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कैसे प्रकाशित हुई पथेर पांचाली सागरमय घोष अनुवाद: रामशंकर द्विवेदी
04-Sep-2018 07:17 PM 1440     

सागरमय घोष (1912-1999) ने उन्नीस सौ सैंतीस में अशोक कुमार सरकार के आग्रह पर देश-पत्रिका का कार्यभार सम्हाला। उन्होंने एक प्रतिज्ञा की थी कि मैं ‘देश’ पत्रिका में स्वयं कुछ नहीं लिखूँगा। फिर भी उनकी दो-तीन पुस्तकें निकली हैं जो अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के बाद आनन्द पब्लिशर्स से छपी है। उन्हीं में एक पुस्तक है ‘सम्पादक की बैठक में’। इस पुस्तक में अनेक तरह के संस्मरण दिये गये हैं। सागरदा गप-शप करने में उस्ताद थे। उनके पास खाली समय में कई साहित्यकार अड्डा जमाने आते थे। इन्हीं में ख्यात उपन्यासकार विमल मित्र भी थे। विमल मित्र के पास बांग्ला साहित्यकारों से जुड़े अनेक संस्मरण थे। यहाँ पर जो संस्मरण दिया जा रहा है वह इस बात पर आधारित है कि ऐसा कौन साहित्यकार है, जिसकी पहली पुस्तक ने छपकर बांग्ला साहित्य में हलचल मचा दी हो और उसे अजस्र ख्याति का अधिकारी बना दिया हो। यहाँ पर विभूतिभूषण बन्द्योपाध्याय से जुड़े उसी संस्मरण को पाठकों के लिये दिया जा रहा है- अनुवादक।
उस दिन बातचीत के प्रसंग में विमल मित्र ने कहा: ‘चाहे जो कहो, बांग्ला साहित्य में विभूतिभूषण बन्द्योपाध्याय के पहले उपन्यास ‘पथेर पांचाली’ लेकर जो आविर्भाव हुआ वह एक चिरस्मरणीय घटना है। उसी के साथ जिन्होंने उन्हें खोजा था, ‘विचित्रा’ सम्पादक उपेन्द्रनाथ गंगोपाध्याय उनके प्रति हम लोग चिरकृतज्ञ रहेंगे। भविष्य में बंगाल में उपेन्द्रनाथ की कोई रचना अगर स्मरणीय नहीं रहे, तो भी वे दो लेखकों के आविष्कर्ता के रूप में याद किये जाते रहेंगे।’
एक मानिक बन्द्योपाध्याय, दूसरे विभूतिभूषण बन्द्योपाध्याय। और इन्हीं विभूतिभूषण से उपेन्द्रनाथ की पहली भेंट बहुत ही कौतूहलपूर्ण है।
यह कहते हुए विमल बाबू रुक गये। यह उनका सदा का स्वभाव है। श्रोताओं में जब खूब उत्कण्ठा जाग गयी हो, तभी एकाएक रुक जाना। हमारी प्रतिक्रिया का आनन्द लेने के लिये ही शायद सुनने में प्रिय कहानी का सूत्रपात कर रुक जाना।
हम लोग सभी अरे-अरे करते हुए कहने लगे, ‘अरे रुक क्यों गये। पूरी घटना बताइए ना!’
कोई उत्तर नहीं। निर्विकार चित्र से धीरे-धीरे जेब से सुँघनी की डिबिया निकालकर, बड़ी जल्दी उसका ढक्कन खोला गया। दो उँगलियों की चुटकी से सुँघनी निकालकर उसका ढक्कन बन्द कर कहने लगे- ‘चाय कहाँ हैं ?’
मैंने कहा, ‘उस सम्बन्ध में आपको कहना नहीं पड़ेगा।’ जेब से सुँघनी की डिबिया निकालते देखते ही मेरा बैरा अमर केतली लेकर दौड़ कर चाय लेने चला गया था। इतने दिन से आप लोग बैठक में अड्डा दे रहे हैं, आप लोगों को उसे पहचानने में क्या कुछ बाकी रहा है ?’
