाहे वह कितना ही हक़ीक़त पर टिका हुआ क्यों न हो, उसमें सारे का सारा तो ‘हक़ीक़ी’ नहीं हो सकता। मसलन और कुछ नहीं तो एक हक़ीक़ी वाकि़या यूँ है कि दो शख़्सों के बीच बातचीत हुई थी और कोई तीसरा मौजूद नहीं था। अब अगर फि़क्शन निगार इस बातचीत को अपने फि़क्शन में दर्ज करता है वह कैसे दावा कर सकता है कि यह बातचीत ‘हक़ीक़त’ पर आध्ाारित है? और अगर इस बातचीत को बयान करने वाला इन दोनों में से एक शख़्स है जो बातचीत में शरीक थे, तो यह किस तरह साबित हो सकता है कि ख़ुद वह शख़्स झूठ नहीं बोल रहा है और बातचीत के अल्फ़ाज़ को ठीक उस तरह बयान कर रहा है, जिस तरह वे अल्फ़ाज़ अदा किये गये थे?
एक दूसरी मिसाल ऐसे फि़क्शन की है (याने अफ़साने और नाॅविल) जिसके बारे में लेखक दावा करता है कि यह सच्चा वाकि़आ है। तो फिर ऐसी तहरीर को फि़क्शन कहने का औचित्य क्या है? ज़ाहिर है कि कोई औचित्य नहीं। या अगर है तो फिर हमें फि़क्शन की इस तारीफ़ से दस्तबर्दार21 होना पड़ेगा जो हमने ऊपर बयान की थी। अंदलीब शादानी ने ‘सच्ची कहानियाँ’ के नाम से एक सिलसिला शुरु किया था जिनके बारे में उनका बयान था कि जो वाकि़आत उनमें बयान हुए हैं, वे बिल्कुल सच्चे हैं। और उनको बयान करने वाला अक्सर वाहिद मुतकल्लिम के सीग़े22 में होता था और हर बार पूरे यकीन से यह कहा जाता था कि ये अफ़साने नहीं, सच्चे वाकि़आत हैं। लेकिन न तो लेखक@बयान करने वाले और न पढ़ने वालों ने तहरीरों को अफ़साना मानने से इंकार किया।
ख़याल रहे कि मैं तारीख़ी फि़क्शन को अपनी बहस से ख़ारिज रख रहा हूँ क्योंकि तारीख़ी फि़क्शन ज़्यादातर उन्हीं वाकि़आत पर आध्ाारित, या उन वाकि़आत के बारे में होता है जो पेश आ चुके हैं। फि़क्शन निगार इसमें अपनी तरफ़ से नमक-मिर्च लगा कर अपने फि़क्शन, बल्कि कभी-कभी इसके कथानक को भी अपने तौर पर बयान करता है और यह दावा नहीं करता कि मैंने वाकि़आत को किसी कि़स्म की मिलावट के बग़ैर लिखा है। लिहाज़ा तारीख़ी फि़क्शन भी एक तरह का फि़क्शन, यानी झूठ ही होता है। लेकिन यह बात अपनी जगह पर क़ायम रहती है कि कोई फि़क्शन सौ फ़ीसदी उन्हीं बातों को नहीं बयान कर सकता जो हो चुकी हैं और जिनके लिए आज़ाद और ग़ैर-मुतअस्सिब23 गवाह मौजूद हैं।
लेकिन यह बात भी सच है कि फि़क्शन झूठ हो या सच, या दोनों की मिलावट, लेकिन इसमें कोई चीज़ ऐसी है जिसकी बिना पर यह पढ़ा जाता है (अब चाहे कम सुना जाता हो, लेकिन फि़क्शन का सुनना और सुनाना ग़ायब नहीं हुआ है), और लोगों को मुतासिर24 करता है।
इसका एक जवाब यह हो सकता है कि झूठ इंसानी फि़तरत में दाखि़ल है, लिहाज़ा फि़क्शन हमारी फि़तरत के ऐन मुताबिक़ है। यह जवाब देखने में तो ग़ैर-संजीदा है, लेकिन इसके पीछे एक बहुत बड़ी हक़ीक़त है जिसकी तरफ़ हज़ारों बरस पहले अरस्तू ने इशारा किया था। अरस्तू का कहना है कि जब हम किसी शख़्स की तस्वीर देखते हैं तो हमें लुत्फ़ आता है और हम कहते हैं कि वाह! अच्छा, ये फ़लाँ शख़्स की तस्वीर है! तस्वीर तो ज़ाहिर है कि झूठ है, यानी वह बहुत ख़ूबसूरत, या कितनी ही बोलती हुई तस्वीर क्यों न हो, वह है महज़ तस्वीर, असल शख़्स नहीं है, यानी झूठ है। हम इस बात को ख़ूब जानते हैं, लेकिन फिर भी तस्वीर हमारे लिए लुत्फ़ का सामान मुहैया करता है। मालूम हुआ कि हमारी फि़तरत कजि़बपसन्द25 है।
लेकिन मामला फिर भी हल नहीं हुआः वह क्या चीज़ है जो किसी तहरीर को फि़क्शन बनाती है? ज़ाहिर है कि अगर हम फि़क्शन को झूठ ही क़रार दे लें, और यह भी दावा कर डालें कि इंसान झूठ को पसन्द करता है, तो भी यह तो मानना ही होगा कि फि़क्शन किसी ख़ास कि़स्म का झूठ होता है और वही इसे ग़ैर-फि़क्शन झूठ से छाँट कर अलग करता है। तो वह ख़ास बात क्या है जो किसी मत्न26 को फि़क्शन बनाती है?
हमारे ज़माने में फि़क्शन के एक अहम नज़रियासाज़ जेराल्ड पिं्रस का कहना है कि हम जिबिल्ली और फि़त्री27 तौर पर फि़क्शन और ग़ैर-फि़क्शन में फ़कऱ् कर लेते हैं। कोई तहरीर हमारे सामने लाइये, हम फ़ौरन और ख़ुद-ब-ख़ुद साफ़ तौर पर पहचान लेंगे कि यह फि़क्शन है, या नहीं है। ध्यान रहे कि पिं्रस ने यह बात कहानी के बारे में कही थी। लेकिन कहानी कोई अलग चीज़ नहीं है, वह भी फि़क्शन है और हम यह भी कह सकते है कि वह तमाम फि़क्शन की बुनियाद है।
इस जवाब में सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि इसकी निर्भरता तहज़ीबी मूल्य पर है जो बहरहाल इज़ाफ़ी और मक़ामी हैं और इसी वजह से इसे सहज बोध्ा पर आध्ाारित नहीं कह सकते। हो सकता है जो चीज़ मग़रिबी तहज़ीब में जिबिल्ली28 तौर पर पहचानी जा सकती हो कि यह फि़क्शन है, वह किसी और तहज़ीब के लिए जिबिल्ली और साफ़ तौर पर फि़क्शन न महसूस हो। चलिए, हम फ़जऱ् कर लें कि पिं्रस की तारीफ़ विज्दानी अक़्ल के खि़लाफ़ नहीं है, बल्कि माफि़क़ है। फिर भी सवाल बाक़ी रहता है कि हम क्यों और किस तरीक़े या क़रीने से किसी मत्न के बारे में साफ़ और जिब्बिली तौर पर फ़ैसला कर देते हैं कि यह फि़क्शन है?
