स्टीवन ग्रीको की कविताएँ इतालवी@अँग्रेज़ी से कवि की मदद से अनुवादः उदयन वाजपेयी
08-Jun-2019 10:00 PM 622     

स्टीवन ग्रीको का जन्म इतालवी भाषी लुगानो नगर, स्विट्ज़रलैण्ड में 1949। बहुभाषी कवि और अनुवादक, अँग्रेज़ी और इतालवी में लिखते हैं। भारत में ‘समास’ समेत कई पत्रिकाओं में लेख, कविताएँ प्रकाशित। दो कविता संग्रह इटली में प्रकाशित हुए हैं, ‘मसकेरे दोरो बिब्लियोतिका काॅमिनियानी’ और ‘एण्ट्रो इन उना परला (वह मोती में प्रवेश कर गया)’। ‘लोम्ब्रा डेले पेरोल’ अन्तर्राष्ट्रीय कविता पत्रिका के सम्पादक। इन दिनों यूनान में रहते हैं।

सोती हुई वेलेण्टीना
मैं आया, तुम सो रही हो-
यूनानी लोकगीत
मैं आया और तुम सो रही हो,
इस उजले समय में बिल्कुल अभी
खाड़ी से दूर जा चुकी हो।
सिर्फ़ तुम्हारा शरीर यहाँ लेटा है ः
बन्द आँखों से तुम अपनी
पलकों के भीतर देख रही हो
दो संसारों के बीच की दरार से
छनकर आती तेज़ चमक को

तितलियों से लदी स्तब्ध्ा झाडि़यों से घिरे
हमारी खाली रोशन कमरे में हर ओर
दूर तक फैली खाड़ी के बीच
तुम साँस लेती हो, छोड़ती हो और
सारे दृश्यों का पास ले आती हो, दूर
ले जाती हो; बन्द आँखों के
भीतर के अभाव की बाढ़ को
वहीं रोक लेती हो।

मैं तुम्हारी साँसों के साथ चलता हूँ
जो बनाती हैं, गायब कर देती हैं,
ऊँचे नीलगिरि वृक्षों को हिलाती हैं,
क्षितिजों को एकत्र उन्हें सन्तुलित करती हैं ः
पर तुम कुछ ज़्यादा ही गहरे जा चुकी हो,
निश्चल पुतलियाँ तुम्हारी।
मैं निस्सहाय तुम्हें और नीचे, तेज़ी से
फिसलता हुआ देखता हूँ।

क्या तुमने समुद्र के तकिये पर
सिर रख लिया है जो तुम्हारी हर साँस
के साथ आगे बढ़ता है, पीछे हट जाता है,
और वही दोहराता है ? दो संसारों के बीच
की बीच की बालू-रेखा पर जहाँ
से हमारा पूरापन ध्ाुएँ के
छल्लों की तरह ऊपर चला जाता है

मैं आता हूँ पर घनी झाडि़यों
के बीच असंख्य नज़रों से घिरी हुई
तुम सो रही हो, समुद्र के जंगल
के बीच, सबसे गहरी
खाली प्रकाशित घाटी में
कोरोनीसिया 1985

जनजातीय संगीत

1. यूरीडाईस

हम सोचते हैं कई बार कि
बचाना आवश्यक है अपने पुरूखों का संगीत

एक अमूल्य निध्ाि
अभिशप्त है जो ध्ाीरे-ध्ाीरे
ख़त्म हो जाने को

काले पड़ गये मुँह से निकली
वे ध्ाुनें जो निरर्थक टर्टराहट मालूम देती हैं,
हमारे सुनते-सुनते ही मानवीय विस्मृति के
विशाल अभिलेखागार में फिसल जाती हैं
काल की विराट चट्टान करवट बदलते हुए,
ध्वनियों को टेढ़ा कर देती है,
अर्थ को ध्ाुँध्ाला
पूर्णता को भर देती हैं नये रहस्यों से
(और इस संसार की चिन्ता में रोते लोग भी बुढ़ाने से बच नहीं पाते)


2.

अपने गाँव से इतनी दूर आकर
उस बूढ़े ने भी मानो
अपना संगीत खो दिया है और तुम
हज़ारों मिलती-जुलती पर एक-सी नहीं
ध्ाुनों में से किसी एक को चुनकर
पूरे ज़ोर-शोर से रचने की कोशिश करते हो

हालाँकि हमेशा ही निष्फल
वह तुम्हें सिर्फ़ इतना बता सकता है,
सिर्फ़ इतना ही, कि कैसे स्वर-संगतियों
का खेल बाहर आता है कनफोड़
चुप्पी को तोड़कर



अतीत का भविष्य

तुम मुझे बता रही थीं, क्या ऐसा
कोई वक़्त था जब राह चलते लोग
खुद अपनी छवि से एकाकार थे ?
और गली का हर मकान, हर वृक्ष
मकान, गली, वृक्ष ही थे, कुछ और नहीं
(अपनी गन्दली अनुकृति)

वह वक़्त किस वक़्त में मिलेगा ?
मैं उसकी कल्पना तक
मुश्किल से कर सकता हूँ
लेकिन तब सब मुमकिन हो पायेगा

ऊँचाई पर जाना भी
और उसे न थाम पाना जिसे
थामा जा नहीं सकता

बिना शीर्षक

हम जब भी मिले, तुम और मैं
पुरूखों ने, पृथ्वी के जन्म लिया हमारे भीतर
उन रातों में, उलझे थे जब शरीर हमारे, आपस में

हमने सामना किया अज्ञात का
छाया के खिलाफ़ छाया
तब भीड़ चैराहों को भर रही थी
और कसाईयों की दुकानों पर काँटों से
लटक रहे थे विशाल पशुओं के ढाँचे
तब सारा कुछ उत्कृष्ट
बेतहाशा बहती ध्ााराओं में डूबकर
भागा चला जा रहा था
पाताल की ओर

तुम्हारी आँखें टकरायीं मेरी आँखों से
जैसे तीखे उजले कमरों में खुलते,
गलियारे के छोर के दो काले दरवाजे़

मोह में डूबे हम अपनी ही
तृप्ति बन गये थे, हमारे टूटे
चेहरे अपने हज़ारहाँ टुकड़ों से
पलटकर हमें देख रहे थे
सिर्फ़ तुम्हारा स्तन और कोमल उदर
बाकी थे हमारे आलिंगन के
बेपरवाह छूट जाने के बाद

खिड़की के बाहर अधर््ारात्रि के आकाश में
अन्तहीन यात्रा वापसी की
भागता हुआ पास से गुज़र गया
बर्फ़ का रंग

फिर रोमाँच-गहरी सिहरन -
और प्रकाश, एक रत्न
तुम्हारे गर्भ में उत्पन्न !

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