मैं जहाँ भी रहूँ मोनालिसा जेना की कविताएँ ओड़िया से अनुवाद: दुष्यन्त
05-Sep-2018 05:21 PM 1807     

मुद्रा
एक बंगाली कवि वृक्ष की जड़ से
कविता का गठबन्धन कर रहे थे
शब्दों के किसलय...
कविता का अरण्य
भावों का मलयस्पर्श, कविता की छाया
सब बिखर जाएगा
बंजर ज़मीन पर एक डलिया हृदय के फूल
कविता के
हाथ फैलाये बैठे थे उत्कल के एक शिल्पी-
मैंने कहा-
उन्हीं फूलों से सजाओगे
हमारी सन्ध्या
फूल भी सूने!
तुम मुझे फूलों से भी अधिक एक कोमल स्पर्श से
अवश कर गये थे
कैसे एक चाँदनी रात में!
तुम्हारे निपुण निहाण
बना रहे थे
पत्थर की दीवार पर
उस नृत्यरत मानसी की मनोमयी मुद्रा.. !


आँसू भरी रात
कल जो कह दिया था तुमने
भीड़ के बीच में
दोहराया था मैंने उसको
हज़ार योजन दूर
झरते हुए कदम्ब फूलों की कातर रात्रि में!
अनुभवी की तेज़ नज़र
ऐसे कैसे पा लेती है
इन्द्रधनुष जैसी शाखा
हिला देती है
और फूल बनकर झरता है
मेरे जीवन का सारा प्रेम?
सुने हैं वे स्वर मैंने
थर्राये भी मेरे पैरों के तलवे
मैं जानती हूँ वह कह देगा शेषकथा
अनदेखा करके मैं जो
छुपाऊँगी मेरी व्यथा।
जैसे कोमल नीरवता बोलती है
भरता जाता है मेरा आघात
और मेरी निसंगता।

लेकिन तुमने वचन दिया था
स्वप्न मेरा
दायित्व तुम्हारा
जो तुमने कहा नहीं
इसलिए
इतने मेघ आकाश में
स्पर्शकातर काया
क्या तुमने सोचा
मैं छुपी हुई हूँ
उन अँधोरों में,
तुम्हारी तरह
मैं भी क्या सब बातें कहती हूँ?
वह अन्तहीन हमारे आलाप की मरूभूमि
नहीं है क्या ये मृगतृष्णा?
मिलन की ईषत् कामना?
देखो तुम अब दिखायी देते हो
स्वप्निल की तरह खोयी हुई नींदों में...
कहा था तुमने
नहीं रहोगे पास मेरे
कल रात चाँद आया था शेष प्रहर में
उसने परख लिया था
आँसू थे! सारी रात।
वो नहीं था
पहले की तरह।