हम कह सकते हैं कि फि़क्शन और कुछ नहीं है, वाकि़आत का बयान है। यानी यहाँ ज़ोर वाकि़ए पर है, जिसे अरस्तू ने ‘एक्शन’ कहा था। फि़क्शन में कुछ हो रहा होता है, चाहे उसे तर्तीब ज़मानी के लिहाज़ से बयान नहीं किया गया हो। फिर तारीख़, जीवनी, आपबीती, डायरी, वग़ैरह को फि़क्शन से अलग या मुख़्तलिफ़ कैसे क़रार दे सकते हैं। किसी तारीख़ी मत्न में वाकि़आत का तजुर्बा, उनकी बिना पर उसूल साज़ी, और वाकि़आत से नतीजे बरामद करने की कोशिश, यह सब कुछ हो सकता है, लेकिन फिर भी तारीख़ को ज़रूरत है कि वह इन वाकि़आत को दुरुस्ती और बारीक बीनी से बयान करे जिनसे उसका बयानिया इबारत है। यानी तारीख़, ‘सच’ होती है। ऐसी सूरत में उसे फि़क्शन का नाम देना देखने में मुश्किल मालूम होता है। लेकिन इसके सामने, लुकाच का दावा था कि माज़ी की कथन और सच्ची तस्वीरकशी सिफऱ् तारीख़ी नाॅविल ही में मुम्किन है। लेकिन वह इस बात को साफ़ नहीं करता कि यह कथन और सच्ची तस्वीरकशी मसलन जीवनी या आपबीती के ज़रिये मुम्किन क्यों नहीं है? अरस्तू बहुत पहले यह बात हमें बता चुका था कि किसी वाकि़ए को कितनी ही दुरुस्ती के साथ क्यों न बयान किया जाए, लेकिन नाजि़र29 या मुशाहिद29 का नज़रिया और नुक़्तए नज़र बहरहाल हर बयानिये को मुतासिर करता और उसकी ‘दुरुस्ती’ को संदिग्ध्ा बनाकर देता है। ऐसी सूरत में तारीख़ी नाॅविल, या किसी भी फि़क्शन के बारे में पूरे सच होने का दावा धोखा ही रहेगा।
मुझे हमेशा ऐसा लगता रहा है कि अफ़साना और नाॅविल के जदीद नक़्क़ादों ने नये बयानियों के सियाक़-ओ-सबाक़30 में जो दावे फि़क्शन की ‘सच्चाई’ और उसके ‘हक़ीक़त’ का सूरतकश होने के बारे में किये हैं वे मुबाल्ग़ा आमेज़31 हैं। ‘पूरा सच’ से कम कोई चीज़ हमारे आलोचकों को मुत्मईन करने में कामयाब नहीं होती। वे फि़क्शन से ‘पूरा सच’ माँगते हैं और कुछ फि़क्शन निगारों के यहाँ वे, ‘पूरा सच’ देख भी सकते हैं। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि अफ़लातून से फ़ैज़या़ता32 अदबी तहज़ीब में शायरी के बारे में ऐसे कोई दावे नहीं किये गये थे, और किए जा सकते भी नहीं थे। फि़क्शन को शायरी से ऊँचा साबित करने का एक ज़रिया यह था कि हालाँकि शायरी पूरा सच नहीं पेश कर सकती लेकिन फि़क्शन यह काम कर सकता है। बहुत से नक़्क़ादों का ख़याल था कि ‘हक़ीक़त’ और ‘वाकि़आत’ या ‘हक़ीक़त निगारी’ एक ही चीज़ हैं और वाकि़आत की जि़द ऐनियत33 है।
हक़ीक़त निगारी के तसव्वुर की बुनियाद इस वहम पर थी कि मारूज़ी हक़ीक़त या मारूज़ी हक़ीक़तें कहीं मौजूद हैं, चाहे वे पूरी तरह हमारे सामने न हों। और उन मारूज़ी हक़ीक़तों को ईमानदारी और सच्चाई के साथ पेश किया जा सकता है, या उनकी नुमाइन्दगी या नक़्ल हो सकती है। और मारूज़ी हक़ीक़तों को फि़क्शन निगार की कल्पना में तोड़ा, टुकड़े-टुकड़े किया जा सकता है, ताकि उन्हें क़ागज़ पर अंकित किया जा सके। लुकाच जैसा हक़ीक़तपरस्त भी कहता था कि फि़क्शन हमेशा इस ख़तरे में है कि वह फिसल कर ‘तग़ज़्ज़ल या ड्रामा’ की हदों में दाखि़ल हो जाए और इस तरह हक़ीक़त को तंग और महदूम34 करते हुए अपनी सतह से नीचे गिरकर महज़ तफ़रीही अदब की सतह पर आ जाए। लुकाच के ख़याल में इस ख़तरे के खि़लाफ़ प्रतिरोध्ा के लिए ज़रूरी है कि नाॅविल निगार शुऊरी35 तौर पर, और लगातार, दुनिया की शिकस्त-ओ-रेख़्तपिज़ीर36 और नामुक्कमल हक़ीक़त को असल हक़ीक़त समझे और इन सब बातों को भी सामने मौजूद रखे जो ‘बाहर की तरफ़ राह दिखाती और दुनिया की हदों से बाहर ले जाती हैं’। उसके अल्फ़ाज़ मेंः
ज्ीम कंदहमत बंद इम तमेपेजमक वदसल इल चवेपजपदह जीम तिंहपसम ंदक पदबवउचसमजम दंजनतम व िजीम ूवतसक ें नसजपउंजम तमंसपजल इल तमबवहदप्रपदहए बवदेबपवनेसल ंदक बवदेपेजमदजसलए मअमतलजीपदह जींज चवपदजे वनजेपकम ंदक इमलवदक जीम बवदपिदमे व िजीम ूवतसकण्
फि़क्शन की वाकि़आत और हक़ीक़त के बारे में इससे बड़ा दावा नहीं किया जा सकता। लेकिन हम यह भी देख सकते हैं कि हमारी ‘शिकस्त-ओ-रेख़्तपिज़ीर दुनिया’ की अक्कासी37 (पूरी या अधूरी) मुम्किन ही नहीं है, और इस वक़्त तो बिल्कुल मुम्किन नहीं है जब फि़क्शन निगार उन बातों को नज़र अंदाज़ कर दे जो ‘दुनिया की हदों से बाहर ले जाती हैं।