चाय आ गयी थी। टेबिल पर रखे कप पर थोड़ा झुककर चुस्की लेते हुए तृप्ति की एक आवाज़ आयी। चाय के कप में दूसरी बार चुस्की लेकर विमल बाबू ने कहा कि तो फिर कहानी शरू की जाए।
कहानी शुरू हो गयी।
‘बंगालीटोला तो आप जानते ही हैं ? भागलपुर का बंगाली टोला ? उसी बंगालीटोला में गांगुली लोगों का था विख्यात समृद्धिशाली परिवार। शरतचन्द्र के मामा लोगों का घर। शरतचन्द्र का शैशव और कैशोर्य बीता था उसी ममाने वाले घर में। हमारे उपेन दा उसी गांगुली परिवार के बेटे थे। कलकत्ता से कानून पासकर उपेन दा आ गये भागलपुर वकालत करने के उद्देश्य से। किन्तु, कलकत्ते में पढ़ते समय ही वे साहित्य के नशे में पड़ गये थे। ‘भारतवर्ष’, ‘साहित्य’ आदि में उनके लेख निकलते थे। कुछ साहित्यिक ख्याति भी उनकी हो गयी थी।
काबुलीवाला की हींग की झोली घर में रख आने पर भी उसके शरीर से हींग की गन्ध आती रहती है, उपेन दा ने साहित्य का पार्ट कलकत्ता में ही पूरा कर अर्थाेपार्जन की आशा से भागलपुर में वकालत करने के बाद एक साहित्यिक अड्डा बना लिया था। व्यक्ति एक तो साहित्य के लिए पागल, इस पर मजलिसी। रोज़ शाम को उनके घर के बैठकखाने में अड्डा खूब जमता था। गाने-बजाने के साथ मजलिसी कहानियों। उसी के साथ चला करती थी साहित्यिक चर्चा।
भागलपुर में बहुत दिनों से ही साहित्य की आबहवा अपने आप ही बन गयी थी। उपेन दा के अड्डे पर साहित्योत्साही अनेक बंगाली बिना बुलाये आते-जाते थे। कोई कुछ सोचता नहीं था।
उसी समय एक अपरिचित बंगाली युवक का उपेन दा के अड्डे पर रोज़ ही आना-जाना था। घुटनों को छूने वाली उटंगी धोती, बिना इस्तरी का हाथ से धुला मासीन का कुर्ता पहने हुए। एक हाथ में लालटेन, दूसरे में लाठी, रोज़ शाम को अड्डे के एक कोने में सबसे पीछे, सबके अगोचर चुपचाप बैठा रहता, अड्डा के अन्त में जैसे निःशब्द आता था, वैसे ही चला जाता था। वह व्यक्ति कौन है, इसका परिचय लेने का अवसर कभी नहीं आया। अड्डे पर आना और जाना यही था उसका एकमात्र परिचय। पूर्व परिचय की ज़रूरत ही क्या थी।
शरत् के बाद शीत पार होकर वसन्त का मौसम भी चला गया, आ गया ग्रीष्म। भागलपुर की गर्मी आप जानते ही हैं, जब तक धूप है रहती घर से निकला नहीं जा सकता है, शाम के समय लोग थोड़ी चैन की साँस लेते हैं। कोर्ट बन्द। उपेन दा पूरे दिन कमरे में बैठकर नया उपन्यास लिखते, शाम होते ही अड्डा के लिए उन्मुख होकर बैठकखाने में बैठे-बैठे प्रतीक्षा रत रहते। इसी समय दिखायी दी धूल उड़ाती हुई कालवैशाखी की प्रचण्ड आँधी। उपेन दा का मन बहुत खराब हो गया। इस आँधी में क्या किसी के आने की आशा है, क्या कोई आएगा? फिर भी रोज़ की आदत के अनुसार बैठक खाने में बैठे हुए हैं, आँधी के कारण उस दिन खिड़कियाँ बन्द कर रखी थीं। बाहर अँधोरा घिरता आ रहा है, आँधी का वेग कुछ कम हुआ, दो-चार बूँदें पानी भी मानो बरस चुका है। दरवाज़ा खोलकर बाहर रास्ते की ओर देखते ही नज़र गयी दूर से एक लालटेन की रोशनी उन्हीं के घर की ओर बढ़ती आ रही है, साथ में एक छायामूर्ति भी दिख रही है। अच्छा, एक व्यक्ति ही आखिर में आ पाया, दुरन्त रसालाप में तो फिर शाम का समय अच्छी तरह ही बीतेगा।
छायामूर्ति साकार होकर जब उनके घर के बरामदे में हाज़िर हुई, उपेन दा थोड़े निराश हो गये। इस व्यक्ति को पाँच-छह महीने से रोज़ ही अपने बैठकखाने में देखते ज़रूर आ रहे हैं, किन्तु वह व्यक्ति जितना गम्भीर उतना ही लज्जाशील, और संकोची है। बातचीत भी बहुत कम करता है और जितनी करता है वह भी रसहीन, रूखी-सूखी। ऐसे व्यक्ति के साथ साहित्य चर्चा ही आखिर कितनी होगी। रंगरस की बातें तो छोड़ ही दो।
उपेन दा का स्वभाव है, सारे मनुष्यों में कहानी अथवा उपन्यास के पात्रों को खोजते फिरना। मन-ही-मन सोचने लगे इस चुप्पा मनुष्य के जीवन में ऐसे कुछ उपादन मिल सकते हैं, जो उनके उपन्यास की चरित्र-रचना के काम में आ सकें। उसी उद्देश्य से उस आगन्तुक के पास आते ही उसे आदर सहित स्वागत करते हुए कमरे में बुला ले गये।
कमरे में घुसते ही उस व्यक्ति ने हाथ का छाता, डंडा और लालटेन दिवाल के पास रखकर कमरे के कोने में रख दी और उसी निधर््ाारित बेंच पर जाकर वह व्यक्ति बैठ गया। उसी जगह पर वह व्यक्ति रोज़ ही जाकर बैठता था।
बड़ा एतराज़ करते हुए उपेन दा बोले- ‘आप इतनी दूर क्यों बैठे हुए हैं, सामने की कुर्सी पर आकर बैठिये ना।’
लज्जामिश्रित स्वर में आगन्तुक ने कहा- ‘जी, और भी तो कई लोग आएँगे, उनकी जगह पर क्या मेरा बैठना ठीक होगा ?’