केवल तुम
अनभ्यस्त उँगलियों के छूने से नहीं छेड़ता
सितार सातवीं सिम्फनी
कुछ बातें रह जाती है
जो तुम्हें लौटा देती है
बीते हुए सारे दिन
और उनकी अपूर्ण आकांक्षाएँ ..
तुम भी गा सकते हो गीत
प्रथम लहर में
तुम कर सकते हो
तुम सब कर सकते हो
नदी की तरह
बाँध तोड़ कर
बना सकते हो अपना मानचित्र
तुम वही प्राचीन नाद हो
जो टूटता है खतरे के संकेत पर
केवल तुम्हीं पढ़ पाओगे
तालपत्र की पोथी की तरह
मेरी
निषिद्ध कविता।
प्रवाल, बालू, शून्यता
सब भीगा सकते हैं
एक उन्मादी सैलाब...।
केवल तुम्हीं समझ पाओगे
‘कौड़ी खेल’ का रहस्य
तुम्हीं लिख पाओगे
मेरे अनुराग का अन्तिम विज्ञापन।
सिमट रही हूँ मैं
कैसे कहूँ अब
डूब जाती हूँ, ये कैसी मादकता है
मेरा और है क्या
पंखुड़ियों से बनी देह
सुगन्ध से भरा मन
अचानक इश्तहार आकण्ठ तृष्णा का
जाओ तो!
सिमट रही हूँ मैं
बिना कह पाये
लाज रे लाज
अब तो जाने दो!
मैं तो जानती हूँ, तुम भी जानते हो
शेषकथा नहीं है और
वे तरंगे, विरल सानिध्य
पारसमणि जैसा स्पर्श
तुम्हारे हाथों में
बजती हैं निशब्द मेरे पाँवों की मृदु मन्द थिरकन !
मृदंग बजाये कोई
तुम्हारे मेरे शब्दों के बदले
कानाफूसी कर जाता है कोई
यह कैसा संगम अभी
यह कैसा बन्धन
संचरित हो जाता है
आँखें खुद नम हो जाती हैं
अब तो शिथिल करो
खोल दो ये पिंजरा
उड़ने दो-
जाने दो मुझे
अक्षत रूप में
सब कुछ पूर्ववत्
मिटा दो वे अनदेखे स्पर्श के निशान
सूँधने से भी
न मिलने वाली हो जैसे
तुम्हारी सुगन्ध
मेरे आँखों में न रहे तुम्हारी भाषा
या होठों पर तुम्हारा प्रलेप
अवश बाँहों से जाए
अवसन्न आलिंगन व्यथा।
जाओ तो!
न कहूँगी एक शब्द भी
नस-नस में तुम हो
आकण्ठ नशे में हूँ
राह ढूँढती हूँ मत्त अन्धकार में
संकोच से निःशब्द मैं।
यह कैसा ‘पùतोला’ !
किसका यह तारों भरा रेशमी ओढना
अनुच्चरित शब्दों में अब
संगीत की यह कैसी रागिनी ?
छू जाता है
अँगुलियों के स्पर्श मात्र से ही
निःश्वास के गम्भीर स्पन्दन में
फिर भी कहते हो तुम,
यह नहीं यथेष्ट ?
फिर कब, कहाँ मिले?
कुछ तो रहने दो अनदेखा!
रहने दो माया की तरह
किंचित अँधोरा
मेरा समझकर मिलने को
कुछ अपना सा... !


असमाहित
तुम्हारी निसंगता से
उदास हो उठता है मेरा हृदय
तुम्हें छूने को
हाथ बढ़ाती हूँ अनजाने में
देशान्तर रेखा के दोनों किनारों पर टूटती लहरें अविराम
सोचो तो!
अगर मेरे प्रेमी होते तुम
क्या वश में कर पाते सातकोसिया खाई के
अतल जल को?
पहाड़ भी झुक जाते हैं वहाँ
पंखहीन मेघमाला
पानी के नीचे, पत्थरों पर होते हैं शिथिल।
मैं भी तो नहीं कर पाऊँगी
बन्द मुट्ठी में तुम्हारे
समर्पित अपने आप को
एक ताज़े फूल की पँखुड़ियों जैसे!
अहर्निश झरते हुए उन
नदी-तटों के शिमूल के स्पन्दन जैसे
बहती फिरती हूँ
मैं भी अकेली-अकेली
घाटी-रास्तों के घुमावदार संकरे मुहानों में
कौन-सी कस्तूरी जलती है जठर में
मैं खुद भी नहीं जानती-
जानती हूँ तुम सारी रात
पाते मुझे, अपने पास
हृदय के गहरे सपनों में
जैसे अन्तर के मोती जैसा उज्ज्वल धागों में
मैं भी तो आ जाती हूँ, अपनी इच्छा से कई रात
खुद को भुलाकर
तुम्हें ढूँढती हूँ
नक्षत्रों के बीच, बड़ी व्याकुलता से।
सोचो तो!
अगर हम मिले होते
कभी नदी किनारे के अँधोरे में, निविड़ उन्माद में?
सम्भाल रहे हो रुद्ध श्वास को
क्या मिला पाती मैं
मेरी साँसों में वह उष्मा, वे इप्सित चाँदनी रातें?
तुम्हें उदास करके
आकाश में उड़ जाऊँ अगर
तुम भी कल्पना के काँचघर में मुझे पाते हो
स्वप्न के अनचाहे भग्नांश जैसा
अगर हम मिलते
सम्पूर्ण अजाने, अवांछित की तरह
दुर्लभ एकान्त में अस्वीकार कर बैठे एक-दूसरे को?
शायद मैं डूब जाऊँ
अतल खाई में
आँसू पोंछकर लौट जाओगे तुम
एक निष्ठुर संन्यासी की तरह
मेरी सलिल समाधि के एकमात्र साक्षी।
अगर हुआ विपरीत
तुम मेरे हाथ थामकर
रुक जाने को कहो
विपन्न सुबकियों से,
नीलमाधव की तरह आह्वान करते मुझे
अहोरात्र, प्रतिमुहूर्त!
तब भी नहीं कर पाऊँगी
नहीं रह पाऊँगी, कोई अंगीकार जैसे
रहो तुम नक्षत्र की तरह
मुझे अपने धूलधूसरित घर में
विलीन हो जाने दो!

