रतन थियाम की कविताएँ मणिपुरी से अनुवादः सकमचा एवं उदयन वाजपेयी
08-Jun-2019 10:30 PM 964     

ज़मीन में दबा व्यतीत

पता नहीं
बीती घटनाओं को तह कर
कहाँ रखा जाये ?
निर्जीव शरीर को ताबूत से ढँक देने के बाद भी
उसे कोई न कोई नाम देना ही होता है
ध्ाुँए में प्रेत की तरह भटकती है
मेरी बीत चुकी कहानी
रेंगती है जीवित छिपकली-सी
दिमाग में मेरे
मैं खिड़की खोलना चाहता हूँ
छुटकारा पाने
दिमाग में रेंगती बेचैनी से
बीता समय बासी खाने-सा है
पर परोसे जाने पर
बिल्कुल ताज़ा लगता है

लम्बी कहानी का संक्षिप्त आख्यान

पानी का खाली गिलास,
अध्ाजली सिगरेटों से भरा ऐश ट्रे,
छूटा हुआ चाय का प्याला,
कुछ एण्टीबायोटिस, कुछ दर्द-निवारक दवाएँ,
बदबूदार कमरा
कुछ पुरानी पुस्तकें,
कई दिनों की मैली चादर,
दीवार पर रुकी हुई घड़ी,
मकड़ी के जाले से ढँकी एक स्त्री की तस्वीर,
पिछले दिसम्बर में खुला कैलेण्डर
कोई देख रहा है
यह सब कोई देख रहा है
मोटे चश्मे से !



कमीज़

कमीज़ के भीतर एक शरीर
शरीर के सीने में
पीड़ा, असन्तोष और गन्दगी की कई परतें
कमीज़ की ज़ेब में मुझे-तुड़े
कागज़ पर अंकित कई नाम
फीके पड़ गये हैं
तब भी यह हमेशा साथ रही है
तार-तार हो गयी है
तब भी मैं यह कमीज़ पहन रहा हूँ
छेद हो चुके हैं जे़ब में
तब भी यह मेरा साथ नहीं छोड़ रही

 


न भूलने का वादा

बीते हुए क्षणों से मैंने कहा,
यदि हम इस राह पर फिर मिल गये
हम प्यार से एक-दूसरे को पुकारेंगे
उनसे प्रेमालाप के क्षणों में
मेरे पैरों में तेज़ी आ जाती है
आज जब मैं उनके आने का इन्तज़ार कर रहा हूँ
मेरे पैर ढीले पड़ रहे हैं

तुम न आओ

मैं सोचूँगा नहीं
कुछ पलों के लिए सोचूँगा नहीं
हम प्यार से एक-दूसरे को पुकारेंगे
मेरा मन उड़ गया है इस पल
उसे उड़ने दो
कुछ देर मैं आराम करना चाहता हूँ
‘सोच !
अब तू कभी वापस न आ
कभी न आ मेरे पास

अँध्ोरी राह

एक बजे रात खर्राटे लेते समय
मेरे खुले मुँह में एक
मच्छर घुस आया
मैं जब अनजान दीवार को तोड़कर देखता हूँ
मुझे मेरा शरीर निढाल चूजा महसूस होता है
जब मैं अनजान आँख में
अपनी आँखें डालता हूँ
एक लम्बी राह नज़र आती है
रात के अन्ध्ाकार में
मेरी यादों के साये गायब हो रहे हैं
वे कभी पाप-सी होती हैं
पुण्य-सी कभी
जो भी देखा, अन्ध्ो का देखना था
उजाला भी अन्ध्ाकार ही है
इस घने वन में
अब मैं कोई और राह ढूँढ नहीं पा रहा

इस दिमाग में

बिल से अचानक बाहर निकले साँप के फन की तरह
कुछ विचित्र विचार खुद को प्रस्तुत करते हैं
मानो मेरे मानस-संग्रहालय में
आईंस्टाइन के दिमाग का एक टुकड़ा संग्रहीत हो गया हो
बिछुड़ी हुई स्त्री को देखते ही
मेरी दिमाग में एक नया विचार उठ खड़ा हुआ
हमारे साथ बिताये पलों में एकबार फिर प्रेम साँसें ले रहा है
जैसे मेरे गले में जुही का पुष्प-हार आ गया हो
मेरे छोटे-से दिमाग में ब्रह्माण्ड-सा सोच पल रहा है
जिसमें पे्रम, घृणा, सहमति, असहमति के एहसासों की
खुशी में मैं गाता हूँ, नाचता हूँ, रोता हूँ
मेरे छोटे-से दिमाग में बाढ़-सी आ गयी है

अधर््ारात्रि

तुम हो चन्द्रमा
अधर््ारात्रि को मैं तुम्हें निहार रहा हूँ
ओ अध्ाखिली सुकुमारी !
तुम गले में नक्षत्रों का हार पहने स्वर्ग से उतर रही हो
लबालब चमकते सरोवर की सतह पर भँवरा हरे लिली की
पँखुडि़यों के बीच बन्द हो गया है
लिली की नाल को
अनसोयी मछली
हल्के से छूती है और
जल जाग उठता है

बीती बातें

मैंने शब्दों को दीवार पर पुराने कैलेण्डर की तरह
एक-एक करके चिपका दिया है
कभी वे देर रात ज़ोर-ज़ोर से चीखते हैं,
कभी हिचकियाँ ले-लेकर रोते हैं
कभी हँसते हैं देर रात
कभी वे देर रात प्रेम का गीत गाते हैं
मैं शब्दों को चिपकाता हूँ

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