अभय देते हुए उपेन दा बोले- ‘आपके संकोच करने का कोई कारण नहीं है, भारी वर्षा को झेलते हुए आज और कोई आएगा नहीं। आप आगे आकर बैठिये।’
बड़े संकोच के साथ उपेन दा के सामने रखी टेबिल की उल्टी तरफ चेयर पर आकर बैठते ही उपेन दा ने कहा- हमारे अड्डे पर आपका रोज़ का आना-जाना है, हालाँकि आपका परिचय नहीं लिया गया है। यद्यपि इस अड्डे पर परिचय की ज़रूरत पड़ती भी नहीं है। चेहरे की पहचान ही सदा के लिए पहचान बन जाती है। तो आपका नाम जान सकता हूँ ?’
- ‘जी, मेरा नाम विभूतिभूषण बन्द्योपाध्याय है।’
- यहाँ पर आप क्या करते हैं ?
- कलकत्ता से ही यहाँ नौकरी के कारण आया हूँ।
- कलकत्ता से नौकरी लेकर आये हैं भागलपुर ? क्या कलकत्ता में कोई नौकरी मिली नहीं?
प्रश्न में शायद उपेन दा का अपना भी कलकत्ता छोड़कर भागलपुर वकालत करने आने का थोड़ा क्षोभ प्रच्छन्न रूप से मिला हुआ था। कलकत्ता का साहित्यिक जीवन छोड़कर निरे अर्थ की खोज में भागलपुर आकर मुवक्किलों को लेकर पड़े रहने के पीछे उनके हृदय की सहमति नहीं थी। सान्त्वना के स्वर में इसीलिए फिर बोले- ‘कलकत्ता में अगर थोड़ा प्रयास करते तो कोई-न-कोई काम तो जुट ही जाता।’
‘जी, मास्टरी मिल गयी थी, किन्तु पसन्द नहीं आयी। इसलिए खेलात घोषों की जमींदारी आफिस में नायब का काम लेकर चला आया।’
‘खेलात घोष की जमींदारी! वह तो बहुत दूर है। यहाँ से चार-पाँच मील तो होगी ही। इसके अलावा घने जंगल के भीतर से आना पड़ता है ना ?’
‘हाँ दो-तीन मील का रास्ता जंगल से होकर ही पार करना पड़ता है।’
यह बात सुनकर उपेन दा एकदम अवाक् रह गये। विस्मय का भाव बीत जाने पर कहने लगे, ‘इसी जंगल का रास्ता पार कर आप रोज़ यहाँ आते हैं। आपको डर नहीं लगता है ? सुना है इस जंगल में कई हिंसक जीव-जन्तु रहते हैं। साँप-विष खाँपरों का भी अभाव नहीं है।’
विभूति बाबू थोड़ी लज्जामिश्रित हँसी हँसते हुए कहने लगे, ‘भयभीत होने के लिए क्या है ? अथवा हिंसक प्राणियों के रहने से ही क्या है ? उन पर अगर आक्रमण न किया जाए तो वे भी मेरा कुछ बिगाड़ेंगे नहीं। इसके अलावा मुझे जंगल का एक मोह भी है। एक माया भी है जो सबसे ज्यादा मुझे आकर्षित करती है। और आपने साँप-विषखाँपर की जो चर्चा की ? यह जो लाठी देख रहे हैं, वह जब तक हाथ में रहती है, तब तक मुझे किसी का भी डर नहीं रहता है।’
उपेन दा एक अद्भुत चरित्र का व्यक्ति पाकर मन-ही-मन खुश हो उठे। बोले,
‘अच्छा, रोज़ आप इतना लम्बा रास्ता पैदल चलकर आते हैं, अड्डे पर आकर चुपचाप बैठे रहते हैं, यह भी मैंने लक्षित किया है। किन्तु, क्यों ? किस आकर्षण में ?
‘किसके आकर्षण में ? बताइए, आपको किस तरह समझाऊँ। भागलपुर आने के पहले ही बंगालीटोला में आपके घर के बारे में बहुत कुछ सुना था। सुना है शरत्चन्द्र इसी घर में बड़े हुए थे। इसी घर में उनकी साहित्य-साधना का प्रेरणास्रोत है। इसके अलावा अनुरूपा देवी, केदार बंद्योपाध्याय एवं और भी अनेक साहित्यकारों ने इसी घर में साहित्य की महफिल जमायी है। यह घर मेरे लिए तीर्थस्थान है। फिर उसके ऊपर आप यहाँ रहते हैं, आपके घर के साहित्यिक अड्डे की ख़बर मैं कलकत्ते से ही सुनकर आया हूँ।
जिस आशा से इस व्यक्ति के साथ उपेन दा आलाप-परिचय जमा रहे थे, उन्होंने महसूस किया कि वह व्यक्ति तो एकदम दूसरी धातु का बना हुआ है। इसकी बातचीत में एक शिल्पी मन छिपा हुआ है, उसका थोड़ा-सा आभास मानो उपेन दा के सामने प्रस्फुटित हो उठा। आग्रह के साथ उपेन दा कहने लगे- ‘आपको गुप्त रूप से साहित्यिक अनुशीलन की शायद थोड़ी लत है ?’
‘ना, वैसा तो कुछ नहीं, यही एकाध, थोड़ा-बहुत....’
