हिरेन भट्टाचार्य की कविताएँ असमिया से अनुवाद: किशोर कुमार जैन, अपराजिता डेका
05-Sep-2018 04:20 PM 1784     

छाया
पेड़ से छाया
जैसे तैसे उड़ गयी
मानो कहीं चली जाएगी...
पेड़ से छाया
जैसे तैसे
उड़ गयी
मानो दूसरी छाया में मुँह डालकर कहेगीः
मेरी छाती रेगिस्तान है
हाथ रखकर देखो तुम को जला देगी।
पेड़ से छाया
पत्तों से छाया
छाया जमीन से
उड़ गयी है...

कौन-सा फूल खिला है
कौन-सा फूल खिला है? केतकी !
काँटों से फूलों को ढँककर पेड़ ने कहा,
तोड़ लोगे क्या?
फूल को तोड़ने का साहस क्या मुझमें है ?
फूल तोड़ने का साहस ?
काँटों भरे पत्ते काटकर फूल तोड़ने की वासना !
कौन-से फूल खिले हैं ? हवा में उड़ रहा है पराग...
और मैं?
दूर बैठा क्या चाहता हूँ ?
फूल की खुशबू ?
फूल की खुशबू!
सुनहले फूल की खुशबू!
कौन-से फूल खिले हैं? केतकी!

बसन्त का एक दिन
तुम्हारे शयनकक्ष से होकर
धूप के संग हाथ से हाथ मिलाते हुए, हवा
मेरे बहुत ही क़रीब आकर बैठ गयी, पीठ पर अंगुलि फिराते हुए,
मेरे कन्धो पर सिर रखकर दोनों हाथ फैलाये
चम्पक फूल की अधबुनी हुई माला:
आलोकित इन्द्रधनुष की तरह।

एक दिन शरद
सुखमय हरसिंगार की उड़ती हुई सुगन्ध, तुम्हारी निर्मल देह की
शरदमय सुनहली छाया, स्वच्छ तालाब के पानी का शीतल शब्द
मेरी देह के क़रीब से निर्विघ्न गुज़र जाती है...
हर फूल की महक में मेरी ही इच्छा है,
मानो मैं ही हूँ उसका स्रोत
मेरे भीतर का आदमी उड़ता है धूल की तरह
स्वर्णाभ पड़ोसी के उद्वेग के बीच से।

फिर देश
सारा देश
सारे देश की निद्राहीन आँखों के गझिन अँधोरे में
गरजता है इच्छाओं का मेघ
मेरे तेज़ कदमों से उद्वेलित देश,
देह के अन्त में फिर देश।

दुःसाहसी खून की कविता
आधी रात को नदी में गोता लगाकर धो आता हूँ तुच्छ दैनन्दिनता,
संकल्प-मन्त्रों से सजाता हूँ इच्छाओं का आनुष्ठानिक-अश्व
हवा में उड़ती है हर दिशा में मेरी दुःसाहसी खून की कविता।