मैं जहाँ भी रहूँ
तुम अगर प्यार नहीं करते मुझे कहो,
और कौन प्यार करता मुझे
तुम्हें याद नहीं क्या
सुपर मार्केट का वह कोलाहल
और लिफ्ट में जाते समय
धीरे-धीरे फीका होता जा रहा मेरा स्वर
तुम चीत्कार कर रहे थे
हमारी भाषा में
एक प्रार्थना जैसा माँग रहे थे
हमारे पुनर्जन्म की दीर्घ परमायु
सौ-सौ लोगों की अनवरत प्रवाहमान छवियाँ
पिघल जाती थीं छायाएँ
तैरते हुए आते थे चेहरे
कोई नहीं चाहता था एक नियमित वास-भूमि
सुपर मार्केट की मरीचिका में अन्ततः
अकस्मात् अनुभव हुआ तुम्हारा निश्वास
एक अस्थायी हिलोर जैसा
और घूम रहा था मेरे चारों ओर
जैसे कि तुम सोना चाहते थे
मरु-उद्यान के भीतर
और मैं वह मादकता-
जैसे कि मैं एक उपनदी
तुम्हारे लक्ष्यहीन राह के मोड़ पर
अन्तःसलिल सार्वकालिक सार्वदैशिक
तुम्हारी हथेलियों में बीज सब अंकुरित
तुम्हारी हज़ार उँगलियाँ
मुझे सराहते
मैं जहाँ भी रहूँ।


मात्र 40 दिन
मात्र चालीस दिन
एक-एक कदम
समर्पण का
गिन-गिनकर बीती हैं रातें
प्रतिपदा से पूर्णिमा,
फिर एक बार, दिशाहीन होने वाली रात।
शब्द कम हो जाते हैं
मुखरित होता है विश्वास।
चालीस दिनों के अधराहार
शुचिता और संयम के भीतर
जपमाला की तरह
तुम्हारी प्रतीक्षा
अष्ठ प्रहर।
चालीस दिन पश्चात्
तुम्हें मिलती हूँ
पाँव मेरे ज़मीन पर नहीं रहते
तुम उठा ले जाते हो मुझे
चक्रवात की तरह
मैं बदल जाती हूँ
आषाढ़ के कृष्णचूड़ा में।
चालीस दिनों के शुद्धिकरण
आँखों में स्फटिक-सी स्वच्छता
मैं पकड़ी जाती हूँ
अपनी सरलता से
तुम मेरा आदर करते हो
विनियम में।
अथवा, तुम नहीं रुक पाये
स्थितप्रज्ञ प्रतिमा की तरह
हृदय के ठीक नाभि केन्द्र में।
चाँद आता है
जाता है-
वर्ष के बाद वर्ष
शतभिषा1 की मन्त्रित सन्ध्या में
उस एक दिन का उत्सव।
तुम अधिकार से मांगते हो
चालीस दिनों का विरह।

1शतभिषा - तारापुंज।

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