लज्जाशील व्यक्ति, इसीलिए कहने में संकोच कर रहा है।
‘कविता वगैरह ज़रूर दो-चार लिखी होंगी। और जब अरण्य के एकान्त में आप दिन-पर-दिन व्यतीत कर रहे हैं तब अलबत्ता आपने कविता ज़रूर लिखी होगी। अगर अब भी न लिख रखी हो तो आपको लिखनी चाहिए एवं मुझे तो दिखानी भी होगी।’
इस बातचीत के बाद विभूति बाबू हृदय में बल संचित कर कहने लगे, ‘अगर आप अभय दान दें, अगर मुझे आप उत्साहित करें, आपसे एक बात कहूँ।’
‘तो फिर मेरा अनुमान सही ही है। निश्चय ही आपने कविता लिखी है और जेब में लेकर आये भी हैं मुझे दिखाने के लिये। इसमें लज्जित होने का कोई कारण नहीं है, इस तरह के कई व्यक्ति मेरे पास आकर अपनी रचनाएँ मुझसे ठीक करा ले जाते हैं। झटपट निकालिए, मैं पढ़कर देखना चाहता हूँ।’
‘जी, कविता नहीं। मैंने एक उपन्यास लिखा है।’
‘उपन्यास ? आ-आ-आपने ? लिख भी डाला।’ विस्मय से विमूढ़ उपेन दा आँखें फाड़-फाड़कर विभूतिबाबू की ओर देखने लगे।
रात हो चुकी थी। बाहर जमा हुआ अन्धकार, वर्षा से सिक्त ज़ोरदार हवा जंगल से होकर कमरे के दरवाजे़ से, यहाँ-वहाँ प्रवेश करने लगी। घर के भीतर एक तरह का थमा हुआ सन्नाटेदार वातावरण। विभूतिबाबू सिर नीचा कर बैठे हुए हैं, मानो बहुत बड़े विस्मय की स्तब्धता हो, मानो यह व्यक्ति कभी अपराध कर ही न सकता हो।
यह आस्वस्तिकर स्तब्धता मानो दोनों लोगों को पीड़ा दे रही हो। लाचार होकर उपेन दा ही बात करने लगे, जैसे स्वगत आलाप कर रहे हों।
‘उपन्यास लिखने का ककहरा तो सीखा नहीं, एकदम उपन्यास।’ अब विभूतिबाबू के अवाक् होने की बारी थी। उन्होंने कहा- ‘ककहरा ? यह क्या चीज़ होती है।’
‘हाँ, हाँ, ककहरा! इसके पहले किसी पत्रिका में आपका कोई लेख-वेख निकला है ? जैसे कोई कविता या कहानी ? नहीं तो कोई प्रबन्ध ?
‘जी नहीं।’
‘फिर ? ककहरा तो सीखा नहीं और आपने उपन्यास लिख डाला ?’
‘वही कह रहा हूँ। साहित्यिक जीवन शुरू किया था कविता लिखकर। बाद में कहानी-उपन्यास में चला गया। बंकिमचन्द्र की पहली रचना कविता है। प्रकाशित की थी ईश्वरचन्द्र गुप्त ने अपनी पत्रिका ‘संवाद प्रभाकर’ में। वही था उनका ककहरा सीखना। रवीन्द्रनाथ की बात और नहीं कहूँगा। यहाँ तक कि मेरे भाँजे शरत्चन्द्र, जीवन के पहले पर्व में, उसने भी कविता लिखकर ही अपना साहित्यिक जीवन शुरू किया था।’
विस्मित होकर विभूतिबाबू कहने लगे, ‘शरत्बाबू ने कविता लिखी है ? कहाँ, यह बात तो इसके पहले कभी सुनी नहीं है ?’
‘कहाँ से सुनोगे ? यह बात मेरे अलावा और कोई जानेगा भी कैसे ? आज भी शरत् की लिखी, कविता की पहली पंक्ति मुझे याद है, ‘फूलवने लेगेछे आगुन’- फूलवन में आग लगी हुई है।’ भागलपुर के इसी घर से किशोर अवस्था में हस्तलिखित एक पत्रिका निकालता था। उसी पत्रिका में उसने यह कविता लिखी थी। इसीलिए कहा था कि एक-दो छोटी-छोटी रचनाएँ इधर-उधर छप जाने पर थोड़ा नाम हो जाने पर उपन्यास पर आना चाहिए था, क्या यह उचित नहीं था ?’
कैफ़ियत दे रहे हों इस लहजे में विभूतिभूषण बोले, ‘काफ़ी दिनों से भीतर-ही-भीतर एक तरह की तागीद अनुभव कर रहा था कि अपने देश की कथा, अपने गाँव की कथा उपन्यास के रूप में लिख जाऊँगा। गाँव के स्कूल में मास्टरी करता था, अवसर था, इसीलिए उपन्यास लिख डाला।’
‘यह तो बहुत अच्छा किया है। अकेले जंगल में पड़े हुए हैं इसलिए समय काटने के लिए कुछ तो चाहिए, उसे तो बिताना ही होगा। फिर भी उपन्यास लिखने से ही तो उपन्यास हुआ नहीं, उसके तो कितने ही नियम-क़ायदे होते हैं। क्या आपने उनको बरकरार रखा है ? कितना बड़ा उपन्यास लिखा है ?’