वाकि़आतपरस्तों के बर खि़लाफ़, मुझे तो यह नज़र आता है कि रोब्ब ग्रीयेँ जैसे कट्टर हक़ीक़तनिगार भी इस बात पर क़ादिर38 नहीं हैं कि वे किसी भी सूरते हाल की मुकम्मल हक़ीक़त को गिरफ़्त में ला सकें। वे हद से बस इतना कर सकते हैं कि किसी सूरते हाल, या हक़ीक़त का बयान किसी नुक़्तए नज़र से कर सकें। यानी तमाम मुम्किन नुक़्तहा-ए-नज़र को गिरफ़्त में लाना रोब ग्रीये जैसों के भी बस का नहीं। रोब्ब ग्रीयेँ इस बात का मुन्किर39 है कि फि़क्शन के लिए मुम्किन है, या फि़क्शन को चाहिए कि वह ऐसी काएनात को जन्म दे जिसमें मानी40 ज़ाहिर होते हैं, या कोई ऐसी काएनात बनाए जिससे मानी हासिल हो सकें (क्योंकि आखि़री दर्जे में मानी ही हक़ीक़त है)। रोब्ब ग्रीयेँ का तक़ाज़ा था कि फि़क्शन को चाहिए कि वह ऐसी दुनिया को पैदा करे जो ‘ठोस और फ़ौरी हो।’
मुझे रोब्ब ग्रीयेँ का दावा और तक़ाज़ा अच्छा लगा क्योंकि यह वाकि़आत के सतही नज़रिये पर चोट करता है। लेकिन मैं यह भी सोचने पर मजबूर हूँ कि क्या कोई दुनिया मानी पिज़ीरी से ख़ाली हो भी सकती है? रोब्ब ग्रीयेँ के बहुत पहले वेन बूथ ने साफ़-साफ़ साबित कर दिया था कि इन्तिहाई मारूज़ी फि़क्शन के बयानियों, मसलन ़लोबे और बाल्ज़ाक जैसे बयानिया निगारों के यहाँ भी ‘नुक़्तए नज़र’ शामिल हो ही जाता है। अरस्तू की बयान की हुई हक़ीक़त का कोई रद्द अब तक नहीं हो सका है।
लेकिन ‘मानी पिज़ीरी की काएनात’ का तसव्वुर मुझे मानी के मसले की तरफ़ ज़रूर ले जाता है और मैं यह पूछने पर ख़ुद को मजबूर पाता हूँ कि क्या रोब्ब ग्रीयेँ ‘मानी पिज़ीरी की काएनात’ का इसलिए इन्कारी है कि वह फि़क्शन में किसी ख़ास मानी या नज़रिये की तलाश का मुन्किर है। लेकिन क्या रोब्ब ग्रीयेँ के ख़याल के खि़लाफ़ कहीं ऐसा तो नहीं कि वही मत्न फि़क्शन है जिसमें ‘मानी पिज़ीरी’ हो, यानी जिसमें हम कुछ मानी तलाश कर सकें और हासिल कर सकें?
बात तो बड़ी दिलकश है। लेकिन ऐसा तो नहीं कि मानी का वजूद सिफऱ् फि़क्शन में होता है। मानी तो हर जगह मौजूद है और हमारे फ़ल्सफ़े में सूरत और मानी का अन्तर इसी बिना पर था कि सूरत वह है जो सामने नज़र आती है और मानी वह चीज़ है जो सूरत की असल है। यानि वह चीज़ जो सूरत को सूरत बनाती है, वह मानी है। लिहाज़ा मानी को सिफऱ् फि़क्शन तक महदूद करना कोई फ़ायदेमन्द बात नहीं।
मान लीजिए हम कहें, नहीं साहब, फि़क्शन में एक ख़ास तरह के मानी होते हैं? लेकिन मुश्किल यह है कि यह दावा तो हर फ़न के टुकड़े, बल्कि हर मत्न के लिए किया जा सकता है और किया जाता रहा है। मानी के ऐवान में सब के लिए अलग-अलग घर हैं। अच्छा, अब मैं मानी को सिंफ़41-ए-सुख़न की बहस से जोड़ कर यह कहता हूँ कि फि़क्शन ऐसी सिंफ़-ए-सुख़न है जिसकी पहुँच में ऐसे और इस तरह के मानी हैं जिन तक और उस्नाफ़42 की पहुँच नहीं। इयन वाॅट का दावा था कि नाॅविल (फि़क्शन) की हक़ीक़त निगारी जि़न्दगी की महज़ तस्वीरकशी में नहीं, बल्कि इस तजऱ्-ओ-तौर में है, जिसको बर्रूए कार42 लाकर, हम हक़ीक़त निगारी करते हैं। लेकिन वाॅट ने भी तस्लीम किया कि इसकी यह तारीफ़ फ्ऱाँसीसी हक़ीक़त निगारी से कुछ बहुत मुख़्तलिफ़ नहीं (हम जानते हैं कि फ्ऱाँंसीसी हक़ीक़त निगारी का दौरे-दौराँ मुद्दत हुई ख़त्म हो चुका और अब कोई फि़क्शन निगार ख़ुद को फ्ऱाँसीसी हक़ीक़त निगारी से जुड़ा हुआ तो कहाँ, मुतासिर भी नहीं बता पाता)।
इस एतिराज़ को रद्द करने के लिए वाॅट साहब यह फ़रमाते हैं कि जदीद फ़ल्सफि़याना हक़ीक़त निगारी दरअस्ल फ़ल्सफ़े की हक़ीक़तपरस्त तहरीक पर टिकी है और जदीद फि़क्शन ‘नुक्ताचीन, मोतिरज़ाना43, रिवायती बातों का मुख़ालिफ़ और तग़य्युर अंगेज़44 है। लेकिन बात क्या बनी? अगर हम इस बयान को फि़क्शन की मौजूदा सूरते हाल के बारे में एक बयान यानी स्टेटमेंट के तौर पर क़ुबूल भी कर लें तो हमारा सवाल वहीं का वहीं रहता हैः वह क्या चीज़ जो किसी तहरीर या मत्न को फि़क्शन बनाती है?
