अब न बुलाओ प्रवासिनी महाकुद ओड़िया से अनुवाद : दीप्ति प्रकाश
12-Dec-2017 05:54 PM 1502     

मुझे बार-बार बुला कर
मेरे चारों ओर इस तरह
महफ़िल न सजाओ
आवेग की सफ़ेद राजहंसिनी को
मेरी ओर मत भेजो।

राजहंसिनी का एकाकी स्वर
मुझे इतना कमज़ोर बना देता है कि
उड़ जाती है दिशान्त तक मेरी मृण्मय सत्ता।

प्यार करने वाला भँवर
वैसे ही स्थिर रह गया है
प्रार्थना के शिखर पर जैसे जोगी
किसी वृन्त ने
कभी भी पकड़ कर नहीं रखी
रंगहीन, गन्धहीन फूलों की सूक्ष्म देह।

अँधेरे में मत बुलाओ
अन्धकार और भी घना हो जाता है
और उसी अन्धकार में
चमक जाते हैं कुछ तारे
तुम्हारे अस्तित्व के पहले पुण्य
वहीं खिल उठते हैं
लक्ष्यहीन कम्पन में।


उस दिन बुलाना
जादुई लकड़ी में आग दिखा कर
बुलाना,
इतनी ऊँची आवाज़ में कि
मेरी आत्मा आने को मजबूर हो जाएगी
तुम्हारी आवाज़ों की आँधी में।

इधर को आ जाऊँगी
दूसरी जगह से, दूसरी दुनिया से
देह से परे
रूप-गन्ध-स्पर्श लिए आ जाऊँगी
दृश्यातीत दृश्य से।

अब न बुलाओ,
मेरा वृन्त इस तरह
से मत भरो।
ढलती जवानी के एकान्त में
पहले पाप का मोह पुकारता है
मेरी अस्थिर पराजय से
तुम्हारे स्थिर विजय से।

अब न बुलाओ,
अब भी नहीं सूखी है
ताराओं की स्याही से भरी कलम
अब भी खाली पड़े हैं
बिना तारीख़वाले डायरी के पन्ने
अब भी शापग्रस्त है
मोहदग्ध शरीर।
अब प्यार में न बुलाओ
अब इबादत में न बुलाओ
तुम्हारी आवाज़ की आकुलता में
अन्धकार का रंग न बदले
अब न बुलाओ
अब जीवन की चाह में है एक स्त्री
जीवन से अधिक है
जिसकी मग्नता।

अगर खुलता है तो

अधखुले तन से कहा है-
ओ तन! यदि खुलता है तो
पूरी तरह खुल
ओ तन! यदि बन्द होता है तो
पूरी तरह बन्द हो
अधूरे जीवन की यातना सही
लाखों बार।

अधखिले तारों को
अधखिले फूलों को
अधखिले अंकुरों की देखी है सघन साधना
प्रस्फुटन के लिए
बाकी आधे के।

अधखुला मेरा तन!
खुलता है तो पूरा खुल
देख एक स्त्री को

उसके अन्दर की दहन को
तुम्हारे मुँह में लगे उसका ताप।

स्त्री का तन नहीं है सब कुछ
देह के बहाने
गतिशील होते हैं
दया, क्षमा, लोभ
मोह, पाप-पुण्य
सांसारिक विषय-वासना,
भोग-राग-विराग।

यातना में जलती है
बनती-बिगड़ती यह देह,
स्पन्दित-सा उसमें
सृष्टि के मधुरतम रहस्य का
प्रसूति-समय।

ओ तन! यदि खुलता है तो
पूरी तरह खुल
बन्द होता है तो
पूरी तरह बन्द हो।

परिचय : लड़की

क्या था परिचय उसका ?
तू लड़की है : ये सब हिस्से तेरे
लड़की होने की निशानियाँ हैं,
यह उसे किसी ने नहीं कही
पर वह समझ गयी थी।

एक लड़की, क्या कभी खुद उस ने ऐसा सोचा था ?
वह भी तो हाथ छोड़कर साइकिल चला रही थी पक्के रास्ते पर,
लड़कों की तरह बाल कटवा रही थी,
वह भी टिकटें जमा कर रही थी छोटे भाई की तरह,
शामिल थी उसकी शरारतों में
फूलों की चोरी में पड़ोस के बगीचे से
कई तरह की चंचलता, सरस्वती पूजा में
अमरूद की ऊँची डाल पर
तुरन्त पहुँच जाने की।

यह तेरी फ्रॉक
यह चड्डी
यह तेरी समीज़
यह तेरे स्कार्ट और ब्लाउज़
यह तेरा रिबन!
अब से बाल बाँधेगी,
कभी माँ कहती तो
कभी नानी
कभी दादी माँ
और फिर कितने
जाने पहचाने बुजुर्ग।

लड़की की उम्र निरन्तर बढ़ रही थी
एक ग्लास पानी देती जा,
पिताजी के जूते लेती आ,
सब्ज़ी शायद जलने लगी है
ज़रा करछुल चला दे
जा रे बेटी! दो चार फूल
तोड़ ला बाग से

भिखारी को मुट्ठी भर चावल देती आ
ज़रा धीमी आवाज़ में बात कर
तू लड़की है
खुद को सम्भालना सीख
कब, कैसे और कितने तरीकों से
उसे सिखायी गई तहज़ीब
वह खुद भी समझ नहीं पायी,
यह सीखने में एक मगर
सूनापन फैलता था उसके अन्दर
सूनापन उसका अपना एकान्त,
उसका वह आदिम अस्तित्व!
बेटी-बहन होने के परे
है उसका अपना भी परिचय
सुन्दर धरती की तरह ही भरपूर
और मनोरम।

तमाम रिश्तों के परे उसकी चिन्ता
तमाम रिश्तों से परे आत्मा की प्रार्थना
तमाम रिश्तों के परे वह एक एकाकी सत्ता
अब भी फैली हुई है जो धरती के हर कोने में
हर एक परिचय से ऊपर है जो, है पहुँच से परे।

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