विभूतिबाबू ने बताया, ‘वह तो एक बड़ा उपन्यास ही होगा, मेरे हाथ की लिखावट बहुत महीन है। इसलिए हाथ के लिखे चार सौ पन्ने हो गये हैं।’
‘इतने पन्ने तो हो ही जाएँगे। जब अकेले-अकेले रह रहे हैं, तब पन्ने-पर-पन्ने, दस्ते पर दस्ते, रीम-पर-रीम लिखते जाने के अलावा और काम ही क्या है। आपके उपन्यास में परिच्छेद हैं ?’
‘वह तो हैं।’
‘उनकी संख्या मिलायी है ?’
‘संख्या ? उपन्यास लिखने के साथ गिनती का क्या सम्बन्ध है, मैं यह ठीक से नहीं समझ सका।’
‘गिनती का अर्थ है गणित। पहले परिच्छेद में जितने शब्द हैं, दूसरे परिच्छेद में भी उतने ही शब्द रहेंगे। इसी तरह से तीसरे, चैथे, पाँचवें में। गिनकर देख लिये हैं ?’
‘जी नहीं। गिनकर मैंने देखा नहीं है।’
‘मैं यहाँ रहता हूँ। आप मेरे यहाँ आज छह मास से ऊपर हो गये, आना-जाना कर रहे हैं। एकबार मुँह खोलकर यह बात बतायी नहीं ? अब तो तुम्हारा सारा परिश्रम बेकार हो गया। कविता का जिस तरह से एक छन्द होता है, मात्राएँ होती हैं, उपन्यासों के क्षेत्र में भी एक हिसाब होता है। एक परिच्छेद के साथ दूसरे परिच्छेद का अनुपात होना चाहिए। अगर वैसा अनुपात क़ायम न रखा जाए तो उपन्यास असंगत हो जाता है। फिर सम्हाल के बाहर चला जाता है।’
हताश होकर विभूतिबाबू कहने लगे, ‘तो फिर इसका उपाय क्या है ?’
उपाय एक है। आज ही घर जाकर किस परिच्छेद में कितने शब्द हैं गिन डालिए। उसके बाद काट-छाँट करने या किसी परिच्छेद को बढ़ाने से एक परिच्छेद के साथ दूसरे परिच्छेद का सामंजस्य बिठाना होगा। एक बार ही तराजू से ठीक-ठीक तौलने जैसा मामला है या नहीं।’
इस बातचीत के बाद विभूतिबाबू अत्यन्त निराश हो गये। इतने दिन तक, इतना परिश्रम करके अन्तर की सारी वेदना ढालकर जो उपन्यास लिखा है, वह सिर्फ़ गिनती की भूल के कारण क्या बेकार हो जाएगा ?
उपेन दा अनुभवी उपन्यासकार हैं। मानव चरित्रों को लेकर ही उनका कारबार है। विभूतिबाबू के चेहरे की ओर देखकर उन्होंने उनकी मानसिक स्थिति पहचान ली, उन्हें उत्साहित करते हुए कहने लगे, ‘इससे हताश होने की कोई बात नहीं है। जब तक भाई मैं बना हूँ, तब तक तुम्हें अपने उपन्यास का कोई डर नहीं है। आप तो सिर्फ़ परिच्छेदों की शब्द संख्या गिन डालिए, कल सन्ध्या के पहले दिन में अन्य मित्र आएँ, इसके थोड़ा पहले आ जाइए। तो भी, उपन्यास की पाण्डुलिपि साथ में लाना ज़रूरी है। मैं एक बार उसे देखना चाहता हूँ।
इस आश्वासनभरी वाणी सुनकर विभूतिबाबू को ऊभ-चूभ करते हुए जैसे कोई खोजने से नाव मिल गयी हो। इधर बातों-बातों में रात घनी हो गयी। मेघों के अँधोरे से भरी रात में जंगल से होकर उन्हें जाना भी पड़ेगा काफ़ी दूर। उपेन दा से विदा लेकर जेब से दियासलाई निकालकर उन्होंने लालटेन जलायी, उसके बाद छाता और लाठी बगल में बदाये कमरे से बरामदे में, बरामदे से रास्ते में उतर पड़े। रास्ते तक छोड़ने आए उपेन दा ने कहा, ‘कल आपको आना है किन्तु उपन्यास की पाण्डुलिपि लाना नहीं भूलेंगे।’
सिर हिलाकर विभूतिबाबू ने विदा ली। विभूतिबाबू की छायामूर्ति धीरे-धीरे अँधोरे में विलीन हो गयी। लालटेन की रोशनी की ओर स्थित दृष्टि किये उपेन दा रास्ते में खड़े-खड़े उन्हें ताकते रहे।

उस रात विभूतिबाबू की आँखों में नींद नहीं आयी। सिर्फ़ उपन्यास के परिच्छेदों की शब्दराशि को गिनते रहे। पहले परिच्छेद में सोलह सौ शब्द, दूसरे में हज़ार। तीसरे और चैथे में लगभग समान शब्द, पाँचवाँ खूब छोटा तो छठा परिच्छेद बहुत विशाल। शब्दों की गणना करते-करते रात्रि के अन्त में थककर सो गये।
दूसरे दिन जल्दी-जल्दी जमींदारी के आफ़िस का काम निपटा कर गर्मी की प्रचण्ड धूप और लपट में ही निकल पड़े, बंगाली टोला के रास्ते पर। हाथ में वही लालटेन और लाठी, सिर्फ़ छाते की जगह कागज़ में लिपटे पन्ने।
बैठकखाने में पहुँचते ही उन्होंने देखा कि उपेन दा उन्हीं की प्रत्याशा में तैयार होकर बैठे हैं। कमरे में घुसते ही बोले, ‘क्यों, खाता ले आये हो ?’