प्रेमचन्द को एहसास था कि फि़क्शन के नये और समकालीन तक़ाज़े क्या हैं। वे अपने हर अफ़साने में कोई फ़ल्सफि़याना या नफ्सियाती नुक्ता ज़रूर रखते थे (कम से कम ख़ुद उनका बयान यही था)। उनका क़ौल था कि कोई वाकि़या उस वक़्त तक अफ़साना नहीं कहा जा सकता जब तक वह किसी नफ्सियाती हक़ीक़त को पेश नहीं करे। वे ख़ुद दास्तान की रिवायत के एक हद तक परवर्दा45 थे, लेकिन उन्होंने दास्तान को ‘फि़क्शन’ (उनकी ज़बान में अफ़साना) का दर्जा देने से इन्कार किया। लेकिन इसका मतलब यह हुआ कि उनकी नज़र में (और एक हद तक उनके बाद वाॅट की नज़र में) दास्तान, कहानी, कि़स्सा, जानवरों की कहानियाँ वग़ैरह, ये सब ‘अफ़साना’ नहीं थे। लेकिन इसका मतलब यह है कि हम दुनिया के तख़्लीक़ी अदब के बड़े हिस्से को फि़क्शन या कहानी के दायरे से ख़ारिज कर रहे हैं। इस ज़माने में तो यह बात शायद किसी को क़ुबूल न हो।
दरअस्ल वह प्रेमचन्द हों या वाॅट, दोनों अपने भोलेपन के शिकार हैं। वे इस बात को नज़रअंदाज़ कर गये हैं कि ‘नुक्ताचीन’ मोतिरज़ाना, रिवायती बातों का मुख़ालिफ़ और ‘तग़य्युर अंगेज़’ होना इतने अनिश्चित और फिसलवाँ दावे हैं जितनी कि ‘ऩिसयाती हक़ीक़त’ और फ़ल्सफि़याना हक़ीक़त’ जैसी पारिभाषिक शब्दावली व ज़रा सा ग़ौर और फि़क्र इस बात को बिल्कुल साफ़ कर देगा। और यह बात तो है ही कि ऊपर बतायी गयी कोई इस्तलाह या नुक्ता ऐसा नहीं जो अदब की मुख़्तलिफ़ उस्नाफ़ के लिए काम में न लाया जा सके। वाॅट हों या प्रेमचन्द, वे यह बात भूल जाते हैं कि हर बयानिया अपनी सतह पर मानीख़ेज़ होता है। ज़्वेतान टाडारोफ़ ने उम्दा बात कही है कि हर बयानिया कलाम है, सिफऱ् वाकि़आत का सिलसिला नहीं। हम जानते हैं कि मौजूदा सियाक़-ओ-सबाक़ में कलाम से मुराद वह उसूल या बयान या तसव्वुर है जो मुरत्तब होता है, मानीख़ेज़ होता है और हम को मुतासिर कर सकता है। लिहाज़ा ऐसा नहीं है कि कोई बयानिया महज़ बयानिया हो (जैसा कि जेराल्ड पिं्रस ने गुमान किया था), हर बयानिया (लिहाज़ा हर फि़क्शन) इस्तअराती और अपनी सतह के नीचे, या सतह पर ही, मानी रखता है।
हम देख सकते हैं कि फि़क्शन, या अफ़साने की तारीफ़ मुम्किन करने में हम अब तक कई तरह के दूरी, यानी ‘सक्र्युलर’ बयानों के मुर्तकिब हो चुके हैं। इसलिए आयें फिर से शुरु करें। एक मुद्दत हुई जब मैंने फि़क्शन के ‘अफ़सानापन’ की तारीफ़ यह की थी कि कोई वाकि़या उस वक़्त फि़क्शन या अफ़साना बन जाता है जब वह इंसानी सतह पर हमारी दिलचस्पी को उक्साता है। मसलन ये बयानिया मत्न मुलाहिज़ा होः
एक दरख़्त से पत्ता टूट कर गिरा और नीचे बहते हुए चश्मे में डूब गया।
यहाँ दो वाकि़आत बयान हुए हैं, लेकिन कोई वाकि़आ ऐसा नहीं जो हमारी इंसानी हैसियत में हमारे लिए दिलचस्प हो। या इनमें कोई ऐसी बात देखने में नहीं है जो हमारे इंसानी सरोकारों के लिए मानीख़ेज़ हो। लेकिन अगर हम ये फ़जऱ् करें कि ‘दरख़्त’ से मुराद ‘शजरे हयात46’ है, और दरख़्त के नीचे जो नदी बह रही है वह मौत है जो हर चीज़ को बहा ले जाती है और पत्ते का टूट कर गिरना पानी में ग़कऱ् हो जाना किसी जि़न्दगी के ख़त्म हो जाने के मानी रखता है, तो हमारी इंसानी होशमन्दी एक हद तक बेदार होती है, लेकिन उस हद तक नहीं कि हमें ज़ाती तौर पर दरख़्त, या गिरते हुए पत्ते से कोई हमदर्दी या उनके बारे में कुछ फि़क्र हो जाए, या हम ये सोच कर अफ़सोस में मुब्तला47 हों कि हमारे साथ भी ऐसा हो सकता है।
इन वाकि़आत में इस्तआराती क़ुव्वत तो है, लेकिन इंसानी सतह पर मुतासिर करने के लिए पूरी तरह बर्रूए कार नहीं। ऐसा उस वक़्त मुम्किन था जब मसलन दरख़्त, पत्ते और चश्मे में इंसानी या तम्सीली48 किरदारों की भी खूबियाँ का मुशाहदा49 मुम्किन होता।
अब एक और मिसाल लेते हैंः
अचानक बड़े ज़ोर का तूफ़ान उठा।
यह अपनी कि़स्म के एतिबार से बहुत पुरक़ुव्वत, लेकिन अकेला और नाइंसानी वाकि़या है। इसके बहुत से मानी हो सकते हैं, लेकिन इन मानी (या इस वाकि़ये) का कोई अंजाम हमें नहीं बताया गया। उसूली तौर पर यहाँ मानी की कसरत तो है, लेकिन ये मानी हमारे काम के नहीं। अगर कोई अंजाम होता तो शायद, हम इसकी मदद से इन वाकि़ए को मौक़ा देते कि वह हमारी होशमन्दी को मुतासिर करे। इस बात को यूँ भी कह सकते हैं जब हम कोई ज्यामितिक शक्ल मुसल्लस50 या मुरब्बा51, देखते हैं तो हमें यह तो पता चलता है कि फि़त्रत, या काएनात में ऐसी शक्लें होती हैं और उनके ज़रिये बहुत सी बातें साबित हो सकती हैं, वग़ैरह। लेकिन ये शक्लें हमें इंसान या इंसानी सूरते हाल के बारे में ठोस, इंसानी बात नहीं नहीं बताती।
अब फ़जऱ् कीजिए हमारा बयानिया नीचे दिया गया हैः
अचानक बड़े ज़ोर का तूफ़ान उठा और चिराग़ बुझ गया।
