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कुछ और उपन्यास अंश Next
राजपाट तिलोत्तमा मजूमदार बांग्ला से रूपान्तर रामशंकर द्विवेदी
‘राजपाट’ तिलात्तमा मजूमदार का एक विशाल उपन्यास है। यह पहले ‘देश’ पत्रिका में धारावाहिक प्रकाशित हुआ था, बाद में पुस्तकाकार छपा। इसका कथास्त्रोत मुर्शिदाबाद का ग्रामीण इलाका है। मुर्शिदाबाद जिले में गंगा सागर की ओर अभिमुख हो...
प्रूफ़रीडर के नाम खत आशुतोष भारद्वाज
अब अनन्या की बारी थी। अनन्या ने अपनी कहानी सुनायीः ‘परिवार के बारे में कहने को मेरे पास कुछ नहीं है, बचपन में भी मेरे साथ कुछ खास नहीं हुआ। मैं सीधा वहीं से शुरू करूँगी जब मैंने बीए के बाद एक प्रूफ़रीडर की नौकरी शुरू की। एक छोटा-सा आॅफि़स था...
रानीखेत एक्सप्रेस गीत चतुर्वेदी
‘रानीखेत एक्सप्रेस’ वह उपन्यास है, जिस पर मैं पिछले सात साल से काम कर रहा हूँ। पाँँँच खण्डों में विभक्त इस उपन्यास के शुरुआती चार खण्डों का गद्य गल्प की सीमाओं के भीतर आता है, लेकिन पाँचवाँ खण्ड अलग है। सम्भव है कि कई विद्वान उसे गल्प ...
नेमत खाना ख़ालिद जावेद उर्दू से लिप्यान्तर . नजमा रेहमानी
सर्दियाँ जा चुकी थीं। मार्च का महीना आ पहुँचा। घर भर में सूखे पीले और मुर्दा पत्तों का एक ढेर लगकर रह गया। मार्च की रूखी हवाओं के उदास झक्कड़ों में यह पत्ते बावर्चीखाने में भी जमा हो जाते, क्योंकि बावर्चीखाना घर के पूरबी हिस्से में था और ये हवाएँ ...
वह और वह राकेश श्रीमाल
इतनी दूर से फ़ोन पर बात करते हुए मैं तुमसे बोल रहा हँू, तुम कितनी मेरे भीतर रहती हो।तुमने मेरे भीतर से कोई जवाब नहीं दिया है। तुम मेरे कहे को मेरे ही कानों से सुन रही हो। तुम मेरे भीतर से मेरा ही हाथ उठाकर मेरे बालों को ठीक कर रही हो। ...
आखिरी सवारियाँ सैयद मुहम्मद अशरफ़ हिन्दी लिप्यांतरणः रख़्शन्दा रूही मेंहदी
तालिबइल्मी के ज़माने में छुट्टियाँ गुज़ारने जब मैं घर आता और ये रोज़नामचा सफ़रनामा तन्हाई में पढ़ता तो आखि़री लाइन तक आते-आते बेहाल हो जाता। मैं रात भर जागता रहता और दिन में भी ठीक से सो नहीं पाता। मेरी हालत देखकर वालिद और अम्मा रंजीदा हो जाते और ...
उपन्यास.अंश मदन सोनी एक
यह निश्चय ही वह नहीं है जो उसकी आकांक्षा थी। हालाँकि, काश मैं उसे पूरा कर पाती! इसलिए नहीं कि यह उसकी आकांक्षा थी, बल्कि इसलिए कि अन्ततः यह मेरी भी आकांक्षा बन गयी थी। उसके कुछ-कुछ हिंसक-से आरोपण के बावजूद। नहीं, मैं उसे बलात्कार नहीं कहूँगी। उसकी...
चीनी कोठी सिद्दीक़ आलम अनुवादः रिज़वानुल हक़
अदालत फिर से खुल गयी है। मगर मैं कुछ दिनों से अदालत नहीं जा रहा हूँ। मेरे सारे मुकदमों की तारीखें आगे बढ़ा दी गयी हैं। सत्र जज एक लम्बी छुट्टी पर चले गये हैं। कमरे की दोनों खिड़कियाँ खुली हुई हैं। बाहर बड़ी तेज धूप है जिसमें कुछ कव्वे पेड़ की शाखो...
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