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सम्वत्सरमूला-अग्नीषोमविद्या मोतीलाल शास्त्री
वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे, वाचं गन्धर्वाः, पशवो मनुष्याः।वाचीमां विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी।।1।।वागक्षरं प्रथमजा ऋतस्य वेदानां माता, अमृतस्य नाभिः।सा नो जुषाणोपयज्ञमागादवन्ती देवी सुहवा मेऽस्तु।।2।।प...
अव्दैत का विस्तार और संसार ध्रुव शुक्ल
कभी विकल होकर कहने का मन होता है कि अव्दैत की धारणा कुछ विरले ज्ञानियों की ज़िद है और संसार को देखकर लगता है कि वह व्दैत में ही जीने की जिद बांधो हुए है।कोई उत्प्रेरक जरूर है जिसके कारण इतना बड़ा जीवन व्यापार चल रहा है पर विरले ज्ञानियों की नज...
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