यहाँ ‘चिराग़’ ने फ़ौरन एक इंसानी सूरते हाल पैदा कर दिया है, क्योंकि चिराग़ इंसान ही बनाते और काम में लाते हैं। लेकिन अभी यहाँ कोई ऐसी बात नहीं है जो किसी ख़ास या आम इंसानी सूरते हाल को क़ायम करे, या उस तरफ़ इशारा करे। लफ़्ज़ ‘चिराग़’ बहुत सी तजरीदी और इस्तअराती बातों, या इम्कानात52 का हामिल ज़रूर है। और ये बातें हमें ज़हनी या अक़्ली तौर पर मुतासिर करती हैं, या बामानी मालूम होती हैं। लेकिन हम इन बातों में इंसान की सतह पर दाखि़ल नहीं होते, क्योंकि अभी तक हम किसी ऐसे वाकि़ए से दो-चार नहीं हुए हैं जिसमें कोई इंसानी पहलू हो। लेकिन अगर ये कहा जाताः
‘अचानक बड़े ज़ोर का तूफ़ान उठा और चिराग़ बुझ गया। ग़रीब तालिब-ए-इल्म ने मज्बूरन किताब बन्द कर दी और उसे एक तरफ़ रख दिया’।
अब बहुत सी बातें सामने आती हैं, या छुपी हुई हैं लेकिन हम उन्हें फ़ौरन देख सकते हैंः चिराग़ या तूफ़ान में कोई इस्तआराती मानी नहीं हैं, लेकिन इंसानी मानी हैं। कोई तालिब-ए-इल्म है। वह इतना ग़रीब है कि बिजली तो क्या, लालटेन भी उसकी क्षमता के बाहर है। जहाँ वह रहता है, वह जगह भी बहुत तरक़्क़ीयाफ़्ता53 नहीं है। वहाँ सड़क पर मिट्टी के तेल के चिराग़ वाले खम्बे होते हैं, बिजली के खम्बे नहीं। तालिब-ए-इल्म इसी चिराग़ की रौशनी में अपना सबक़ याद करता है या इम्तिहान की तैयारी करता है। तूफ़ान ने सड़क का चिराग़ बुझा दिया तो तालिब-ए-इल्म का पढ़ना बन्द हो गया।
मेरे बनाये हुए बयानिये का यह रूप पिछले दो बयानियों से अलग है। इसमें अल्फ़ाज़ ज़्यादा हैं, मानी के इम्कानात कम हैं। लेकिन मानी के इम्कानात की कमी को इंसानी सरोकारों के वुफ़ूर54 ने हमारे लिए ज़्यादा मानीख़ेज़ बना दिया है। यहाँ मुझे ग़ालिब याद आते हैंः
हुजूमे सादालौही पंबा-ए-गोश हरीफ़ाँ है,
वगर्ना ख़्वाब में मुज़्िमर हैं अफ़साने की ताबीरें
ग़ालिब देखने में फि़क्शन की तनक़ीद की एकबारीकी बयान कर रहे हैं, ऐसी बारीकी जो मेरी इस वक्त की दलील के लिए मुफ़ीद मतलब है। ऊपर मैंने कहा था कि फि़क्शन में मानी की कसरत से ज़्यादा अहमियत इंसानी सरोकारों की है। ग़ालिब इससे बढ़कर यह कहते हुए नज़र आते हैं कि हालाँकि अफ़साने (या किसी भी फि़क्शन) को ताबीर की ज़रूरत है, लेकिन लोग यह नहीं जानते कि हम जो ख़्वाब देखते हैं उन्हीं में हमारे अफ़साने के मानी मौजूद हैं। ख़्वाब क्या हैं? तख़य्युल का करिश्मा है। इसलिए तख़य्युल को काम में लाएँ तो हम देखेंगे कि जो भी अफ़साने किसी ने (वह कोई शख़्स हो या और कोई हस्ती) गढ़े हैं, वे दरअस्ल हमारे ख़्वाब हैं, यानी तख़य्यीली हक़ीक़तें हैं। दूसरे शब्दों में, फि़क्शन की व्याख्या इसकी सतह पर नहीं होती, कहीं दूर गहराई में होती है। मेरा कहना यह है कि गहराई की यह सतह इंसानी सरोकारों और इंसानी दिलचस्पियों की सतह है। फि़क्शन को हम तब ही समझ सकेंगे जब फि़क्शन हमें बतौर इंसान अपनी गिरफ़्त में लेता है।
हम जानते हैं कि नैयर मसूद ने अपने सारे अफ़साने नहीं तो ज़्यादा-से-ज़्यादा तादाद में अफ़साने ख़्वाब में देखे हैं, यानी पहले तो अफ़साने को ख़्वाब में साकार होते हुए देखा और फिर उसे हाफि़ज़े की तहवील से बाहर निकालकर क़ाग़ज़ पर उतारा। मानो अफ़साना (उसकी कही हुई शक्ल) और ताबीर (उसकी ख़याली शक्ल) एक साथ ही वजूद में आये। मेरा ख़याल है इस बात में हमारे लिए कुछ दृश्य छुपे हुए हैं। मैं अपने बारे में कह सकता हूँ कि मैंने अपनी कहानी ‘लाहौर का एक वाकि़या’ बड़ी हद तक ख़्वाब में देखी थी यानि ख़्वाब पूरा होने के पहले मेरी आँख खुल गयी थी। फिर मैंने पूरा अफ़साना लिखा और उसमें अपने ख़्वाब की ताबीर55 यह लिखी कि ‘सारे अफ़साने सच्चे होते हैं’। बिल्कुल इसी तरह, जिस तरह सारे ख़्वाब सच्चे होते हैं जब तक हम उन्हें आलम ख़्वाब(या आलम वाकि़ये) में देखते रहते हैं। यह कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं है कि हमारी ज़बान में वाकि़ए के एक मानी ‘ख़्वाब’ भी हैं।
मेरा कहना है कि फि़क्शन निगार हमसे तक़ाज़ा करता है, बल्कि हमें मजबूर करता है कि जो वाकि़आ वह बयान कर रहा है तुम उसे सच समझो, चाहे वह सच उन मानी में न हो, जिन मानी में कोई आँखों देखा हाल सच होता है, लेकिन मेरे फि़क्शन की सच्चाई तुम्हारे लिए फ़ौरी और हक़ीक़ी है, मानो तुम ख़्वाब देख रहे हो। फ़कऱ् यह है ख़्वाब से जागने पर शायद तुम ख़ुद समझा लो कि वह सब फर्जी और ग़ैर-हक़ीक़ी था, लेकिन जब तक ख़्वाब जारी है, मेरा फि़क्शन तुम्हारे शऊर और एहसास में जारी है। लेकिन ज़ाहिर है कि ऐसा फि़क्शन वही हो सकता है जो हमें इंसानी सतह पर उक्साए। और ऐसे फि़क्शन का पसन्दीदा या नापसन्दीदा होना इसकी फ़न्नी क़ुव्वत पर असर अंदाज नहीं हो सकता।