अख़बार के कागज़ में लिपटे बण्डल को उपेन दा के सामने टेबिल पर रखकर लालटेन और लाठी लेकर अन्य दिनों की तरह कमरे के अन्तिम छोर पर रखी बैंच पर जाकर बैठ गये। पाण्डुलिपि के पन्नों को उलट-पलट कर देखते हुए उपेनदा बोले- ‘मुझे जो आशंका थी वही इस पाण्डुलिपि में भूल हो गयी है। ऐसा लग रहा है परिच्छेदों की शब्द संख्या में कोई मेल है ही नहीं। अच्छी तरह गिन लिये हैं ?’
‘कल पूरी रात यही गिनता रहा हूँ। शुरू से आखिर तक शब्द संख्या एक-सी नहीं है।’
गाल पर हाथ रखकर उपेन दा कोई विचार करने लगे। कुछ कहते-कहते अचानक रुक गये। इसी समय अड्डे में रोज़ आने वाले दो-तीन लोगों को कमरे में आते देखकर पाण्डुलिपि को कागज़ में लपेटकर टेबिल की दराज़ में रखकर विभूतिबाबू की ओर देखकर बोले, ‘यह मेरे पास सुरक्षित रही। अवसर मिलते ही मैं एकबार इसे पढ़कर देखना चाहता हूँ।’ नियमानुसार अड्डा जम गया। विभूतिबाबू नीरव श्रोता के रूप में जैसे रोज़ बैठे रहते थे, वैसे ही बैठे रहे। बैठक के शेष होते ही लालटेन जलाकर धीरे कदमों से अपने उसी डेरे पर लौट गये।
दिन आते गये और जाते रहे। उपेन दा ने उस पाण्डुलिपि के बारे में कुछ नहीं कहा और विभूतिबाबू ने भी उनसे कुछ नहीं पूछा। इसी तरह से दो मास बीत जाने के बाद बैठक खत्म होने वाली थी, उसी समय उपेन दा ने विभूतिबाबू से कहा, ‘आप चले मत जाइए, आपसे कुछ काम है।’
विभूतिबाबू का मन आशंका से डावाँडोल होने लगा। पता नहीं, ये क्या कहेंगे। गोष्ठी के सभी लोगों के एक-एक कर चले जाने के बाद उपेन दा ने विभूतिबाबू से टेबिल के सामने कुर्सी पर बैठने को कहा। पास आकर बैठते ही दराज़ से खातों (पाण्डुलिपि की काॅपियों को) को निकालकर कहने लगे, ‘मैंने पूरी पाण्डुलिपि पढ़ ली। आपका उपन्यास ठीक है, छप जाएगा। छप क्यों जाएगा ? बस समझ लीजिए छप गया है क्योंकि आपका उपन्यास ठीक लिखा गया है।’
विभूतिबाबू का चेहरा आनन्द से उद्भासित हो उठा। फिर भी द्विधाग्रस्त होकर उन्होंने जिज्ञासा प्रकट की, ‘किन्तु, गिनती ?’
‘गिनती ज़रूर कुछ अमिल है। फिर भी उससे कुछ आता-जाता नहीं है। उसे मैं थोड़ा काट-छाँट कर ठीक कर दूँगा। इसके अलावा सभी रचनाओं पर विचार सिर्फ़ गणित के आधार पर क्या किया जा सकता है ? और क्या इस तरह विचार करना उचित भी है ? अपवाद भी हो सकता है। अच्छा कहीं उपन्यास छपाने का क्या आप विचार कर रहे हैं ?
