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नोटबुक्स जे. कृष्णमूर्ति

अनुवाद: रमेशचन्द्र शाह
15 नवम्बर
उषःकाल। पहाड़ियाँ मेघाच्छन्न, और हर पक्षी गाता-पुकारता-चीखता ...। एक रँभा रही गाय। एक कुत्ता भौंकता कहीं। खासी मज़ेदार सुबह...। कहीं से पहले बाँसुरी, और फि ...

04-Sep-2018 03:15 PM 143
कृष्ण बलदेव वैद

19-8-2002
परसों थके टूटे यहाँ पहुँचे। अरोचक सफ़र के बाद। रास्ते में कोई हादसा हुआ न हैरानी। सफ़र के साथी सब सूखे, सहायक सब रूखे। कहीं कोई शरारा नहीं था। पुराने, तीस-पैंतीस-चालीस साल पहले के हवाई ...

12-Dec-2017 05:56 PM 630
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