मिसाल के तौर पर मैं राजिन्दर सिंह बेदी को उर्दू के सबसे बड़े अफ़साना निगारों और आली तरीन दर्जे के अफ़साना निगारों में गिनता हूँ। लेकिन मुझे उनके वे अफ़साने सख़्त नापसन्द हैं जिनमें वह उस औरत को आदर्श क़रार देते हैं, देते नज़र आते हैं जो दुख उठाती है, ससुराल की सख़्ितयाँ सहती हैं, बच्चों पर बच्चे पैदा करती हैं और हर तरह शौहर की ग़ुलाम रहती है। इस हद तक ग़ुलाम कि वह शौहर की मार ही को उसकी मुहब्बत की दलील समझती है। मेरी मुराद ‘लाजवन्ती’, ‘गिर्हन’, ‘अपने दुख मुझे दे दो’ जैसे अफ़सानों ही से नहीं बल्कि ‘मिथुन’ और ‘बिब्बल’ जैसे अफ़सानों से भी है। मुझे ये अफ़साने नाक़ुबूले बर्दाश्त हद तक नापसन्द हैं। बेदी साहब इन अफ़सानों में उस औरत को आदर्श के रूप में पेश कर रहे हैं या उस औरत को ‘आइडियल ट्रुथ’ या ऐनी सच्चाई का नमूना पेश कर रहे हैं जो मज़्लूम और बेचारा ही नहीं, बल्कि वह अपनी मज़्लूमी और बेचारीगी को जि़न्दगी का आदर्श और औरत का फ़जऱ् क़रार देकर न सिफऱ् क़ुबूल करती है, बल्कि उसमें एक तरह का लुत्फ़ और फ़ख्र महसूस करती है।
यह सब दुरुस्त, लेकिन मैं ऊपर बयान किये गये अफ़सानों में से अक्सर को उर्दू फि़क्शन के शाहकारों में गिनता हूँ। यानी फ़न्नी एतिबार से इनमें से कई अफ़साने ख़ासकर ‘लाजवन्ती’ और ‘बब्बल’ इन्तिहाई बुलन्द अफ़साने हैं। लेकिन मैं उनसे नफ़रत भी करता हूँ क्योंकि इनमें औरतों का जो तसव्वुर पेश किया गया है वह अन्यायी मर्द के मूल्यों की तरफ झुका हुआ और शोषक है। तो फिर ऐसा क्यों हो सका है? इसलिए कि फि़क्शन में जो वाकि़आ बयान होता है हम उसे सच्चा क़रार देते हैं और उसे हमेशा के लिए मौजूद समझते हैं।
शायरी का मामला मुख़्तलिफ़ है। एक तो इसलिए कि हमारी शायरी में कोई बयान करने वाला नहीं होता। लिहाज़ा शायरी में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम बयान करने वाले@शायर के (शुऊरी या ग़ैर शुऊरी तौर पर अख़्ितयार किये हों) नज़रियात से मुफि़क़ हों या न हों।
तो इस मसले पर दोबारा ग़ौर करें कि कोई मत्न अफ़साना या फि़क्शन कब बनता है। मेरा ख़याल है यह बात एक हद तक साफ़ हो चुकी होगी कि फि़क्शन इंसानी सिंफ़ेसुख़न है, इंसान इसमें मर्कज़ी हैसियत रखता है। और इंसान हमेशा,‘अंजाम’ या आज की जबान में ‘क्लोजर’ चाहता है। वह चाहता है कि जो भी वाकि़आ हो, वह अपने फि़त्री अंजाम तक पहुँचे। और अगर हक़ीक़ी मानी में फि़त्री अंजाम मुम्किन नहीं हो तो फिर ऐसा अंजाम हो जो फि़त्री महसूस हो, कि अब इसके बाद कुछ बताने की ज़रूरत नहीं। अंजाम फि़त्री महसूस हो, और फि़क्शन हमारी इंसानी हैसियत को अंगेज़ करे, यह काफ़ी है। प्रेमचन्द और इयन वाॅट और लुकाच के ख़याल जो मैंने ऊपर नक़्ल किये, उनका सबसे बड़ा नुक़्सान यह है कि फि़क्शन लिखने और पढ़ने वाले, दोनों को फि़क्शन के ‘पैग़ाम’ और ‘मक़्सद’ से सरोकार ज़्यादा हो जाता है, ख़ुद फि़क्शन या कहानी से कम। मेरा कहना है कि फि़क्शन वाकि़आत की तर्तीब का नाम है, और तर्तीब इस तरह हो जिसमें इंसानी सरोकार नुमायाँ हों। फि़क्शन हमें सोचने की प्रेरणा देता है, यह हमारी तरफ़ से फ़ैसले नहीं करता, बल्कि हमारी हिम्मत अ़ज़ाई करता है, या यूँ कहें कि हमसे तक़ाज़ा करता है कि हम अपने फ़ैसले ख़ुद करें।
फि़क्शन में बयान किए हुए वाकि़आत हमारे लिए किसी भी सिलसिला-ए-वाकि़आत, किसी भी बयानिया की तरह होते हैं। हमें इस बात से फ़ौरी ग़जऱ् नहीं होती कि वे वाकि़आत हक़ीक़ी हैं, या ‘क़ुदरत के क़ानूनों’ के खि़लाफ़ हैं। फि़क्शन वह चीज़ है जिसे हम एक वक़्त में, हक़ीक़ी और ग़ैर-हक़ीक़ी समझकर बरतते हैं। हम जितनी क़ुव्वत से इस बात का शुऊर रखेंगे कि जो हो रहा है वह हक़ीक़ी नहीं है और है भी, हमारे लिए फि़क्शन का पढ़ना उतना ही कामयाब और इत्मीनान बख़्श होगी।
अब ज़रा इस बात को और बारीकी से देखें। अख़बारों में और टीवी पर हम आये दिन क़त्ल-ओ-ग़ारत, अग़वा, बच्चों के खि़लाफ़ ज़ालिमाना वारदातों के बारे में पढ़ते और सुनते रहते हैं। हमें ये ख़बरें बहुत तक्लीफ़ पहुँचाती हैं और मुजरिम के लिए हमारे दिल में घिन और नफ़रत पैदा करती हैं। लेकिन अहम बात यह है, हमने जो ख़बर सुनी वह पहले ही वाकि़अ हो चुकी है। अब वह माज़ी में है, हमारा कोई क़ाबू, कोई अख़्ितयार इस पर नहीं। जो हो गया है वह हो गया है, अब वह ख़ारिज नहीं हो सकता। यानी हम उसे ‘अनहुआ’ नहीं कर सकते। हमें घबराहट तशवीश, तजस्सुस और परेशानी नहीं होती। लेकिन जब हम ऐसे ही किसी वाकि़ए का हाल फि़क्शन में पढ़ते हैं तो हमारे दिल को धड़कनें तेज हो जाती हैं, साँसे न बराबर होने लगती हैं, ख़ौफ़ और तशवीश हमारे ऊपर हावी होने लगती है। या अल्लाह, अब