विभूतिबाबू कुछ क्षण ज़मीन की ओर स्थिर दृष्टि से देखते रहे। उसी स्थिति में दीर्घ श्वाँस लेते हुए कहने लगे, ‘कलकत्ता में रहते समय ‘प्रवासी’ पत्रिका में छपने दिया था। यहाँ नौकरी पर आते समय वहाँ पता करने गया और उसे वापस ले लिया।’
गुमसुम हो गये उपेन दा। मजलिसी मिजाज़ के कारण खुशदिल मानुस एक क्षण के लिए पत्थर की तरह स्तब्ध हो गये उपेन दा। कमरे का वातावरण भी मानो भारी हो गया। कुछ पलों की नीरवता के बाद उपेन दा गम्भीर स्वर में कहने लगे, ‘आप चिन्ता न करें। इस उपन्यास के छपने की व्यवस्था मैं ही करूँगा। आप ऐसा समझ लीजिए कि आप अपनी एकमात्र सन्तान को जैसे मुझे सौंप रहे हों। इसका भार आज से मैंने ले लिया। आप निश्चिन्त होकर घर जाइये।’
विभूतिबाबू का मन कृतज्ञता से भर गया। विदा लेते समय घूलघूसरित धोती के छोर से आँखें पौंछते हुए आवेगरूद्ध कण्ठ से बोले, ‘मेरी यह रचना प्रकाशित हो या न हो, अब मेरे मन में कोई खेद नहीं है।’
दो महीने बीत जाने पर एक दिन उपेन दा ने विभूतिबाबू को एकान्त में बुलाकर कहा- ‘मैं भागलपुर छोड़कर पुनः कलकत्ता जा रहा हूँ। यह बात अड्डे के और किसी व्यक्ति को बताएँगे नहीं, वे लोग अडंगा लगाएँगे।’
विभूतिबाबू अवाक् होकर उपेन दा के मुँह की ओर देखते रह गये।
उपेन दा हँसकर कहने लगे, ‘अवाक् हो रहे हैं तो फिर सुनिये। कलकत्ता जाकर मैं एक मासिक पत्रिका निकालँूगा।’ ‘आप ? वह तो, सुना है, अनेक रुपयों से चलने वाला काम है, ‘रुपये की चिन्ता मेरे जमाई बाबू की है, समझे, मेरे जमाई की कोयले की खदानें हैं। उनके पास काफ़ी पैसा है। मना-मनूकर किसी तरह इस लाइन में आने के लिये राज़ी किया है। अब रवीन्द्रनाथ और शरत्चन्द्र को एक साथ छपने के लिए राज़ी कर पाने के बाद किला फतह। मैं आपको वचन दिये जा रहा हूँ, आपका उपन्यास मैं ही छापूँगा।’
सचमुच उपेन दा भागलपुर का अपना कारोबार समेटकर कलकत्ता चले गये। उसके कुछ ही महीने बाद बड़े समारोह के साथ प्रकाशित हुई ‘विचित्रा’। प्रकाशित हुई कहना ग़लत होगा, एक तरह से उसका आविर्भाव हुआ। जिस दिन पहला अंक निकला, उसके एक दिन पहले रात में मुहल्ले-मुहल्ले में कलकत्ता की दीवारों पर ‘विचित्रा’ के पोस्टर छा गये। पत्रिका के कार्यकत्र्तागण टैक्सी करके बड़ी रात तक सारे कलकत्ते में घूमकर देखते रहे कि पोस्टर कैसे लग रहे हैं। सुतराम, ख़बर का स्तर कैसा होगा, आप इसी से अनुमान लगा लीजिए। जिसको कहते हैं इलाही कारोबार, एक तरह का छा जाने वाला व्यापक मामला। वह इतिहास किसी का भी अजाना नहीं है।
उधर भागलपुर के एकान्त में बैठे हुए विभूतिबाबू आशा के साथ महीने गिन रहे थे, उपन्यास तो अब तक निकला नहीं। चिट्ठी भी नहीं लिखी कि कहीं उपेन दा उससे नाराज़ न हो जाएँ। किन्तु, धीरज की भी एक सीमा होती है।
किसी एक उपलक्ष्य में कई दिनों की छुट्टी में से विभूतिबाबू ने कलकत्ता जाने का निश्चय किया।
फडियापुकुर लेन के दुमंजिले के एक कमरे में ज़ोरदार अड्डा जमा हुआ था। सोफ़ासेट से सुसज्जित प्रकोष्ठ में पाँचेक लोग, सूटिड-बूटिड भद्रजन चाय के प्याले में आँधी उठाते हुए साहित्य में श्लीलता और अश्लीलता को लेकर तर्क-पर-तर्क किये जा रहे थे। सभी के मुँह में सिगरेट जल रही थी, धुएँ के कारण कमरे में अँधोरा छाया था। बीच की मेज़ पर कीमती ब्राण्ड की सिगरेट की डिब्बी, चाय के कप इधर-उधर फैले हुए थे। कमरे के एक कोने में धोती-कुर्ता पहने एक युवक टेबिल के ऊपर प्रूफ लेकर दत्तचित्त हो काम करता जा रहा है, तर्क-वितर्क से निस्पृह होकर। यही है ‘वेद’ के लेखक अचिन्त्य कुमार।
इसी समय दरवाजे़ के सामने एक भद्रलोक के झाँकते ही पाँच जोड़ा आँखें उसके ऊपर जा टिकीं। इतने बंगाली साहब-सूबेदारों को देखकर आगन्तुक थोड़ा घबड़ाकर दरवाजे़ पर ही खड़ा रह गया। कमरे में नहीं आया। अधमैली धोती, वह भी लगभग घुटनों तक। जूतों का चाम काला था या भूरा, कलकत्ते के रास्ते की धूल के कारण उसे भी पहचानने का कोई उपाय नहीं है। देह पर कुर्ता, उसकी दो-एक जगह पर रफू के चिन्ह है। हाथ में थी चटाई की थैली।
कमरे से किसी ने उपेक्षा का भाव व्यक्त करते हुए कहा, ‘यहाँ क्या लेने आये हैं आप ? क्या चाहते हैं ? आप क्या एजेण्ट हैं ? हम लोग आपको दस पत्रिकाओं से अधिक नहीं दे पाएँगे। बहुत बड़ी माँग है। जाइए, उस कोने में बैठे भद्र व्यक्ति के पास रुपया जमा कर दीजिए।’
‘मैं एजेण्ट नहीं हूँ।’
‘तो क्या आप लेखक हैं ? कविता लिखते हैं ? नाम, पता लिखकर उसी कोने वाले भद्रलोक के पास जमा कर दें।’
‘लेखक भी नहीं हूँ। कविता देने भी नहीं आया हूँ। मैं आया हूँ, पत्रिका के सम्पादक से भेंट करने।’
‘उपेन गांगुली से ? वे अभी आये नहीं है। आपको जो ज़रूरत हो उसे उसी कोने वाले भद्र व्यक्ति को बता दें, उसी से आपका काम चल जाएगा।’
एक साँस में सारी बातें आगन्तुक के ऊपर फेंकते हुए वक्ता महोदय पुनः अपनी पूर्व चर्चा का सूत्र पकड़कर कहने लगे, ‘अमलबाबू आप चाहे जो कहें, डी.एच. लारेन्स को लेकर युवा लेखकों का एक दल जिस तरह से उत्तेजित है...’