तुमसे मुझ तक
तुमसे मुझ तक लौटने में
मुझे बहुत देर हो जाती है
सनिर्बन्ध अन्धकार से महकती हास्नाहाना की खुशबू
जब उड़कर आती है चुपचाप
उस समय तक मैं तुम्हारे क़रीब ही
रुका हुआ रहता हूँ।
मेरे स्वप्न में एक चंचल हिरण-शावक
सारी रात डोलता है।
लौटकर मैं जो नहीं आ सकता!
मेरे ये शब्द
सपनों के उद्यान को छूकर आनेवाले मेरे शब्दों में है जीवनधारा की सुषमा,
समय का घनिष्ठ उत्ताप, मेरी अपनी कोई खोज नहीं है,
मेरे अन्दर का मानो एक किसान, मैं शब्दों को जीभ से चखकर देखता हूँ,
किसका क्या स्वाद है, हथेली पर रखकर देखता हूँ, कितने गरम हैं,
मैं जानता हूँ शब्द मनुष्य की महान सृष्टि की तेजोदीप्त सन्तान हैं,
मैं सामान्य कवि,
कन्धा बदलते हुए ढोकर लाये हुए इन शब्दों में
मनुष्य का दयाहीन अनुभव है, इतिहास की निष्ठुर खरौंच।
असमिया से अनुवादक: किशोर कुमार जैन
ज्योति, वह ज्योति
मुझे उस संकीर्णता से
ऊपर उठाओ। तुम्हारे साथ गाने दो
तूफ़ानों का गीत, वज्रों का गान।
मृत्यु के इन हिम शीतल हाथों से
ढँककर रखे हुए हृदय को
एक मुट्ठी आसमान का आश्वासन दो।
घृणा और अविश्वासों से घिरा
संकीर्ण जीवन में आये:
साहस की प्रबल बाढ़।
थरथराती चेतना का अन्धकार प्रहर तोड़कर
तुम्हारे गीतों से ही करता हूँ ज्याति स्नान!

वो नदी
गुनगुनाती मधुमक्खी के झुण्ड जैसी
मेरे गाँव की वह नदी,
जिसकी मधुर लहरों में
भागता है मन मेरा बन्दी।
कभी
दैनन्दिन जीवन की तुच्छता के बीच भी
महसूस करता हूँ उस शीर्ण नदी की
सपनों की विस्तृति
अन्धो आकाश में भर उठती है
स्मृतियों की चाँदनी।
मेरे गाँव की वह लावनी नदी
लहर-लहर में लहर बनकर
बह रही है मुझमें
बहुत दूर से।

बसन्त का गीत
कल रात ढेर सारा कुहासा पड़ा था
पहाड़ी के नीचे
एक पक्षी ने सारी रात
गीत गाते हुए आकाश को रुलाया था।
सुबह,
पेड़-पौधो, पर्वत शिखरों में
वकुल फूल के जैसे
दाने-दाने-सी बर्फ़ गिरी थी
एक चिड़िया की
पुकार पर बसन्त आया होता तो।
उसके कोमल पंखों से
कुहासे को हटाया जा सकता तो।
नागरिक
निरुत्ताप ये जीवन, निर्लज्ज आशाओं में अन्धा।
टूटा हृदय अज्ञात भय से आच्छन्न। फिर भी
समय-शय्या में तलवार की चमचमाहट में
अब भी जल रही है एक पृथ्वी-
दिशाहीन हृदय का आश्रय।
कारखाने का काला धुआँ
एक दिन आकाश में बिजली जलाएगी
सड़क के पास के ये लड़के
जीवन के रास्तों में फूल खिलाएगें
यह बीमार नगर एक दिन
आकाश की ओर मुँह उठाकर देखेगा, आकाश इतना विशाल!
गहरी साँस लेकर कहेगा, हवा इतनी कोमल!
रोशनी में इस स्वर्ण-स्पर्श ने रोशन किया
मेरा अन्धकार हृदय। उद्दाम किया निस्तेज मन
जिस मन के स्तर-स्तर में चेतना का विद्युत विस्मय।