क्या होगा? काश कि यह लड़की बुरे लोगों के धोखे या ज़ुल्म का शिकार न बन सके, काश ज़ालिम मुजरिमों के हाथों इसका अग़वाना हो, काश इस दूध पीते बच्चे की माँ उसे बिलखता छोड़ कर मौत का निवाला न बन जाये। काश के गाँव या मोहल्ले या शहर के लोगों पर ज़ुल्म-ओ-तारी का बाज़ार न गर्म हो पाये। वगैरह। जब हम फ़्लोबे का नाॅविल ‘मादाम बोवरी’ ख़त्म कर लेते हैं तो हम दिल में कहते हैं कि काश शायद किसी तरह, किसी भी तरह, मादाम बोवरी को ख़ुदकुशी करने से बचाया जा सकता। हमारे दिल में एक बेनाम-सा एहसासे जुर्म हमें शर्मिंदा करता है कि, हम मादाम बोवरी को, या एना कैरेनीना को ख़ुदकुशी करने से नहीं रोक सके। काश कि नाॅविल निगार (यानी मादाम बोवारी के लिए फ़्लाबे और एना के लिए टाॅलस्टाॅय) कोई ऐसा रास्ता निकाल लेते कि उन हीरोइनों का अंजाम ऐसा नहीं होता।
यह इसी वजह से तो है कि हम ख़ूब जानते हैं कि फि़क्शन में जो वाक़ई होता है, वह बस फि़क्शन है, उसकी अस्ल कुछ नहीं। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि जो हुआ है या हो रहा है, वह हमारे लिए हक़ीक़ी है। यही वजह है कि हम फि़क्शन का ख़ुलासा, हमेशा ज़माना-ए-हाल में बयान करते हैं। अख़बार या टीवी ने वह बता दिया जो हो चुका है, लेकिन फि़क्शन हमें बताता है कि हम जो आपको बता रहे हैं, वह आपके सामने हो रहा है। आप किसी ख़बर के पाठक या तमाशबीन नहीं, ख़ुद उस ख़बर का हिस्सा हैं। हम यह नहीं कहते कि एना एक दौलतमन्द ख़ानदान की कम उम्र लड़की थी और वह एक बड़े रईस को ब्याही गयी थी। वह रईस उम्र में उससे बड़ा था। हम कहते हैं ऐना एक दौलतमन्द खानदान की कम उम्र लड़की है और वह एक बड़े रईस को ब्याही है, वह रईस उम्र में उससे बड़ा है। यह सूरत-ए-हाल हमेशा से है और हमेशा रहेगी। हम, या हमारे बाद आने वाला कोई भी शख़्स जो इस नाॅविल को पढ़ेगा, यह सूरत-ए-हाल उसके लिए वैसी फ़ौरी और जि़न्दा होगी जैसी हमारे लिए है।
हम जानते हैं कि शार्ल बोवारी कुछ अहमक़सा, गँवार, कुरूप, और अपनी बीवी पर ग़ैर-ज़रूरी हद तक भरोसा करने वाला शख़्स है और उसकी बीवी बड़ी तरहदार है। शायद यही मुनासिब है कि मादाम बोवरी उसकी पीठ पीछे दूसरों से इश्क़ लड़ाए। लेकिन...लेकिन फिर भी काश ऐसा नहीं हुआ होता। फि़क्शन निगार ने जो ग़ैर-हक़ीक़ी लेकिन हक़ीक़ी जिं़दगी हमारे सामने पेश की, वह इम्कानात से परे है और हमेशा रहेगी। फि़क्शन निगार के लिए मुम्किन था कि वह दोनों हीरोइनों के लिए कुछ मुख़्तलिफ़ अंजाम अदा करता। यक़ीनन फि़क्शन निगार शिद्दत से इन्कार करेगा और कहेगा कि जो वाकि़आत मैंने बयान किये हैं और किरदारों को जिस तरह पेश किया है उसका तर्क यही था जो मैंने उस में अख़्ितयार की। लेकिन हम जानते हैं कि फि़क्शन निगार कुछ भी कहे, फि़क्शन अपनी जगह पर कुछ और भी कर सकता है। आखि़र क्या वजह है कि दोस्तोएव्स्की ने एक बार झुंझलाकर क़लम रख दिया कि मैं इस किरदार से बहुत नाराज हूँ। मैं उसे कुछ बनाना चाहता हूँ और यह कुछ ही बन बैठता है।
मारिओ वारगास लिओसा के नाॅविल ‘द बैड गर्ल’ को हम एक तरह से मादाम बोवरी की तजऱ् पर बनाया हुआ कह सकते हैं। यह बुरी लड़की जो कभी कोई नाम रख लेती है और कभी कोई और नाम, उसे दौलत और ताक़त से इश्क़ है और वह मादाम बोवरी से ज़्यादा नफ़ीस और सभ्य है। वह मादाम बोवारी से कहीं ज़्यादा बेवफ़ा और बेरहम कि़स्म की औरत है। अख़्लाकि़यात उसे छू भी नहीं गयी हैं। एमा बोवारी के मुल्की यानी प्रोविंशियल मिज़ाज के बर खि़लाफ़ इसका मिज़ाज बैनलअक़्वामी56 है। नाॅविल जैसे-जैसे आगे बढ़ता है हम उल्झन में पड़ते जाते हैंः आखि़र यह क्या हो रहा है? इसका अंजाम क्या और कहाँ होगा? हम जानते हैं कि इसका अंजाम अगर ख़राब और तकलीफ़देह होगा तो हमें अफ़सोस होगा, और यह अफ़सोस बुरी लड़की पर उतना नहीं होगा जितना ख़ुद अपने ऊपर होगा। ‘फैला है उस तरह का काहे को याँ ख़राबा’, हम मीर की ज़बान में पूछते हैं।
आखि़रकार वह बुरी लड़की अपने अव्वलीन वफ़ादार और साबिर57 आशिक़ के पास लौट जाती है। उसका हुस्न और सेहत दोनों तबाह हो चुके हैं। लेकिन उसका चोंचालपन और मिज़ाज की तेज़ी सब पहले ही जैसी हैं। मुश्किल से एक महीने के बाद वह मर जाती है। लेकिन हमें अब उस पर अफ़सोस नहीं होता, बल्कि उसके वफ़ादार आशिक़ पर होता है। उसे सारी जि़न्दगी नाकामी और मायूसी ही हाथ लगी है। और वह किसी अख़बार में ख़बर नहीं है, बल्कि इंसान है। हम जानते हैं कि फि़क्शन निगार वाकि़आत और किरदारों के साथ तरह-तरह की हेरा-फेरियाँ करता है ताकि फि़क्शन मन्तिक़ी अंजाम तक पहुँच सके। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि यह ख़ुद फि़क्शन है जो हमारे साथ हेरा-फेरी करता रहता है। और यही इसकी सच्चाइयों का सबसे बड़ा हिस्सा है। यह हेरा-फेरी ही तो है कि एक ही तरह की दो लड़कियाँ हैं, लेकिन वह एक ही तरह की नहीं भी हैं। इनका अंजाम एक ही तरह का होता है, लेकिन एक ही तरह का नहीं होता।