इसी समय उपेन दा आ उपस्थित हुए। दरवाजे़ के पास जो व्यक्ति इतनी देर तक लौट जाऊँ या न जाऊँ यह सोचता हुआ दुविधा में पड़ा हुआ था, उसे प्रायः पकड़ते हुए खींचते-खींचते कहने लगे, ‘क्या समाचार है विभूतिबाबू। कलकत्ता कब आये ? भागलपुर के सारे समाचार ठीक तो हैं।’ बैठिये! बैठिये!’
सोफ़े पर समासीन जिस भद्रपुरुष ने उन्हें एजेण्ट मान लिया था, उन्हीं के बगल में थी जगह बैठने की। विभूतिबाबू वहाँ बैठे नहीं। खड़े-खड़े ही कहने लगे- आज ही सवेरे कलकत्ता पहुँचा हूँ, रात में ही गाँव चला जाऊँगा, थोड़ा समय था इसीलिए आपसे भेंट करने चला आया।’
‘तो आपने आकर अच्छा ही किया। आपको खुशखबरी दे रहा हूँ, अगले अंक से ही आपका उपन्यास छपने जा रहा है।’
इतनी देर जो लोग तर्क के द्वारा उस कमरे को सरगरम किये हुए थे, वे एकदम चुप हो गये। बार-बार वे लोग टकटकी लगाकर देख रहे थे विभूतिबाबू को। सिर से पैर तक और पैरों से सिर तक।
विभूतिबाबू फिर वहाँ पल भर भी खड़े न रहकर लगभग दौड़कर सड़क पर निकल आये। उस दिन के कलकत्ता शहर की शाम का आनन्द फिर वे जीवन में कभी नहीं भूले। बाद के जीवन में वे प्रायः मुझसे कहा करते थे, ‘देखो, कलकत्ता शहर मुझे किसी भी दिन अच्छा नहीं लगा। गाँव और अरण्य में ही मुझे शान्ति मिलती है। फिर भी, हाँ, उस दिन शाम को ‘विचित्रा’ के आॅफ़िस से सड़क पर निकलकर कलकत्ता शहर से भी मैंने प्रेम किया था।’
लगातार एक कहानी कहते हुए विमलबाबू थोड़ा ठहर गये। ‘पथेर पांचाली’ के प्रकाशित होने की कहानी तन्मय होकर हम लोग सुन रहे थे और सोच रहे थे बंगदेश का दुर्भाग्य है कि ‘विचित्रा’ जैसी पत्रिका बन्द हो गयी, उपेन दा जैसा सम्पादक भी फिर हमें और नहीं मिला। और विभूति बन्द्योपाध्याय ? बांग्ला साहित्य में विभूतिभूषण जैसे मानववादी और प्रकृतिपे्रमी कथाकार क्या और देखने को मिलेंगे ?
इसी बीच में विमलबाबू ने दम लगाकर एक और चुटकी सुँघनी ले ली फिर कहने लगे, ‘अगले महीने से ही ‘विचित्रा’ में ‘पथेर पांचाली’ निकलने लगी। साहित्य रसिक वर्ग में हलचल मच गयी- कौन है यह लेखक?’
सहसा एक दिन ‘शनिवार चिठि’ के सम्पादक सजनीकान्त दास खोजते हुए विभूतिबाबू के पास आकर हाज़िर हो गये। नब्बे रुपया उनके हाथों में देकर बोले- ‘पथेर पांचाली’ पुस्तक रूप में मैं ही छापूँगा।
अचरज में पड़ गये विभूतिबाबू। नब्बे रुपया!! यह तो मेरे लिये कल्पनातीत था।
इतना कहकर विमलबाबू कुर्सी छोड़कर उठ पड़े। ध्ौर्यहीन होकर हम लोगों ने कहा- यह क्या, आप उठ क्यों गये ? ‘पथेर पांचाली’ की कहानी तो हमने सुन ली। किन्तु, मानिक बंद्योपाध्याय वाली घटना तो सुनायी ही नहीं ?’
दरवाजे़ की ओर चलते-चलते विमलबाबू बोले- रात कितनी हो गयी यह खयाल भी है ? ‘अतसीमामी’ कहानी प्रकाशित होने की कथा और किसी दिन होगी।’
अब हम लोगों को होश आया। रात के नौ बज गये और हमें इसका आभास भी नहीं हुआ।

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