मेरा देश
मेरे जीवन का जीवन, मेरे गीतों के गीत, मेरा देश।
मेरा हर काम, मेरी हर चिन्ता इस देश के हृदय में रचती है
शस्य सुवर्ण भविष्य का स्वप्न। मेरे जीवन के रोम-रोम में
मेरे यौवन की कली-कली में उस स्वप्न का कल्लोल।
देश-देश में देश है। ऐसे बहुत देशों की गली-गली में
मैं घूमा हूँ। बहुत से मित्रों के साथ हाथों में हाथ डाल कर घूमा हूँ।
कभी सागर किनारे, कभी खजूर के नीचे, अथवा
पहाड़ी के नीचे क्षणिक विश्राम किया है।
मित्र के साथ दिल खोलकर मन की बात की है। उसके बाद फिर शुरु की है नयी यात्रा।
ऐसी बहुत-सी यात्राओं का अन्त था मेरा देश। जिसके हृदय की गरमाहट मुझे देती थी
प्रेम का आनन्द, यौवन का प्राचुर्य। जीवन का नया अर्थ।
इस देश की हर सुबह मेरे लिए छिपाकर लाती है ऐश्वर्य का विपुल सम्भार
हर शाम बहाकर लाती है स्निग्ध फूलों की सुवास। हर ऋतु मुझे दे जाती है जीवन का आशीर्वाद।
इस देश के लिए मैं जी रहा हूँ। इस देश के लिए मैंने
जीवित रहने का मैने वचन दिया है। सैनिक, मज़दूर, किसान
इन सब के बीच मैं हूँ-अपने देश के लिए।
अनेकता में एकता बनकर, विरोध के बीच समन्वय की सम्भावना बनकर मैं हूँ।
जीते-मरते, सोते-जागते, सपनों में इस देश का आह्वान मैंने सुना है
शत्रु-मित्र सभी को मैंने पहचाना है। उनका दिल मैंने विश्वास से जीता है।
शान्ति की विहंग जोड़ी को आंचल भरकर मैंने दिया है-
भण्डार से एक मुठ्ठी अनाज, प्राणों का एक-एक गान।
और तो मेरे पास कुछ नहीं है।
मेरा देश मेरे कल्लोलित की उत्ताल तरंगे मुझे ले जाती है गहन से गहनता तक आदर्श के कठिन पर्वत
मूल तक...

अभिज्ञान
एक दिन रात को मैं घर के बाहर बैठा था।
मन और मस्तिष्क में निराशा का अक्लान्त आक्रमण।
चेतना का शरीर मेरी वेदना की चोट से
क्षत-विक्षत।
अचानक, कहीं से हवा के एक झोंके ने आकर
उध्वस्त मन के कक्ष में हलचल मचा दी
कुहासों से स्तमित आकाश में एक दो करके
झिलमिला उठा रुपहली चिड़ियाओं का एक झुण्ड।
शीत में थरथराता उनके पंखों में
किरणों का कितना अद्भूत स्पन्दन।
मैंने उस दिन महसूस किया था
एक वेदनाहत रात्रि के वक्ष में सोया हुआ प्राण सूर्य का उत्ताप।
और सुखी हुई डालों में बहता हुआ
दुस्साहसी पत्तों की प्रत्ययदीप्त हरी तरंग।

विषण्ण रात्रि का फूल
झिंगुरों की करुण पुकार से रात्रि जब निस्तब्ध होती है
विषण्ण- हृदय का दिशाहीन अन्धकार
तुम्हें जब ढूँढता है रात्रि के प्रान्त-प्रान्त में
चाँदनी के आँसू जब पेड़ के पत्तों-पत्तों से झरते हैं
तब मेरे मन के निर्जन स्तरों से
तुम्हारे शरीर की कोमल सुरभि उतर आती है
अकेले।
उस तन्द्राहीन अन्तरंग क्षणों में तुम्हारे तन की सुरभि
मुझे आच्छन्न करती है। जीवन का आंगन
फूलों से भर उठता है।

एक मित्र की उक्ति
कुछ देर पहले थोड़ी शराब पी थी
उसका नशा अभी भी है।
शायद इसी तरह
पूरी रात बीतेगी।
इसी तरह कभी-कभी पी लेता हूँ
और, उसका नशा मुझे ले जाता है
मन के उस निर्जन वन में
जहाँ
मैं खुद से बातें करता रहता हूँ
कभी भी किसी के साथ नहीं की हुई बातें।
कितनी सुन्दर थी वह रातें ।
तारों-तारों में नीले आकाश में
बातों की फुलझड़ी जलती है
रात का सुडौल शरीर
मेरे जीवन को नदी में धो देता है
शीतल सुललित जल से ।

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