कुछ लोग कहते हैं कि ‘बाबू गोपीनाथ’ या ‘सौगन्धी’ जैसे अफ़साने मण्टो ही लिख सकते थे। यह बात ठीक भी है और ग़लत भी। ठीक इसलिए कि मण्टो का अफ़साना इंसान और इंसानों के बारे में होता था, तसव्वुरात और अक़ाइद के बारे में नहीं। लेकिन यह बात ग़लत इसलिए है कि कोई भी फि़क्शन निगार जो दुनिया की विविध्ाताओं को मद्दे नज़र रखता है उससे बाबू गोपीनाथ या सुगंधी जैसे लोग नज़र ही आ जाएँगे। और फि़क्शन की सच्चाई इसी बात में है कि फ़्लाबे और वारगास लिओसा जैसे मुख़्तलिफ़ अलाहिद और मुख़्तलिफ़ुलमिज़ाज फि़क्शन निगार एक ही तरह का किरदार बना सके।
टाडाराफ़ ने लिखा है कि हर फि़क्शन के लिए दो शख़्स लाज़मी होते हैंः फि़क्शन नवीस या बयान करने वाला, और फि़क्शन को हासिल करने वाला, यानी सुनने या पढ़ने वाला। वह कहता है कि हर फि़क्शन के लिए यह दो शरीक लाज़मी हैं। लेकिन यह बात दास्तान या ज़बानी बयानिया पर ज़्यादा सही साबित होती है, नाॅविल या अफ़साने पर कम। बाख़्त ने ठीक कहा है कि नाॅविल निगार से ज़्यादा कोई आदमी तन्हा नहीं, उसे कुछ नहीं मालूम कि मेरा बयानिया कौन पढ़ेगा, कब पढ़ेगा, किस जगह पढ़ेगा और मेरे पढ़ने वाले कितने लोग होंगे। इसके बर खि़लाफ़ ज़बानी बयानिया का हदफ़(यानी इसका सुनने वाला) बयान करने वाले के सामने होता है। यहाँ से दूसरा नुक्ता58 यह है कि ज़बानी बयान करने वाले को अपने सुनने वाले का पूरा लिहाज़ रखना होता है। और वह अपने बयानिया के साथ कोई हेर-फेर, कोई ऐसा सलूक नहीं कर सकता, उसका सुनने वाला जिससे मुत्तफि़क़59 न हो। वह न तो अपने बयानिया के साथ कोई हेरा-फेरी का सलूक कर सकता है और न ही उसका बयानिया अपने बयान करने वाले के साथ कोई हेरा-फेरी कर सकता है।
ज़बानी बयान में बयानिया और बयान करने वाला दोनों बराबर के शरीक होते हैं। लेकिन फि़क्शन (यानी नाॅविल और अफ़साना) एक हद तक अपने बयान करने वाले से आज़ाद होते हैं। दोस्तोएव्स्की की मिसाल मैं ऊपर नक़्ल कर चुका हूँ कि वह अपने एक किरदार से ख़फ़ा हो गया था क्योंकि उस किरदार ने कुछ अपनी ही जि़न्दगी हासिल कर ली थी। ऐसा भी हुआ कि किसी कहानी को ख़ुद लेखक ने, या किसी और ने दोबारा लिखा तो नया रूप पिछले रूप से थोड़ा-बहुत अलग निकला।
फि़क्शन निगारी हैसियत से मेरा अपना तजुर्बा भी यही है कि मैंने अपने किरदार या वाकि़ए को जैसा बनाना चाहता हूँ, हमेशा वैसा बनता नहीं है। मेरे सामने सुनने वाला भी नहीं है जिसके दबाव के तहत मैं किरदार और वाकि़ए को आज़ाद न होने दूँ। इस तरह कुछ मुतज़ाद60 सी सूरते हाल बनती है, कि मैं अपने फि़क्शन को जन्म देने वाला हूँ भी और नहीं भी हूँ। इसलिए मुझे इस बात पर कोई हैरत नहीं है कि फ़्लाबे ने कहा
‘मैं ऐसी किताब लिखना चाहता हूँ जो किसी शै61 के बारे में न हो, ऐसी किताब जो सिफऱ् उस्लूब62 की अंदरूनी क़ुव्वत के बलबूते पर क़ायम हो, जिस तरह हमारी ज़मीन किसी सहारे के बग़ैर हवा में ख़ुद को क़ायम रखती है। मैं ऐसी किताब लिखना चाहता हूँ जो किसी विषय पर न हो, या कम से कम ऐसा हो कि इसका मौज़ू दिखायी न दे... मेरा ख़याल है कि फि़क्शन का मुस्तक़्िबल इन्हीं राहों में है’।
जाहिर है कि जब कोई विषय ही न होगा, सिफऱ् तरीक़ा होगा, तो फिर फि़क्शन अपने बनाने वाले के साथ कोई गड़बड़, कोई हेरा-फेरी न कर सकेगा। लेकिन यह भी ज़ाहिर है कि फि़क्शन के ग़ैर-मरई63 दबाव से आज़ाद होने की कोशिश कभी कामयाब नहीं हो सकी। जेम्स जाॅयस और सैमुअल बैकेट और कुछ दूसरों ने बेइन्तिहा कोशिश कर ली, लेकिन फ़्लोबे की पेशीनगोई पूरी न हो सकी। फि़क्शन किसी न किसी तौर से अपने ख़ालिक़64 से आज़ाद ही रहा।
इस तरह फि़क्शन की सच्चाइयाँ कम से कम तीन हैंः एक तो यह कि हम यह ख़ूब जानते और अच्छी तरह बूझते हैं कि जो कुछ हम पढ़ रहे हैं यह महज फ़जऱ्ी है, लेकिन फिर भी हम उसके साथ मामला यूँ करते हैं कि यह फ़जऱ्ी नहीं, हक़ीक़ी है। जो कुछ हो रहा है हम उसके तमाशबीन ही नहीं, हम उसमें शरीक भी हैं। दूसरी सच्चाई यह है कि फि़क्शन में जो कुछ बयान होता है वह हमारे लिए माज़ी नहीं, बल्कि एक तरह का निरन्तर हाल है, क्योंकि हम जब भी फि़क्शन को पढ़ते हैं, पहली बार या बार-बार वह हमारे लिए ज़माना-ए-हाल ही में होता है। तीसरी सच्चाई यह है कि फि़क्शन निगार किसी न किसी मानी में अपनी अक़्ल और मंतिक़ी शुऊर का नहीं, बल्कि फि़क्शन की अन्दरूनी मन्तिक़ का पाबन्द होता है।

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